केंद्र की दलील का मूल आधार यह है कि SC और ST आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक गरीबी दूर करना नहीं है। यह व्यवस्था उन समुदायों को ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव से सुरक्षा तथा प्रतिनिधित्व देने के लिए बनाई गई है।
केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा लागू नहीं की जा सकती। सरकार का कहना है कि ‘क्रीमी लेयर’ का सिद्धांत अब तक केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण में लागू किया गया है और इसे SC-ST वर्गों तक बढ़ाना उचित नहीं होगा।
केंद्र ने यह दलील उस याचिका के विरोध में दी, जिसमें आरक्षित वर्गों के भीतर आय के आधार पर उप-कोटा निर्धारित करने की मांग की गई है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश की आरक्षण व्यवस्था केवल आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक और सामाजिक कारण भी हैं।
आरक्षण सिर्फ आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि आरक्षण की व्यवस्था का आधार केवल किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं है। SC और ST के मामले में आरक्षण ऐतिहासिक भेदभाव, सामाजिक पिछड़ेपन, जाति और जनजातीय पहचान जैसे व्यापक सामाजिक आधारों से जुड़ा है।सरकार के मुताबिक, यदि आरक्षित वर्गों में आय के आधार पर किसी तरह का बदलाव या प्राथमिकता लागू करनी है तो इसके लिए व्यापक समीक्षा जरूरी होगी। इसके साथ ही आरक्षित वर्गों के लाभार्थियों से जुड़े सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन और ठोस अनुभवजन्य (empirical) डेटा भी जुटाना होगा।
केंद्र ने कहा कि बिना इस तरह के व्यापक अध्ययन के आरक्षण नीति में बदलाव करना उचित नहीं होगा।
SC-ST में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने का फैसला संसद का विषय
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 15 जून 2026 को दाखिल अपने जवाब में कहा था कि SC और ST वर्गों में ‘क्रीमी लेयर’ का सिद्धांत लागू किया जाए या नहीं, इस बारे में फैसला लेने का अधिकार संसद के पास है। मंत्रालय ने अदालत से यह भी आग्रह किया कि वह ऐसी याचिकाओं पर न्यायिक निर्देश देने से बचे, जिनके जरिए देश की आरक्षण नीति को दोबारा निर्धारित या उसमें व्यापक बदलाव करने की मांग की जा रही है।सरकार का तर्क है कि आरक्षण नीति में इस तरह के महत्वपूर्ण बदलाव न्यायिक आदेश के बजाय व्यापक नीतिगत समीक्षा और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत किए जाने चाहिए।
क्या है ‘क्रीमी लेयर’ का सिद्धांत?
‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा मुख्य रूप से OBC आरक्षण के संदर्भ में इस्तेमाल होती है। इसके तहत OBC वर्ग के आर्थिक और सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है। वर्तमान व्यवस्था के तहत ₹8 लाख वार्षिक पारिवारिक आय की सीमा का इस्तेमाल क्रीमी लेयर की पहचान के लिए किया जाता है। इसमें कृषि से होने वाली आय को अलग माना जाता है।‘क्रीमी लेयर’ शब्द की शुरुआत सत्तनाथन आयोग (Sattanathan Commission) की 1971 की रिपोर्ट से जुड़ी है। आयोग ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ उठाने वाले अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग को अलग करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। बाद में 1993 में न्यायमूर्ति राम नंदन समिति के संदर्भ में भी इस अवधारणा को आगे बढ़ाया गया और OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर को बाहर रखने का सिद्धांत स्थापित हुआ।
हालांकि, SC और ST वर्गों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था लागू नहीं की गई। इसलिए इन वर्गों के पात्र सदस्य अपनी पारिवारिक आय के बावजूद आरक्षण के लाभ के दायरे में बने रहते हैं।
अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
SC और ST आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर बहस उस समय तेज हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2024 में राज्यों से SC और ST वर्गों के भीतर क्रीमी लेयर की पहचान कर उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर करने की दिशा में विचार करने को कहा था। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस विचार से असहमति जताई थी। सरकार का कहना था कि SC और ST समुदायों के खिलाफ होने वाला भेदभाव केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है।यही केंद्र की मौजूदा दलील का भी आधार है कि SC-ST आरक्षण को OBC आरक्षण की तरह केवल आर्थिक या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
संविधान में अलग-अलग प्रावधान
केंद्र ने अपने जवाब में संविधान के उन प्रावधानों का भी उल्लेख किया है, जिनके तहत विभिन्न आरक्षित वर्गों की पहचान की जाती है।
- अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों की पहचान और सूची निर्धारित की जाती है, जबकि अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों से संबंधित है। वहीं, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 342A में दिए गए हैं।
- सरकार का कहना है कि इन संवैधानिक व्यवस्थाओं में केवल आर्थिक मानदंड के आधार पर बदलाव करने की गुंजाइश नहीं है।
केंद्र का मुख्य तर्क क्या है?
केंद्र की दलील का मूल आधार यह है कि SC और ST आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक गरीबी दूर करना नहीं है। यह व्यवस्था उन समुदायों को ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव से सुरक्षा तथा प्रतिनिधित्व देने के लिए बनाई गई है।
- इसलिए सरकार का कहना है कि OBC के लिए विकसित ‘क्रीमी लेयर’ के सिद्धांत को उसी रूप में SC और ST आरक्षण में लागू नहीं किया जा सकता।
- केंद्र ने साफ किया कि यदि भविष्य में आरक्षित वर्गों के भीतर आय या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण के लाभों में बदलाव पर विचार करना हो तो पहले व्यापक संवैधानिक और नीतिगत समीक्षा, पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों का संग्रह तथा अनुभवजन्य अध्ययन जरूरी होगा।
इस तरह केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से SC-ST आरक्षण में आय आधारित उप-कोटा या क्रीमी लेयर लागू करने की मांग को स्वीकार करने के बजाय इस विषय को संसद और व्यापक नीतिगत प्रक्रिया के लिए छोड़ने की मांग की है।