ECINet voter deletion- कानून के तहत Electoral Registration Officer को मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन गोवा में ERO से चुपचाप यह अधिकार छीन लिया गया। इसी से पता चला कि देशभर में ईआरओ अब मतदाता सूची में बदलाव नहीं कर पायेंगे।
ईआरओ से कैसे चुपचाप मतदाता सूची संशोधन का अधिकार छीना गया, गोवा से भेद खुला
चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सामने आई एक नई घटना ने चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर ECINet की भूमिका और राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों की शक्तियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट आज गुरुवार 24 सितंबर को भी प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 ऐसे मतदाता, जिन्हें स्थानीय Electoral Registration Officers (EROs) ने दस्तावेजों और सुनवाई के बाद मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया था, अंतिम सूची में जगह नहीं पा सके। वजह यह थी कि EROs के पास सॉफ्टवेयर में पहले की गई deletion को पलटने का विकल्प मौजूद नहीं था। आसान भाषा में कह सकते हैं कि ईआरओ से मतदाता सूची में संशोधन का अधिकार ले लिया गया और सब कुछ दिल्ली में बैठी एक सेंट्रलाइज्ड टीम ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर के ज़रिए करने लगी करने लगी। यही वो व्यवस्था है, जिसने वोट चोरी के पूरे खेल को उजागर कर दिया।
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था। उनके दफ्तर ने इसे तकनीकी समस्या समझा। इसे दूर करने के लिए वहां से 7 दिनों में आठ ईमेल चुनाव आयोग को भेजे गये। लेकिन अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने की समय-सीमा तक आवश्यक तकनीकी सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इन 97 मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सुनवाई
मामला उस SIR प्रक्रिया से जुड़ा है जिसमें कुछ मतदाताओं को पुराने मतदाता रिकॉर्ड से उनके नाम या रिश्तेदारों के नाम का मिलान नहीं होने के कारण “logical discrepancy” के आधार पर चिन्हित किया गया था। ऐसी discrepancy तब सामने आती है जब सॉफ्टवेयर किसी मतदाता को पुराने चुनावी रिकॉर्ड से जोड़ने की कोशिश करता है और नाम, उम्र या रिश्तेदारी से संबंधित जानकारी में विसंगति पाता है। 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि ऐसे मतदाताओं को दस्तावेज पेश करने और अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए। गोवा में EROs ने ऐसे मामलों की सुनवाई की। 97 मतदाताओं ने जरूरी दस्तावेज पेश किए और स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया। लेकिन यहीं से तकनीकी समस्या शुरू हुई।ERO ने फैसला किया, लेकिन ECINet में दर्ज करने का विकल्प नहीं
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, स्थानीय ERO पहले हटाए गए नामों को अपने स्तर से बहाल नहीं कर सके क्योंकि ECINet में deletion को rollback करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश भारती को लगातार पत्र और ईमेल भेजे। इन सभी संचारों में चुनाव आयोग के IT विभाग की महानिदेशक सीमा खन्ना को भी कॉपी किया गया। इन संदेशों में अनुरोध किया गया कि ऐसा विकल्प उपलब्ध कराया जाए जिससे ERO सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुरूप पहले हटाए गए नामों को वापस जोड़ सकें। लेकिन अंतिम मतदाता सूची जारी होने से पहले यह सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। नतीजा यह हुआ कि 97 योग्य पाए गए मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से बाहर रह गए।बड़ा सवाल- मतदाता सूची पर असली नियंत्रण किसके पासः इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में इस घटना को केवल 97 मतदाताओं की या गोवा की समस्या नहीं माना है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना उस बड़े सवाल की ओर इशारा करती है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने का वास्तविक नियंत्रण किसके पास है। कानून के तहत ERO को मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन अगर ERO किसी व्यक्ति को योग्य मानता है और उसके पास उस निर्णय को सॉफ्टवेयर में दर्ज करने की तकनीकी क्षमता ही नहीं है, तो व्यवहार में उसका वैधानिक अधिकार सॉफ्टवेयर की अनुमति पर निर्भर हो जाता है।
ECINet और केंद्रीयकरण पर पहले से ही सवाल
यही वह मुद्दा है जिसे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने भी पिछले महीनों में उठाया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक अन्य जांच के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के भीतर विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की। इनमें मतदाता डेटा और चुनावी प्रक्रिया को दिल्ली में केंद्रीकृत करने तथा राज्य स्तर के अधिकारियों की भूमिका कम होने की आशंकाएं भी शामिल थीं।
- उनकी आपत्तियों में यह सवाल भी शामिल था कि चुनावी डेटा और मतदाता सूची से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में राज्य के अधिकारियों की स्वतंत्र भूमिका कितनी बची है।
आयोग के भीतर भी उठ चुका है केंद्रीकरण का सवाल
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के अधिकारियों को यह भी याद दिलाया था कि आयोग के नाम से जारी होने वाले संचारों और फैसलों को निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत आयोग की मंजूरी प्राप्त होनी चाहिए। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से होना चाहिए। अगर तीनों आयुक्तों में किसी मुद्दे पर मतभेद हो तो बहुमत का मत निर्णायक होता है।इस खेल को फिर से समझिये
सॉफ्टवेयर ने मतदाता को ‘logical discrepancy’ के तहत चिन्हित किया →
नाम हटाया गया →
- ERO ने दस्तावेजों की जांच की →
- ERO ने मतदाता को योग्य पाया →
- लेकिन ERO के पास नाम बहाल करने का सॉफ्टवेयर विकल्प नहीं था →
- राज्य के CEO कार्यालय ने दिल्ली से तकनीकी अनुमति मांगी →
- समय पर सुविधा नहीं मिली →
- असली वोटर के नाम अंतिम सूची में नहीं आ सके।
- इस घटना ने चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी प्रणाली और वैधानिक चुनाव अधिकारी के अधिकार के बीच संबंध को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
इस मामले का केंद्रीय सवाल यही है: अगर किसी मतदाता को कानून के तहत सुनवाई के बाद स्थानीय निर्वाचन अधिकारी योग्य मानता है, लेकिन केंद्रीय सॉफ्टवेयर उस फैसले को दर्ज करने की अनुमति नहीं देता, तो अंतिम फैसला किसका माना जाएगा- कानून से नियुक्त अधिकारी का या सिस्टम का? वही सिस्टम जिसकी बात नेता विपक्ष राहुल गांधी कह रहे हैं।