याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि CEC की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाला मामला पहले से ही बड़ी पीठ के सामने लंबित है। ऐसे में मौजूदा परिस्थितियों में निलंबन जैसा कुछ अंतरिम कदम उठाना जरूरी है। लेकिन अदालत ने मना कर दिया।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना एकतरफा फैसले लेने के आरोपों वाली याचिका पर केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग (ECI) और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा। अदालत ने CEC ज्ञानेश कुमार के अलावा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, ECI की महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग से भी जवाब मांगा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने से मना कर दिया।
यह मामला निर्वाचन आयोग में सामूहिक निर्णय लेने की संवैधानिक व्यवस्था और हाल में सामने आई उन रिपोर्टों से जुड़ा है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि आयोग के कुछ महत्वपूर्ण फैसले दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए।
CEC फैसलों के लिए जवाबदेह
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि इस मामले में नोटिस जारी करना जरूरी है। CJI सूर्यकांत ने कहा: “हमें नोटिस जारी करना होगा। नोटिस के बाद यदि वे आएं और रिपोर्ट से यह सामने आए कि चुनाव आयोग का कोई फैसला न तो बहुमत से लिया गया और न ही आमराय से, तो उन्हें उन फैसलों की व्याख्या करनी होगी।”CEC ज्ञानेश कुमार को फौरन हटाने की मांग की गई
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सुनवाई के दौरान CEC और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 का भी उल्लेख किया। इस धारा के तहत CEC को पद छोड़ने के बाद भी एक प्रकार की कानूनी सुरक्षा मिलती है।
विकास सिंह ने कहा: “यह पहले के कानून में नहीं था। धारा 16 इसे और महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि कानून ने मुख्य चुनाव आयुक्त को जिस तरह का अधिकार दिया है, उसे देखते हुए यह प्रावधान महत्वपूर्ण है।”
इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा: “पद पर रहते हुए संरक्षण हमेशा समझा जाता है।” लेकिन विकास सिंह ने कहा कि कानून में “is or was” यानी “है या था” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि पद छोड़ने के बाद भी यह सुरक्षा बनी रहती है। उन्होंने कहा: “किसी अन्य संवैधानिक पदाधिकारी के लिए इस तरह की सुरक्षा सुनने में नहीं आती। प्रधानमंत्री को भी ऐसी सुरक्षा नहीं है।” इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा:
“न्यायाधीशों को भी नहीं।” विकास सिंह ने स्पष्ट किया कि फिलहाल वह धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती नहीं दे रहे हैं।
हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत से अंतरिम राहत की मांग की। उन्होंने कहा कि सुनवाई लंबित रहने के दौरान CEC ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित किया जाए या उन्हें CEC के रूप में काम करने के अधिकार से अलग किया जाए और दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों को उनकी जगह काम करने दिया जाए। सिंह ने कहा: “अंतरिम रूप से अनूप बरनवाल वाली स्थिति बहाल की जाए और भारत के चीफ जस्टिस को चयन समिति का सदस्य बनाया जाए।” उन्होंने कहा कि मामला बेहद गंभीर है और इससे लोकतंत्र की बुनियाद प्रभावित हो सकती है।
विकास सिंह ने कहा: “हम एक बेहद गंभीर स्थिति से निपट रहे हैं, जो हमारे लोकतंत्र के आधार को कमजोर कर सकती है। पूरी दुनिया में हमारा लोकतंत्र जिस तरह चुनाव कराने के लिए जाना जाता है, वह महत्वपूर्ण है। 76 वर्षों से चुनाव आयोग ने सम्मान हासिल किया है। व्यक्तिगत फैसलों पर सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन अब स्थिति ऐसी है कि स्वयं CEC, जो एक संवैधानिक प्राधिकारी हैं, उस कानून के बिल्कुल विपरीत तरीके से काम कर रहे हैं जिसके तहत उनकी नियुक्ति हुई है।” उन्होंने आगे कहा कि अगर अदालत ने कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया तो कथित तौर पर ऐसी कार्यप्रणाली जारी रह सकती है।
CJI ने कहा- पहले प्रामाणिक जानकारी आने दें
अंतरिम राहत की मांग पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत के सामने पहले प्रामाणिक जानकारी आना जरूरी है। उन्होंने कहा: “हमारे सामने पहले कुछ प्रामाणिक जानकारी आने दीजिये। 10 दिन इंतजार करते हैं।” इससे संकेत मिलता है कि अदालत फिलहाल CEC को हटाने या उनके अधिकार सीमित करने जैसे अंतरिम कदम उठाने के बजाय संबंधित पक्षों के जवाब और रिकॉर्ड का इंतजार करना चाहती है।गलत पाए गए तो ECI के फैसले रद्द किए जा सकते हैंः जब अदालत के सामने चुनाव आयोग के उन फैसलों को रद्द करने का सवाल उठा, जिन पर याचिका में सवाल उठाए गए हैं, तो बेंच ने कहा कि यदि फैसलों में कोई कानूनी गलती पाई जाती है तो अदालत उन्हें रद्द कर सकती है। बेंच ने कहा: “अगर फैसलों में कुछ गलत है तो हम उन्हें रद्द कर सकते हैं।”
