पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान लाखों नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये। इनके बाद विधानसभा चुनाव हुए। नतीजे आये। देश के जाने-माने पत्रकार प्रणय रॉय ने दोनों डेटा का विश्लेषण अपने ताज़ा प्रोग्राम में डीकोडर यूट्यूब चैनल पर किया है। समझिये क्या धांधली हुई है।
बंगाल एसआईआर पर विवाद जारी है। जाने माने पत्रकार प्रणव रॉय ने चौंकाने वाला विश्लेषण किया है
देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जाने-माने पत्रकार प्रणव रॉय ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया, मतदाताओं के नाम हटाने के पैमाने और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बीच संबंध की पड़ताल की है। प्रणय रॉय का विश्लेषण बताता है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता सूची से अधिक नाम हटाए गए, वहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) का चुनावी स्विंग अधिक रहा यानी उसे ज्यादा बढ़त मिली। ये स्विंग वहां दिखा जहां महिलाओं और मुस्लिम मतदाताओं के नाम अपेक्षाकृत ज्यादा हटाए गए। उन्होंने डेटा के ज़रिये अपना पूरा विश्लेषण किया है। प्रणव रॉय के मुताबिक, ये आंकड़े चुनाव आयोग की ओर से उपलब्ध कराए गए डेटा और विभिन्न पत्रकारों तथा रिसर्चरों की स्टडी पर आधारित हैं।
SIR की प्रक्रिया में जल्दबाजी
प्रणव के विश्लेषण की शुरुआत इस सवाल से होती है कि क्या इतने बड़े और जटिल चुनावी एसआईआर अभियान को जल्दबाजी में पूरा किया गया। उनके मुताबिक, SIR भारत के चुनाव आयोगों द्वारा किए गए सबसे बड़े और मुश्किल अभियानों में से एक है। इसकी योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए दो साल या उससे अधिक समय की जरूरत थी, लेकिन इसे विशेष रूप से विधानसभा चुनावों से पहले तेजी से आगे बढ़ाया गया। इसी जल्दबाजी ने पूरी प्रक्रिया के मकसद को लेकर संदेह पैदा किए हैं। मतदाता सूची की सफाई और उसे फौरन ठीक करके लागू करना आवश्यक है, लेकिन यह काम इस तरह होना चाहिए कि किसी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार गलत तरीके से न छिने।इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की 21 सितंबर की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा गया कि इसी रिपोर्ट ने SIR के दौरान अपनाई गई प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग ने ज़ोर पकड़ा। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज रोहिंटन नरीमन की 6 अक्टूबर 2026 की टिप्पणी का जिक्र करते हुए कहा गया कि जस्टिल नरीमन ने पूरी एसआईआर प्रक्रिया को गलत ठहराया और इसे रद्द करने को कहा। प्रणव रॉय ने अपने विश्लेषण में बेझिझक होकर इंडियन एक्सप्रेस, द टेलीग्राफ, द प्रिंट, द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, स्क्रॉल और रिपोर्टर्स कलेक्टिव सहित कई मीडिया संस्थानों की रिपोर्टों का जिक्र किया है।
लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए
विश्लेषण में कहा गया है कि SIR के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इनमें कई प्रमुख हस्तियां भी शामिल हैं। प्रणव रॉय ने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि कई दशकों से अलग-अलग चुनावों में मतदान करने के बावजूद उनका नाम भी सूची से हटा दिया गया है और वे अपना मतदान का अधिकार बहाल कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विश्लेषण में कुछ राज्यों में नाम हटाए जाने की दर बहुत अधिक होने का दावा किया गया है। उनके अनुसार: दिल्ली में नाम हटाए जाने की दर लगभग 33 प्रतिशत तक पहुंची। महाराष्ट्र में यह दर लगभग 21 प्रतिशत बताई गई। उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित पांच राज्यों में आगामी महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल के चुनाव और SIR के प्रभाव का अध्ययन दूसरे राज्यों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: SIR और चुनावी नतीजों के बीच संबंध का दावा
