सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख, कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति एनकाउंटर मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा 22 आरोपियों को बरी करने के खिलाफ याचिका पर आरोपियों और सीबीआई को नोटिस जारी किया। बेंच ने 92 गवाहों के मुकरने पर भी गंभीर चिंता जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2005 के सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में बरी किए गए 22 आरोपियों और सीबीआई को नोटिस जारी किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें 22 आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फ़ैसले को बरकरार रखा गया था।
इन 22 आरोपियों में गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के 21 पुलिसकर्मी शामिल हैं। याचिका सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन शेख ने दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जाँच करने वाली केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई और सभी 22 बरी आरोपियों से जवाब मांगा है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार हालाँकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बात बिल्कुल साफ़ कर दी कि अदालत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 2014 में इस मामले से डिस्चार्ज किए जाने के फ़ैसले को दोबारा नहीं खोलेगी। अदालत ने कहा कि इस पहलू पर पहले ही अंतिम फ़ैसला हो चुका है।
92 गवाहों के मुकरने पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित
सुनवाई का सबसे अहम पहलू 92 गवाहों का ट्रायल के दौरान अपने पहले के बयानों से मुकर जाना रहा। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। जस्टिस बागची ने कहा कि एक मुक़दमे में 92 गवाहों का मुकर जाना गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि वह कुछ गवाहों के बयान देखना चाहती है ताकि यह समझा जा सके कि मुक़दमा निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीक़े से चला था या नहीं।जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि जब इतनी बड़ी संख्या में गवाह अपने बयानों से पीछे हट गए तो अदालत को संतुष्ट करने के लिए इस पहलू को देखना जरूरी है। सीजेआई सूर्यकांत ने भी कहा कि पीठ कुछ गवाहों के बयान देखना चाहती है। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह निष्कर्ष निकाल लिया है कि ट्रायल में कोई गड़बड़ी हुई थी। अदालत ने केवल यह कहा है कि इस पहलू की जांच की जाएगी।
'हम निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ट्रायल की जांच करेंगे'
सुप्रीम कोर्ट के सामने आरोपी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत और बॉम्बे हाईकोर्ट दोनों ने विस्तृत फ़ैसलों के ज़रिए आरोपियों को बरी किया है और दोनों अदालतों के फ़ैसले एक जैसे हैं। आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने रिहा करने के फैसलों को दो अदालतों के लगातार एक जैसे निष्कर्ष बताया। इस पर जस्टिस बागची ने 92 गवाहों के मुकरने का मुद्दा फिर उठाया।
अदालत ने संकेत दिया कि उसका फोकस केवल इस बात पर नहीं होगा कि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने क्या निष्कर्ष निकाला, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि आरोपियों के खिलाफ चला ट्रायल निष्पक्ष और न्यायपूर्ण था या नहीं। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत कुछ गवाहों के बयान देखना चाहती है और इस मामले में खुद को संतुष्ट करना चाहती है।
बरी होने के फ़ैसले को चुनौती क्यों?
सोहराबुद्दीन शेख के भाई रुबाबुद्दीन ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 मई 2026 के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 मई को सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन और नायबुद्दीन की अपील खारिज कर दी थी। इन अपीलों में दिसंबर 2018 के विशेष सीबीआई अदालत के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें सभी 22 आरोपियों को बरी किया गया था।
रुबाबुद्दीन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि यह कथित फर्जी एनकाउंटर का मामला है और उनके भाई, भाभी और उनके साथी की हत्या की गई थी। उन्होंने अदालत का ध्यान इस बात की ओर दिलाया कि अभियोजन पक्ष के मामले के दौरान बड़ी संख्या में गवाह मुकर गए। उनका कहना था कि इसी वजह से मामले की दोबारा समीक्षा की ज़रूरत है।
वहीं आरोपियों की ओर से कहा गया कि दो अदालतें मामले की सुनवाई कर चुकी हैं और दोनों ने पर्याप्त कारणों के आधार पर बरी किया है।2005 में क्या हुआ था?
यह मामला नवंबर 2005 में सामने आया था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति को पुलिसकर्मियों ने उस समय कथित तौर पर बस से उतारकर हिरासत में लिया था, जब वे हैदराबाद से महाराष्ट्र की ओर जा रहे थे।
सीबीआई की जांच में आरोप लगाया गया था कि सोहराबुद्दीन और बाद में तुलसीराम प्रजापति को पुलिस ने कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ में मार दिया। कौसर बी की भी हत्या किए जाने और उनके शव को गुप्त रूप से ठिकाने लगाने का आरोप लगा था। सोहराबुद्दीन की मौत 26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद के पास हुई थी। तुलसीराम प्रजापति की 2006 में गुजरात-राजस्थान सीमा के पास एक अन्य कथित मुठभेड़ में मौत हुई। इन घटनाओं के बाद मामले की जांच गुजरात पुलिस की सीआईडी से हटाकर सीबीआई को देने और मुक़दमे को गुजरात से मुंबई ट्रांसफर करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद हुई।
जांच गुजरात से सीबीआई को क्यों सौंपी गई?
सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने गुजरात सीआईडी की जांच पर असंतोष जताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में सीबीआई को आगे की जांच करने का निर्देश दिया। बाद में मुकदमे को गुजरात से मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट के 2026 के फ़ैसले के मुताबिक, सीबीआई ने जांच के बाद कुल 38 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए थे।
ट्रायल के दौरान कुछ आरोपियों को अलग-अलग आदेशों से डिस्चार्ज किया गया और कुछ के खिलाफ आरोप हटाए गए। आख़िरकार 22 आरोपी मुकदमे में बचे और दिसंबर 2018 में उन्हें भी बरी कर दिया गया।
210 गवाहों में से 92 मुकर गए
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 210 गवाहों से पूछताछ की थी। इनमें से 92 गवाह मुकर गये यानी अभियोजन पक्ष के समर्थन में नहीं रहे या अपने पहले के बयानों से पीछे हट गए। यही आँकड़ा अब सुप्रीम कोर्ट की ताज़ा सुनवाई में भी चर्चा का प्रमुख मुद्दा बना।
बॉम्बे हाईकोर्ट के मई 2026 के फ़ैसले में भी 92 गवाहों के मुकरने का उल्लेख है। हालाँकि हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल इतने गवाहों के मुकरने से अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि पूरा ट्रायल ग़लत तरीक़े से हुआ। हाईकोर्ट ने अभियोजन के मामले को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित माना और कहा कि परिस्थितियों की कड़ी में कई महत्वपूर्ण कड़ियां साबित नहीं हो सकीं।
2018 में सभी को बरी किया था
21 दिसंबर 2018 को मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने माना था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ हत्या या कथित साजिश को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा।
ट्रायल कोर्ट ने अपने 358 पन्नों के फैसले में कहा था कि केवल संदेह या नैतिक आधार पर किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन पक्ष को ठोस और विश्वसनीय सबूतों के ज़रिए अपराध साबित करना ज़रूरी है। इसके बाद सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन और नायबुद्दीन ने 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की। सीबीआई ने हाईकोर्ट के सामने कहा था कि उसने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का फैसला नहीं किया है। इसके बाद हाईकोर्ट ने मई 2026 में इन अपीलों को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने बरी होने को क्यों बरकरार रखा?
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मई में अपने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन किया था और अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। हाईकोर्ट ने खास तौर पर कहा कि अभियोजन का मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और परिस्थितियों की कड़ी में कई महत्वपूर्ण कड़ियां साबित नहीं हो सकीं।
अदालत ने यह भी कहा कि सोहराबुद्दीन और कौसर बी को पुलिस ने अगवा किया था, यह बात अभियोजन पक्ष पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाया। इसी तरह कथित फर्जी एनकाउंटर के पीछे किसी साजिश या मकसद को भी पर्याप्त सबूतों से स्थापित नहीं किया जा सका। हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि मामले में किसी राजनीतिक-पुलिस गठजोड़ को साबित करने वाला सबूत नहीं था।अमित शाह के डिस्चार्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अमित शाह के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से अपनी सीमा स्पष्ट कर दी। अमित शाह को दिसंबर 2014 में ट्रायल कोर्ट ने इस मामले से डिस्चार्ज कर दिया था। बाद में उनके डिस्चार्ज को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर भी कार्यवाही हुई थी। मई 2026 के बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में भी इस पुराने मामले का उल्लेख किया गया था। हाईकोर्ट ने अमित शाह के डिस्चार्ज को चुनौती देने वाली एक अर्जी को खारिज करते हुए कहा था कि इस पहलू पर पहले अदालतें फैसला दे चुकी हैं। हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसा लगता है कि यह अर्ज़ी 'राजनीतिक विरोधियों के कहने पर किसी गलत मकसद से' दायर की गई थी।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार अब सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा पीठ ने साफ कर दिया कि वह हाईकोर्ट के फैसले के उस हिस्से यानी पैरा 43 को दोबारा नहीं खोलेगी, जिसमें अमित शाह के डिस्चार्ज को चुनौती देने वाली अर्जी पर बात की गई थी। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत यह उम्मीद करती है कि याचिका उस हिस्से को चुनौती नहीं दे रही है और ऐसे डिस्चार्ज को दोबारा नहीं खोला जाएगा जो पहले ही अंतिम हो चुका है।सीजेआई सूर्यकांत ने भी इस बात से सहमति जताई। इसलिए मौजूदा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का दायरा 22 आरोपियों के बरी होने और उनके खिलाफ हुए ट्रायल की निष्पक्षता से जुड़े सवालों तक है, अमित शाह के पुराने डिस्चार्ज तक नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब मुख्य सवाल क्या है?
सोमवार की सुनवाई के बाद फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट ने 22 आरोपियों की बरी को गलत माना है। अदालत ने केवल नोटिस जारी किया है और सीबीाई तथा आरोपियों से जवाब मांगा है। लेकिन सुनवाई में अदालत ने एक अहम सवाल जरूर उठाया है- क्या इतने बड़े पैमाने पर गवाहों के मुकरने के बावजूद यह सुनिश्चित हुआ कि आरोपियों का ट्रायल पूरी तरह निष्पक्ष और न्यायपूर्ण था?
अदालत कुछ गवाहों के बयान देखना चाहती है। इसके बाद ही यह तय होगा कि बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने की कोई वजह बनती है या नहीं। इस मामले में एक तरफ 2018 की विशेष सीबीआई अदालत और 2026 के बॉम्बे हाईकोर्ट के बरी करने वाले फ़ैसले हैं। दूसरी तरफ़ अब सुप्रीम कोर्ट के सामने 92 गवाहों के मुकरने और ट्रायल की निष्पक्षता से जुड़े सवाल हैं।