नोएडा वर्कर्स प्रोटेस्ट से जुड़े मामले में दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत रद्द करने और नोएडा डीएम मेधा रूपम के वेतन से 5 लाख रुपये मुआवजा वसूलने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने नोएडा डीएम और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दायर अलग-अलग याचिकाओं पर यह अंतरिम आदेश दिया।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा वही जज हैं जिन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया है। सरकार ने इस याचिका में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े इस मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की थी। जस्टिस शर्मा ने सरकार का समर्थन किया और कहा कि मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सवाल हैं, इसलिए इसे बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए। हालाँकि, बेंच में शामिल जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जस्टिस शर्मा के उलट फ़ैसला दिया और सरकार के उस निवेदन को खारिज कर दिया। जस्टिस दत्ता ने साफ़-साफ़ कह दिया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पैनल में विपक्ष के नेता की भूमिका सजावटी बनकर रह गई है। वह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले पैनल में पीएम, विपक्ष के नेता और सीजेआई को शामिल करने के पक्ष में थे। सरकार ने सीजेआई की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया है। खंडित फ़ैसले की वजह से इस पर सीजेआई तय करेंगे।
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बहरहाल, आकृति पर एनएसए मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के उस हिस्से पर विशेष रूप से रोक लगाई है जिसमें डीएम और दूसरे अधिकारियों की भूमिका पर कड़ी टिप्पणियां की गईं तथा मुआवजे की वसूली का निर्देश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में जवाब दाखिल करने के लिए प्रतिवादियों को दो हफ्ते का समय दिया है और मामले को आगे की सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया गया है।

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया था?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि उनकी हिरासत जारी रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि आकृति के खिलाफ हिरासत का आधार पर्याप्त और ठोस नहीं है और आदेश पारित करते समय संबंधित अधिकारियों ने उपलब्ध सामग्री पर सही तरीके से विचार नहीं किया। अदालत ने यह भी कहा था कि आकृति का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी।

हाईकोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। खास बात यह थी कि अदालत ने इस रकम की वसूली नोएडा डीएम मेधा रूपम के वेतन और हिरासत की प्रक्रिया में शामिल अन्य जिम्मेदार अधिकारियों से करने का निर्देश दिया था।

DM मेधा रूपम पर कड़ी टिप्पणियाँ

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में डीएम मेधा रूपम की भूमिका पर भी काफी सख्त टिप्पणी की थी। अदालत के मुताबिक, पुलिस रिपोर्ट में अगर केवल आरोप हों और उनके समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय सबूत न हो तो डीएम को रिकॉर्ड की पूरी जांच करनी चाहिए थी।

हाईकोर्ट ने कहा था कि आकृति एक छात्रा और एक्टिविस्ट थीं और उनके खिलाफ पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। अदालत के मुताबिक, उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता था कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी। अदालत ने डीएम के आचरण को लेकर बेहद कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया था और कहा था कि परिस्थितियों से ऐसा लगता है कि आकृति को एक उदाहरण बनाने और दूसरे लोगों को मजदूरों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से आवाज़ उठाने से रोकने की कोशिश की गई।
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों को यह भी याद दिलाया था कि उनकी संवैधानिक निष्ठा संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति। अदालत ने चेतावनी दी थी कि यदि नौकरशाही की ऐसी कार्रवाई पर अंकुश नहीं लगाया गया तो उत्तर प्रदेश एक 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' जैसी स्थिति की ओर जा सकता है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इसी हिस्से यानी पैराग्राफ 27 से 33 पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसका मतलब है कि फिलहाल उन टिप्पणियों और 5 लाख रुपये की व्यक्तिगत वसूली संबंधी निर्देश पर अमल नहीं होगा। यह अंतिम फैसला नहीं है; सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गुण-दोष के आधार पर आगे सुनने के लिए रखा है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई?

नोएडा डीएम मेधा रूपम की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने हाईकोर्ट की डीएम के खिलाफ की गई टिप्पणियों को ग़लत बताया। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने भी हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी। उन्होंने दलील दी कि आकृति चौधरी पहले हरियाणा के मानेसर में कथित तौर पर आंदोलन को बढ़ावा दे रही थीं और बाद में आंदोलन नोएडा पहुंचा, जहां सरकार के अनुसार आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुईं।
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रोहतगी ने यह भी कहा कि एनएसए के तहत हिरासत की प्रक्रिया केवल डीएम के स्तर पर तय नहीं हुई थी। उनके मुताबिक, हिरासत का प्रस्ताव एसएचओ की ओर से आया, फिर प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरते हुए डीएम ने आदेश पारित किया। इसके बाद एनएसए की एडवाइजरी कमेटी, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के स्तर पर भी प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस आधार पर उन्होंने दलील दी कि डीएम को इस पूरी प्रक्रिया की अकेली जिम्मेदार अधिकारी मानना सही नहीं है और वह केवल चेन में में एक लिंक थीं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने एनएसए हिरासत के आदेश की पर्याप्त जांच नहीं की और मुख्य रूप से गिरफ्तारी की वैधता पर ध्यान दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कथित तौर पर इस सवाल पर भी विचार किया कि जब एनएसए के तहत हिरासत की प्रक्रिया में कई स्तरों पर अधिकारी और संस्थाएं शामिल थीं तो केवल डीएम के वेतन से 5 लाख रुपये की वसूली क्यों की जाए। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने सवाल किया कि डीएम को अलग करके उनके ऊपर 5 लाख रुपये की जिम्मेदारी कैसे डाली जा सकती है। इसी मुद्दे पर डीएम की ओर से यह तर्क दिया गया कि हिरासत की पूरी प्रक्रिया में कई प्राधिकारी शामिल थे।

आकृति चौधरी का मामला क्या है?

आकृति चौधरी दिल्ली यूनिवर्सिटी की इतिहास की छात्रा और एक्टिविस्ट हैं। अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के वेतन और काम की परिस्थितियों से जुड़े विरोध प्रदर्शन के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 मई को उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए लगाया। उनके साथ एक्टिविस्ट और पत्रकार सत्याम वर्मा के खिलाफ भी एनएसए के तहत कार्रवाई की गई थी। आकृति की हिरासत को चुनौती देते हुए मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री की समीक्षा के बाद उनकी एनएसए हिरासत को रद्द कर दिया था।