जिस तरह से निजी कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में छात्रों की बेतरतीब बढ़ी फीस ने उच्च शिक्षा पाना महंगा कर दिया है उसको लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख़्ती दिखाई है। इसने साफ़ साफ़ कह दिया है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटीज मुनाफा कमाने वाली संस्था नहीं बन सकती हैं। यही टिप्पणी करते हुए इसने देश की सभी निजी यूनिवर्सिटीज से पांच साल के पैसे का पूरा हिसाब मांगा है। इसके तहत विश्वविद्यालयों को ऑडिटेड वित्तीय रिकॉर्ड, फीस स्ट्रक्चर, सरप्लस फंड, उसके निवेश और सरकारी रियायतों का ब्यौरा छह हफ़्ते में देना होगा। कोर्ट ने कहा कि निजी विश्वविद्यालय शिक्षा के सार्वजनिक उद्देश्य के लिए हैं, उन्हें सिर्फ मुनाफा कमाने वाली संस्था के रूप में नहीं चलाया जा सकता है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 17 सितंबर के आदेश में देशभर की निजी यूनिवर्सिटीज से पिछले पांच वर्षों के ऑडिटेड वित्तीय रिकॉर्ड समेत कई तरह की जानकारी मांगी है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को संबंधित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से यह जानकारी लेकर छह सप्ताह के भीतर मुख्य सचिवों के माध्यम से हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

‘यूनिवर्सिटीजी प्रॉफिट मेकिंग संस्था नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि शिक्षा की व्यवस्था जनता के हित के लिए है। इसलिए निजी विश्वविद्यालयों को केवल मुनाफा कमाने के उद्देश्य से नहीं चलाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय के पास उसके सुचारु संचालन के लिए एक कुछ वित्तीय ‘कुशन’ हो सकता है। इससे संस्थान अपने संसाधनों का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल कर सकेगा और शिक्षण तथा ग़ैर-शिक्षण कर्मचारियों को उचित वेतन दिया जा सकेगा। लेकिन कोर्ट की चिंता यह है कि विश्वविद्यालय के संसाधनों को ऐसे कामों में न लगाया जाए जिनका शिक्षा से सीधा संबंध नहीं है।
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ऑडिटेड वित्तीय रिकॉर्ड देना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों से पिछले पांच वर्षों के ऑडिटेड वित्तीय रिकॉर्ड मांगे हैं। इनमें मुख्य रूप से यह जानकारी शामिल होगी-
  • विश्वविद्यालय ने कितना पैसा जुटाया?
  • उस पैसे का इस्तेमाल किन कामों में किया गया?
  • विश्वविद्यालय ने छात्रों से कितनी फीस ली?
  • फीस किन-किन मदों में ली गई?
  • सरप्लस यानी अतिरिक्त धनराशि कितनी है?
  • उस सरप्लस का क्या किया गया?
  • सरप्लस राशि का कहीं निवेश किया गया है तो उसका विवरण क्या है?
  • ऐसे लोगों को कितना भुगतान किया गया जो विश्वविद्यालय के प्रत्यक्ष शैक्षणिक कामकाज से जुड़े नहीं हैं?

फीस के नाम पर वसूली का भी हिसाब देना होगा

कोर्ट ने केवल सामान्य ट्यूशन फीस की जानकारी नहीं मांगी है। विश्वविद्यालयों को दाखिले के समय और कोर्स के दौरान छात्रों से ली जाने वाली सभी तरह की फीस का विवरण देना होगा। इसमें अगर डेवलपमेंट फंड, किसी विशेष कार्यक्रम के नाम पर फीस या किसी दूसरे नाम से अतिरिक्त रकम ली जाती है तो उसकी भी जानकारी देनी होगी। 

विश्वविद्यालयों को यह भी बताना होगा कि फीस से प्राप्त रकम और दूसरे संसाधनों से बने सरप्लस का इस्तेमाल किस तरह किया गया और उसका निवेश कहां किया गया। यानी कोर्ट यह देखना चाहता है कि छात्रों से वसूली गई रकम का वित्तीय इस्तेमाल किस तरह हो रहा है।

सरकार से मिली रियायतों का भी हिसाब

सुप्रीम कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों से यह भी बताने को कहा है कि उन्हें केंद्र या राज्य सरकारों से किस तरह के फायदे मिले।
इसमें खास तौर पर शामिल हैं-
  • जमीन का आवंटन,
  • क़ानूनों में दी गई छूट,
  • नियमों में दी गई राहत,
  • किसी तरह की विशेष सुविधा या विशेषाधिकार,
  • केंद्र या राज्य सरकार से मिले अन्य लाभ।
इसका मतलब यह है कि विश्वविद्यालयों को सिर्फ अपनी आय-व्यय की जानकारी नहीं देनी होगी, बल्कि यह भी बताना होगा कि उन्हें सार्वजनिक संस्थाओं या सरकारों से कौन-कौन से लाभ मिले हैं।

दाखिले की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में

सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों की एडमिशन प्रक्रिया के बारे में भी विस्तृत जानकारी मांगी है। विश्वविद्यालयों को बताना होगा कि प्रत्येक कोर्स में छात्रों को दाखिला देने की प्रक्रिया क्या है और दाखिले से जुड़े फैसले कौन लोग लेते हैं। इसके अलावा कोर्ट ने पूछा है कि-
  • प्रश्नपत्र कौन तैयार करता है?
  • परीक्षा कौन आयोजित करता है?
  • उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन कौन करता है?
  • विश्वविद्यालय के फंड को संभालने की जिम्मेदारी किसकी है?
  • इन प्रक्रियाओं में विश्वविद्यालय के प्रबंधन की क्या भूमिका है?

