जस्टिस भुइयां ने रविवार को नलसार यूनिवर्सिटी में कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में “दूसरे दर्जे के नागरिक” बन जाते हैं, तो यह स्थिति संविधान की भावना के बिल्कुल विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पूरी SIR प्रक्रिया पर सवाल उठा दिया है। उन्होंने कहा कि अगर कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित कर उन्हें अपने ही देश में बिना वोट वाले नागरिकों में बदल देती है, तो ऐसी प्रक्रिया “स्वाभाविक रूप से मनमानी” होगी और संविधान के मूल ढांचे पर चोट करेगी। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति को सही ठहराने के लिए कोई भी “whataboutery” यानी इधर-उधर की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।
जस्टिस भुइयां ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी रविवार को हैदराबाद स्थित NALSAR University of Law में आयोजित 19वें Justice Bodh Raj Sawhney Memorial Moot Court Competition 2026 के समापन समारोह में की। उनका भाषण ऐसे समय आया है जब चुनाव आयोग की मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर देश में राजनीतिक और कानूनी विवाद जारी है और सुप्रीम कोर्ट में भी इससे संबंधित याचिकाएं दायर की गई हैं। हालांकि, जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में सीधे तौर पर SIR या ज्ञानेश कुमार का नाम नहीं लिया।
‘लाखों को वोट से वंचित करना संविधान के मूल पर हमला’
जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में “दूसरे दर्जे के नागरिक” बन जाते हैं, तो यह स्थिति संविधान की भावना के बिल्कुल विपरीत होगी। उन्होंने इसे “intrinsically arbitrary” यानी स्वभावतः मनमाना बताते हुए कहा कि इसे किसी भी तरह की दलील या बहाने से जायज नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक ऐसी स्थिति संविधान के “दिल” पर चोट करती है और भारत द्वारा अपनाए गए संवैधानिक शासन-व्यवस्था की ही नकार बन जाती है।
- उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों की दो श्रेणियां नहीं बनाता- एक वे जिनके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरी वे जिनके पास यह अधिकार नहीं है।
‘वोट का अधिकार नागरिकता की आत्मा है’
जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भारतीय नागरिक की पहचान से उसके वोट देने या मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसकी तुलना शरीर से आत्मा निकालने से की। यानी नागरिकता और मताधिकार को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।उनके मुताबिक भारत जैसे लोकतंत्र में आम नागरिक के लिए सरकार के संचालन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण और सीधा माध्यम उसका वोट है।
उन्होंने कहा कि “right of franchise” यानी मताधिकार नागरिकता का सार है और यही वह माध्यम है जिसके जरिए देश का सामान्य नागरिक शासन-व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है।
अनुच्छेद 326 पर नहीं चल सकता कोई हथौड़ा
जस्टिस भुइयां ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया। यह अनुच्छेद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार (adult suffrage) के आधार पर कराए जाने की संवैधानिक व्यवस्था करता है। उन्होंने कहा कि 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र का भारतीय नागरिक, यदि संविधान या कानून के तहत निर्धारित किसी अयोग्यता के दायरे में नहीं आता, तो मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार है। पहले मतदान की संवैधानिक उम्र 21 वर्ष थी, जिसे बाद में घटाकर 18 वर्ष किया गया।जस्टिस भुइयां ने साफ कहा कि अनुच्छेद 326 के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई अदालत भी ऐसी प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दे सकती जो संवैधानिक मताधिकार को बड़े पैमाने पर खत्म करती हो।
उन्होंने कहा कि “कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।”
अनुच्छेद 14 से मताधिकार का रिश्ताः जस्टिस भुइयां ने अनुच्छेद 326 को संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के सिद्धांत से भी जोड़ा। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। जस्टिस भुइयां के अनुसार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार इस समानता को वास्तविक लोकतांत्रिक अर्थ देता है।
यानी देश का कोई व्यक्ति अरबपति हो या रिक्शा चलाने वाला, दोनों के वोट का संवैधानिक मूल्य समान है। इसी तरह समाज में ऊंची स्थिति वाला व्यक्ति और सबसे निचले सामाजिक-आर्थिक पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी चुनाव में एक वोट रखता है। उन्होंने इसे भारतीय संविधान के उस परिवर्तनकारी दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें आर्थिक और सामाजिक असमानताओं के बावजूद राजनीतिक समानता सुनिश्चित की गई है। जस्टिस भुइयां ने अनुच्छेद 325 का भी उल्लेख किया। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक सामान्य मतदाता सूची का प्रावधान है।
किसी व्यक्ति को केवल धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची में शामिल होने से अयोग्य नहीं किया जा सकता। जस्टिस भुइयां का NALSAR हैदराबाद में 4 अक्टूबर को भाषण
