शिवसेना के नाम और उसके चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ को शिंदे खेमे को देने पर सवाल उठाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अब गुरुवार को शिवसेना के चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए विधायी बहुमत को आधार बनाने पर सवाल उठाए। जस्टिस बागची ने कहा कि हालाँकि राजनीतिक दलों को मान्यता देने के लिए चुनावी आंकड़े अहम होते हैं, लेकिन सवाल तब उठता है जब चुने जाने के बाद विधायक अपनी राजनीतिक निष्ठा बदल लेते हैं। जस्टिस बागची ने कहा, 'आज वोटर असल में किसी पार्टी के लिए वोट करता है, न कि प्रतिनिधि के लिए।' इससे पहले बुधवार को अदालत ने पूछा था कि अगर चुनाव आयोग के सामने यह तय करने के लिए मौजूद पैरामीटर पूरी तरह साफ़ नहीं थे कि दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों में से असली शिवसेना कौन है तो आयोग ने दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न देकर अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प क्यों नहीं दिया?

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ- मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना- शिवसेना के विभाजन से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में चुनाव आयोग के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न दिया गया था। महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फ़ैसले से जुड़ा विवाद भी मामले में जुड़ा है जिसमें शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराया गया था।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने बुधवार को कहा कि अगर उपलब्ध सभी परीक्षणों में कमियां थीं तो चुनाव आयोग के पास एक और रास्ता था- किसी भी गुट को पुराने आरक्षित चुनाव चिह्न का लाभ न देना और दोनों को अपने-अपने चुनाव चिह्न चुनकर अपनी राजनीतिक ताक़त के आधार पर चुनाव लड़ने देना। अदालत की टिप्पणी थी कि दोनों गुटों को 'बालासाहेब' की विरासत के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी ताकत पर चुनाव लड़ना चाहिए।
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SC ने चुनाव आयोग पर सवाल क्यों उठाया?

सुनवाई के दौरान शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल चुनाव आयोग के फ़ैसले का बचाव कर रहे थे। कौल ने दलील दी कि आयोग ने पार्टी के संविधान, संगठनात्मक ढांचे और दोनों गुटों के समर्थन समेत कई पहलुओं पर विचार किया था।

उनका कहना था कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से जुड़े आंकड़े भरोसेमंद तरीके से किसी एक गुट की वास्तविक स्थिति नहीं बताते थे। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी संगठन में नामित सदस्यों की भूमिका अहम थी और पार्टी प्रमुख के पास व्यापक अधिकार थे। ऐसे में संगठनात्मक बहुमत के आधार पर निर्णय करना व्यावहारिक रूप से मुश्किल था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार कौल ने यह भी तर्क दिया कि दोनों गुटों के बीच निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का विभाजन साफ़ था और इस परिस्थिति में विधायी बहुमत को एक काम करने योग्य कसौटी के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था।

विधायी बहुमत वाली इसी दलील के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि अगर आयोग को उपलब्ध टेस्ट में पर्याप्त स्पष्टता नहीं मिली थी तो क्या वह किसी एक गुट को पुराने पार्टी नाम और चुनाव चिह्न का लाभ देने के बजाय दोनों को नए चिह्नों के साथ चुनाव लड़ने का विकल्प नहीं दे सकता था।

पार्टी सिंबल, विधायक की अयोग्यता अलग मुद्दे

सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव चिह्न विवाद और विधायकों की अयोग्यता के बीच अंतर पर भी जोर दिया। जस्टिस बागची ने कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का सवाल किसी विधायक के आचरण से जुड़ा है, जबकि चुनाव चिह्न का विवाद राजनीतिक पार्टी की पहचान से संबंधित है।

अदालत के अनुसार, चुनाव चिह्न के मामले में यह तय किया जाता है कि राजनीतिक पार्टी के रूप में किस संगठन को संबंधित नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न का अधिकार दिया जाना चाहिए। वहीं विधायकों की अयोग्यता इस बात से जुड़ी होती है कि किसी विधायक ने विधानसभा में क्या किया और क्या उसका आचरण संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का आधार बनता है। यानी अदालत ने संकेत दिया कि विधायी दल में बहुमत और राजनीतिक पार्टी की पहचान को एक ही सवाल मानकर नहीं देखा जा सकता है।

शिंदे गुट की ओर से क्या दलील दी गई?