शिक्षकों की भर्ती, वेतन की जानकारी भी

कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों से जुड़ी जानकारी भी मांगी है। विश्वविद्यालयों को बताना होगा कि शिक्षकों और कर्मचारियों की भर्ती किस प्रक्रिया से होती है, उन्हें कितना वेतन और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं और उनका भुगतान किस तरीके से किया जाता है।

अगर विश्वविद्यालय ने कर्मचारियों की सेवा शर्तें निर्धारित की हैं, तो उनकी जानकारी भी देनी होगी। इसके अलावा कोर्ट ने शिक्षकों की कक्षाओं से जुड़ा रिकॉर्ड भी मांगा है। विश्वविद्यालयों को बताना होगा कि किस अधिकारी को शिक्षकों को कक्षाएं आवंटित करने का अधिकार है, प्रत्येक शिक्षक को कितनी कक्षाएं दी गईं और वास्तव में कितनी कक्षाएं उन्होंने लीं। अगर किसी शिक्षक ने निर्धारित कक्षाएं नहीं लीं तो छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए विश्वविद्यालय ने क्या वैकल्पिक व्यवस्था की, इसकी जानकारी भी देनी होगी। इस संबंध में जनवरी 2025 से आगे का विवरण मांगा गया है।

छात्रों की शिकायतों का भी देना होगा रिकॉर्ड

सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों में मौजूद ग्रिवांस रिड्रेसल यानी शिकायत निवारण व्यवस्था का भी विवरण मांगा है। विश्वविद्यालयों को बताना होगा कि शिकायत समिति में कौन-कौन लोग हैं, वह किन तरह की शिकायतों पर सुनवाई करती है और पिछले तीन वर्षों में कितनी शिकायतें मिलीं।

यह भी बताना होगा कि छात्रों की उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई और उन्हें कितने समय में निपटाया गया। इससे कोर्ट विश्वविद्यालयों में छात्रों की शिकायतों के निपटारे की वास्तविक स्थिति को भी देख सकेगा।

मेडिकल और दूसरे प्रोफेशनल कॉलेजों की भी जांच

सुप्रीम कोर्ट ने उन विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जुड़ी नियामक संस्थाओं को भी जानकारी देने का निर्देश दिया है, जिन्हें किसी पेशेवर पाठ्यक्रम के लिए मान्यता या संबद्धता हासिल है। इनमें मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग, फार्मेसी, लॉ, वेटरिनरी और भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े नियामक निकाय शामिल हैं।

इन संस्थाओं को पिछले पांच वर्षों में की गई इंस्पेक्शन की जानकारी देनी होगी। यह भी बताना होगा कि निरीक्षण के समय संस्थान में कितने शिक्षक और सपोर्ट स्टाफ मौजूद थे और मान्यता या संबद्धता देते समय किन मानकों को देखा गया। जहां कमियां पाई गई थीं वहां यह भी बताना होगा कि उन कमियों को बाद में दूर किया गया या नहीं।

जहां किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय का किसी अस्पताल से संबंध है, वहां उस अस्पताल की जानकारी भी देनी होगी। कोर्ट ने पूछा है कि कॉलेज और अस्पताल के बीच किस तरह का संबंध है। यह निर्देश खास तौर पर उन संस्थानों के लिए अहम है जहां मेडिकल या स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा दी जाती है, क्योंकि छात्रों की व्यावहारिक ट्रेनिंग और अस्पताल की सुविधाएं उनकी शिक्षा का अहम हिस्सा होती हैं।
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मामला एमिटी यूनिवर्सिटी से शुरू हुआ

सुप्रीम कोर्ट के ये निर्देश मूल रूप से नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी से जुड़े एक मामले से सामने आए। यह मामला एक छात्रा की शिकायत से शुरू हुआ था। सुनवाई आगे बढ़ने के साथ कोर्ट ने महसूस किया कि इसमें केवल एक विश्वविद्यालय का सवाल नहीं है, बल्कि देश में निजी विश्वविद्यालयों के संचालन, वित्तीय व्यवस्था, सरकारी सुविधाओं और नियामकीय निगरानी से जुड़े व्यापक सवाल हैं। इसी वजह से कोर्ट ने मामले को बड़े सार्वजनिक हित के मुद्दे के रूप में देखा और जांच का दायरा देशभर की निजी यूनिवर्सिटीज तक बढ़ा दिया।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संबंधित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जानकारी जुटाने के बाद छह सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया है कि संबंधित सरकारें विश्वविद्यालयों से जरूरी जानकारी हासिल करें और उसे अदालत के सामने रखें। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।