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने SIR पर सवाल उठा दिया है
इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि संविधान निर्माताओं ने मताधिकार को केवल संसद द्वारा बनाए जाने वाले सामान्य कानून के भरोसे नहीं छोड़ा, बल्कि इसे संविधान में ही जगह दी।
आम्बेडकर ने भी मताधिकार को संविधान में लिखे जाने पर दिया था जोर
जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में संविधान सभा की बहस और डॉ. भीमराव आम्बेडकर के विचारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भारत में वयस्क मताधिकार की अवधारणा की शुरुआती अभिव्यक्ति 1895 के Constitution of India Bill, जिसे Swaraj Bill के नाम से भी जाना जाता है, में दिखाई देती है। बाद में संविधान सभा ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया। जस्टिस भुइयां के अनुसार डॉ. आम्बेडकर का तर्क था कि नागरिकों के वयस्क मताधिकार को संविधान में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना चाहिए, ताकि यह भविष्य की संसदीय सरकारों की इच्छा या राजनीतिक बहुमत पर निर्भर न रह जाए। उन्होंने कहा कि मताधिकार को स्वीकार करना भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और विदेशी शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष का स्वाभाविक परिणाम था।‘अमीर और गरीब के वोट की कीमत बराबर’
जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक के रूप में राजनीतिक समानता को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि एक अरबपति और एक रिक्शा चालक के पास एक-एक वोट होता है और दोनों के वोट का मूल्य समान होता है। इसी तरह सामाजिक रूप से ऊंचे स्थान पर मौजूद व्यक्ति और समाज के सबसे वंचित वर्ग से आने वाले व्यक्ति का वोट भी समान महत्व रखता है। The Indian Express
उनके अनुसार यह व्यवस्था भारतीय संविधान की उस परिवर्तनकारी दृष्टि को दिखाती है जिसमें राजनीतिक अधिकारों के स्तर पर नागरिकों के बीच बराबरी स्थापित की गई।मतदाता सूची से नाम हटाने पर नोटिस और सुनवाई जरूरी
जस्टिस भुइयां ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने Representation of the People Act, 1950 और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने से पहले उसे उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Lal Babu Hussain बनाम Electoral Registration Officer मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी मतदाता का नाम एक बार मतदाता सूची में दर्ज हो जाने के बाद, मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, उसे बिना नोटिस और सुनवाई के हटाया नहीं जा सकता।
यह टिप्पणी मौजूदा SIR विवाद के संदर्भ में खास महत्व रखती है, क्योंकि इस प्रक्रिया में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और पात्र मतदाताओं के नामों के संभावित बहिष्कार को लेकर राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं।सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला
जस्टिस भुइयां ने People’s Union for Civil Liberties (PUCL) बनाम Union of India के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वोट देने का अधिकार भले ही मौलिक अधिकार न हो, लेकिन यह संवैधानिक अधिकार जरूर है और इसका स्रोत अनुच्छेद 326 में है। उन्होंने Anoop Baranwal बनाम Union of India (2023) के फैसले का भी उल्लेख किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता बनने और वोट देने के अधिकार को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद से जोड़ा था। जस्टिस भुइयां ने कहा कि संसद कानून बनाकर मतदान के अधिकार के इस्तेमाल को विनियमित कर सकती है, लेकिन ऐसा कोई कानून या प्रशासनिक कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 की सीमाओं से बाहर नहीं जा सकती।SIR विवाद के बीच टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण?
जस्टिस भुइयां का यह भाषण ऐसे समय आया है जब चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर देश में तीखा विवाद चल रहा है। SIR का उद्देश्य मतदाता सूचियों का व्यापक पुनरीक्षण और सत्यापन है, लेकिन विपक्षी दलों और याचिकाकर्ताओं की ओर से यह आशंका जताई गई है कि इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम भी हट सकते हैं। जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में SIR का सीधे नाम नहीं लिया, इसलिए उनके वक्तव्य को चुनाव आयोग या SIR पर सुप्रीम कोर्ट का कोई औपचारिक न्यायिक फैसला नहीं माना जा सकता। यह NALSAR के एक अकादमिक कार्यक्रम में दिया गया उनका संवैधानिक और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित भाषण था। लेकिन SIR को लेकर चल रही बहस के बीच उनकी टिप्पणियों ने मतदाता सूची से नाम हटाने, प्रशासनिक प्रक्रिया, नागरिकता और मताधिकार के बीच संबंध को लेकर बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है।जस्टिस भुइयां का मूल संदेश यही था कि नागरिकता और मताधिकार को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता—क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक की राजनीतिक पहचान उसके वोट से ही पूरी होती है।