शिंदे गुट की ओर से नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि आयोग ने केवल विधानसभा में विधायकों की संख्या को देखकर निर्णय नहीं लिया था। उनके मुताबिक आयोग ने पार्टी के संविधान और संगठनात्मक संरचना को भी देखा था। लेकिन संगठनात्मक बहुमत का परीक्षण संतोषजनक नतीजे तक नहीं पहुंचा पाया। इसके बाद आयोग ने विधायी बहुमत को सबसे व्यावहारिक कसौटी माना।

कौल ने यह भी दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के सुभाष देसाई मामले के फैसले ने चुनाव आयोग को चुनाव चिह्न संबंधी विवाद में विधायी ताकत पर विचार करने से पूरी तरह नहीं रोका है। उनका तर्क था कि किसी विधायक को अयोग्य ठहराने से पहले हुए चुनाव में पार्टी को मिले वोट या उसके वोट शेयर अपने-आप ख़त्म नहीं हो जाते। इस आधार पर उन्होंने चुनाव आयोग के निर्णय को सही ठहराने की कोशिश की।

ठाकरे गुट ने क्या कहा?

इससे पहले उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें रखी थीं। सिब्बल का मुख्य तर्क था कि विधानसभा में किसी गुट के पास बहुमत होने से वह अपने-आप राजनीतिक पार्टी की पहचान और उसकी विरासत पर अधिकार हासिल नहीं कर सकता।

ठाकरे गुट की ओर से यह तर्क दिया गया कि विधायी दल का बहुमत राजनीतिक संगठन की पहचान को अपने कब्जे में लेने का आधार नहीं बन सकता। इसी संदर्भ में चुनाव आयोग द्वारा शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चिह्न देने के फैसले पर सवाल उठाए गए।

2022 में हुआ था शिवसेना का विभाजन

शिवसेना में बड़ा राजनीतिक विभाजन जून 2022 में हुआ था। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में कई विधायकों ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के खिलाफ बगावत की। इसके बाद महाराष्ट्र में सत्ता समीकरण बदल गया और शिंदे गुट ने बीजेपी के साथ सरकार बनाई। विभाजन के बाद दोनों गुटों ने शिवसेना के नाम और उसके पारंपरिक धनुष-बाण चुनाव चिह्न पर दावा किया। मामला चुनाव आयोग के पास पहुंचा।

चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देते हुए पार्टी का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न उसके पक्ष में कर दिया था। आयोग के मुताबिक, पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से जुड़ी जानकारी के आधार पर दोनों गुटों के दावों में से किसी एक को निर्णायक रूप से स्वीकार करना संभव नहीं था। इसके बाद आयोग ने विधायी दल में समर्थन को प्रमुख आधार बनाया। आयोग के आकलन के अनुसार, शिंदे गुट के पास महाराष्ट्र विधानसभा में 40 विधायक थे, जबकि ठाकरे गुट के पास 15 विधायक थे। लोकसभा में शिवसेना के 18 सांसदों में से 13 शिंदे गुट के साथ थे और पांच ठाकरे गुट के साथ थे। इसी बहुमत को आधार बनाते हुए आयोग ने शिंदे गुट के पक्ष में फैसला किया और उसे शिवसेना का नाम तथा धनुष-बाण चुनाव चिह्न दिया।
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क्या कभी धनुष-बाण फ्रीज हुआ था?

इस मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि 2022 में चुनाव आयोग ने अंतरिम तौर पर दोनों गुटों को पुराने शिवसेना नाम और धनुष-बाण चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया था। उस समय आयोग ने दोनों पक्षों को अलग-अलग नाम और अलग चुनाव चिह्न चुनने को कहा था।

यही पृष्ठभूमि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को अहम बनाती है। अदालत का सवाल यह है कि अगर बाद में आयोग को उपलब्ध परीक्षणों में स्पष्टता नहीं मिल रही थी तो क्या वह फिर से दोनों पक्षों को अलग-अलग चुनाव चिह्न देकर अपने राजनीतिक समर्थन के आधार पर चुनाव लड़ने का रास्ता अपना सकता था।

मामले में सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि चुनाव आयोग ने शिवसेना के विभाजन के बाद पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर फैसला लेते समय कानून के तहत उपलब्ध विकल्पों और संबंधित तथ्यों पर सही तरीके से विचार किया था या नहीं। इसलिए फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को चुनाव आयोग के फैसले को रद्द करने का आदेश या शिंदे गुट के खिलाफ अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।