प्रणव के विश्लेषण का एक प्रमुख हिस्सा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों पर केंद्रित है। इसमें दावा किया गया है कि बीजेपी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की और उसके वोट शेयर में लगभग आठ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि तृणमूल कांग्रेस के वोट शेयर में करीब सात प्रतिशत की गिरावट आई। इन दोनों बदलावों से संकेत मिलता है कि बीजेपी के वोट शेयर में बढ़ोतरी और TMC के वोट शेयर में गिरावट के बीच महत्वपूर्ण संबंध है। इसके बाद विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि क्या SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने से इस चुनावी बदलाव पर असर पड़ा। वीडियो में विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों की तुलना के आधार पर दावा किया गया है कि जिन क्षेत्रों में SIR के तहत अधिक नाम हटाए गए, वहां TMC के खिलाफ चुनावी स्विंग अधिक था।जिन 25 सीटों पर सबसे ज्यादा नाम हटे, वहां TMC के खिलाफ बड़ा स्विंगः पश्चिम बंगाल की विधानसभा सीटों को मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की दर के आधार पर अलग-अलग समूहों में बांटकर विश्लेषण किया गया है।
दोनों समूहों के बीच का अंतर इस बात का संकेत है कि अधिक नाम हटाए जाने वाले क्षेत्रों में ममता बनर्जीकी TMC को अपेक्षाकृत ज्यादा चुनावी नुकसान हुआ। वीडियो में विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों के आधार पर एक ऐसा रुझान भी बताया गया है, जिसमें नाम हटाए जाने की दर बढ़ने के साथ बीजेपी के पक्ष में चुनावी स्विंग बढ़ता दिखाई देता है। विश्लेषण का निष्कर्ष है कि SIR के तहत नाम हटाने की प्रक्रिया और पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणामों के बीच संबंध की गंभीर जांच होनी चाहिए।
महिलाओं के नाम पुरुषों की तुलना में ज्यादा हटाए गए
वीडियो में महिलाओं के मतदाता अधिकारों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। प्रणय रॉय का कहना है कि पश्चिम बंगाल में परंपरागत रूप से महिलाओं का समर्थन ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में अधिक रहा है। कुछ चुनावों में तो महिलाओं के बीच TMC का समर्थन भाजपा की तुलना में 13 प्रतिशत तक अधिक रहा था। मतदाता सूची से महिलाओं के नाम पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में हटाने का पूरा प्रभाव पड़ा।
वीडियो में दिए गए आंकड़ों के अनुसार:पश्चिम बंगाल में महिला और पुरुष मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर होने के बावजूद हटाए गए नामों में महिलाओं का हिस्सा 62 प्रतिशत और पुरुषों का 38 प्रतिशत बताया गया है। इस आधार पर प्रणव रॉय ने सवाल उठाया है कि महिला मतदाताओं के नाम इतनी बड़ी संख्या में क्यों हटाए गए।
प्रणव रॉय ने तर्क दिया कि यदि मुस्लिम मतदाताओं के नाम भी गैर-मुस्लिम मतदाताओं की समान दर से हटाए जाते, तो हटाए गए मुस्लिम नामों की संख्या लगभग 19.8 लाख होती। इसके विपरीत, वीडियो में वास्तविक संख्या 30 लाख बताई गई है। यह अंतर मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने की असमान दर की ओर संकेत करता है। इसे व्यवस्थित ढंग से नाम हटाने के रूप में देखा जाना चाहिए।
क्या चुनाव आयोग जवाब देगा
रॉय ने कहा कि चुनाव आयोग को महिलाओं और मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने में कथित असमानता का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। ऐसा पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी भी कह चुके हैं। SIR को आगे बढ़ाने से पहले इस प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए। विश्लेषण में पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों की दोबारा जांच और नाम हटाने की प्रक्रिया के चुनावी प्रभाव को समझने की मांग भी की गई है। मतदाता सूची को ठीक करना चुनाव आयोग की नियमित जिम्मेदारी है। मतदाता सूची में मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियां और अन्य गलतियां दूर करना जरूरी है। लेकिन इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
SIR पर उठते सवाल और लोकतंत्र के लिए चुनौती
प्रणव रॉय के विश्लेषण का व्यापक सवाल यह है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, निष्पक्ष और भरोसेमंद है। अगर किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है, तो वह अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाता। बड़े पैमाने पर ऐसी गलतियां होने पर चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में महिलाओं और मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने से संबंधित पक्षों का इरादा सामने है।लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी हर पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की सुरक्षा करना भी है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए, शिकायतों का समय पर निपटारा करे और मतदाताओं का भरोसा कायम रखे।