सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से कंटेंट हटाने को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मार्च से जुलाई 2026 के बीच सरकार और विभिन्न एजेंसियों की ओर से इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक और यूट्यूब को क़रीब 1.95 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे गए। रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार जेन ज़ी की आवाज़ से डरती है और सोशल मीडिया पर सेंसरशिप बढ़ा रही है।

रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने कहा, 'साफ़ है कि यह सरकार सवाल पूछने, जवाबदेही तय करने और ज़िम्मेदारी निभाने से डरती है। इसलिए लोगों की आवाज़ दबाने की कोशिश की जा रही है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसा करना संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।' कांग्रेस ने यह भी कहा कि सरकार का यह रवैया जनता याद रखेगी।
ताज़ा ख़बरें

सुप्रिया श्रीनेत का दावा

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को हर मिनट एक ब्लॉकिंग ऑर्डर दिया। 2024-25 में 2312 ब्लॉकिंग ऑर्डर थे, लेकिन मार्च-जुलाई 2026 के सिर्फ पांच महीनों में 1,95,000 ब्लॉकिंग ऑर्डर जारी हुए। इनमें आधे से ज्यादा इंस्टाग्राम के लिए थे, जो युवाओं का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है। मोदी जी Gen Z से इतना डरते हैं?'
कांग्रेस ने अंग्रेज़ी अखबार की रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि मार्च से जुलाई 2026 के बीच सरकार की ओर से सोशल मीडिया कंपनियों को भेजे गए ब्लॉकिंग ऑर्डरों की संख्या अचानक बढ़ गई। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस दौरान इंस्टाग्राम को लगभग 1 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर मिले। फ़ेसबुक को क़रीब 80 हजार आदेश भेजे गए। यूट्यूब को लगभग 15 हजार आदेश मिले। यानी कुल मिलाकर करीब 1.95 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर सिर्फ इन तीन प्लेटफॉर्म्स को भेजे गए।

पहले पूरे साल में थे सिर्फ 2312 ऑर्डर

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के ज़रिए पहले मिले रिकॉर्ड के अनुसार अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच पूरे साल में 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को कुल 2312 ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे गए थे। इसके मुक़ाबले 2026 के सिर्फ पांच महीनों में आदेशों की संख्या कई गुना बढ़ गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अवधि में दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ़ छात्रों का आंदोलन भी चल रहा था। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्लॉकिंग ऑर्डरों का एक बड़ा हिस्सा इसी दौरान जारी किया गया, खासकर इंस्टाग्राम पर मौजूद सामग्री के संबंध में।

मेटा ने शुरू की ऑटोमैटिक कार्रवाई

अंग्रेज़ी अख़बार रिपोर्ट के मुताबिक़, सरकार द्वारा तय 2 से 3 घंटे की समय-सीमा का पालन करने के लिए मेटा ने अपने सिस्टम को गृह मंत्रालय के 'सहयोग' पोर्टल से जोड़ दिया है। दावा किया गया है कि अब इस पोर्टल के जरिए आने वाले सरकारी निर्देशों पर संबंधित कंटेंट बिना अलग से ह्यूमन रिव्यू के स्वतः हटाया जा सकता है।

डिजिटल अधिकार से जुड़े एक्टिविस्टों ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे सोशल मीडिया कंपनियों के पास सरकारी आदेशों की वैधता की जाँच करने का अवसर कम हो जाता है।

किन विषयों से जुड़े पोस्ट हटाने का दावा?

रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया यूज़रों की शिकायतों से यह संकेत मिले कि हटाए गए कंटेंट में छात्र आंदोलन के समर्थन वाले पोस्ट, सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति की आलोचना, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से जुड़ी सामग्री, डीपफेक और अन्य विवादित पोस्ट शामिल थे। हालाँकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह नहीं बताया है कि किन-किन पोस्ट पर कार्रवाई की गई।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि उनके इंस्टाग्राम के कुछ पोस्ट भारत में ब्लॉक कर दिए गए।

रिपोर्ट के अनुसार इस मुद्दे पर गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, मेटा और गूगल से प्रतिक्रिया मांगी गई थी, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक किसी की ओर से आधिकारिक जवाब नहीं मिला।
देश से और खबरें

क्या है 'सहयोग' पोर्टल?

रिपोर्ट के मुताबिक़ गृह मंत्रालय का 'सहयोग' पोर्टल विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों को सोशल मीडिया कंपनियों को ब्लॉकिंग या कंटेंट हटाने के निर्देश भेजने की सुविधा देता है। ये आदेश मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत जारी किए जाते हैं। इसके अलावा सरकार धारा 69A के तहत भी राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में कंटेंट ब्लॉक करने के आदेश जारी कर सकती है।

रिपोर्ट के बाद सोशल मीडिया पर एक नई बहस शुरू हो गई है। विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता रहा है, जबकि सरकार की ओर से अभी तक इस रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है।