अदालत ने यह भी कहा कि 1993 का संशोधन और 2023 का कानून, दोनों ही निर्वाचन आयोग के कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया से संबंधित प्रावधान करते हैं। बेंच के अनुसार, आयोग के कामकाज में पहले सर्वसम्मति से निर्णय लेने की कोशिश की जानी चाहिए। यदि सर्वसम्मति नहीं बनती है, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जा सकता है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर भी मांगा जवाब
विकास सिंह ने अदालत का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों का सीधे जवाब नहीं दिया है।
उन्होंने कहा कि आयोग ने इसके बजाय बेहद अस्पष्ट भाषा में एक प्रेस रिलीज जारी की। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत केवल अखबार की रिपोर्ट के आधार पर कोई आदेश नहीं दे सकती। उन्होंने कहा: “अखबार की रिपोर्ट 100 प्रतिशत सही हो सकती है, आंशिक रूप से सही हो सकती है या आंशिक रूप से गलत भी हो सकती है। हम आज उसके आधार पर आदेश पारित नहीं कर सकते। लेकिन हम निश्चित रूप से जवाब चाहते हैं। उसके बाद जो भी प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं होंगी, हम उन्हें जारी करेंगे।”अब 10 दिन में जवाब का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग और संबंधित अधिकारियों को जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया है। अदालत अब यह देखना चाहती है कि क्या वास्तव में ऐसे फैसले लिए गए जिन्हें निर्वाचन आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति या बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं था। मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आरोप केवल प्रशासनिक प्रक्रिया से संबंधित नहीं हैं, बल्कि मतदाता सूची, मतदान के अधिकार और निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता जैसे बुनियादी सवालों से जुड़े हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC को निलंबित करने या उनके अधिकार सीमित करने की अंतरिम मांग पर कोई आदेश नहीं दिया है और संबंधित पक्षों के जवाब तथा प्रामाणिक रिकॉर्ड का इंतजार करने का फैसला किया है।याचिका में ‘एक व्यक्ति के हाथ में सामूहिक अधिकार’ का आरोप
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग में सत्ता का लगातार केंद्रीकरण हो रहा है और CEC ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो संविधान ने पूरे निर्वाचन आयोग को सामूहिक रूप से दिए हैं। याचिका में रिट ऑफ क्वो वारंटो (Quo Warranto) जारी करने की मांग की गई है। इसका मकसद यह पूछना है कि CEC ज्ञानेश कुमार किस कानूनी अधिकार के तहत ऐसे फैसले ले रहे हैं और अपने पद पर रहते हुए निर्वाचन आयोग की सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति का व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को एक सामूहिक संस्था के रूप में निर्णय लेने की शक्ति दी गई है। यदि तीनों सदस्यों में किसी मुद्दे पर सहमति नहीं होती है, तो फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाना चाहिए। लेकिन याचिका में हाल की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि आयोग ने ऐसे कई फैसले लिए, जिन पर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी।28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच 14 आपत्तियां
याचिका में दावा किया गया है कि 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के नाम पर लिए गए विभिन्न कदमों को लेकर कुल 14 आपत्तियां दर्ज कीं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन मामलों में:
- एजेंडा समय पर उपलब्ध नहीं कराया गया या उसमें देरी हुई।
- बैठकों के मिनट्स को लेकर समस्या रही।
- मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं में बदलाव किए गए।
- दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना अदालतों में अपीलें दाखिल की गईं।
- निर्वाचन आयोग के सामूहिक अधिकारों का कथित रूप से एक कार्यालय या एक व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल किया गया।
मतदाता सूची और वोट देने के अधिकार से जुड़ा गंभीर संवैधानिक सवाल
याचिका में कहा गया है कि यदि निर्वाचन आयोग जैसी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था को दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल वास्तव में या व्यवहार में उसके किसी एक पदाधिकारी द्वारा किया जा सकता है, तो यह गंभीर संवैधानिक सवाल खड़ा करता है। याचिका के अनुसार, निर्वाचन आयोग के फैसले यह तय करते हैं कि कौन मतदाता सूची में रहेगा और कौन मतदान कर सकेगा। इसलिए यदि ऐसे फैसले संविधान द्वारा बनाई गई प्राधिकृत संस्था के बजाय उसके किसी एक सदस्य द्वारा लिए जाते हैं, तो उनकी वैधता पर गंभीर सवाल उठता है। याचिका में मांग की गई है कि यदि यह पाया जाता है कि CEC ने 2023 के कानून की धारा 18 के अनुरूप निर्वाचन आयोग का सामूहिक निर्णय लिए बिना आयोग के अधिकारों का इस्तेमाल किया है या कर रहे हैं, तो ऐसे फैसलों और अधिकारों के इस्तेमाल को अवैध घोषित किया जाए।SIR को भी चुनौती
याचिका में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि SIR और उसके तहत किए गए सभी कार्यों, फैसलों, निर्देशों तथा उनसे जुड़े परिणामस्वरूप उठाए गए कदमों को शुरुआत से ही शून्य (void ab initio) और बिना कानूनी अधिकार के घोषित किया जाए।
याचिका का ड्राफ्ट अधिवक्ता सुदीप चंद्र ने तैयार किया है और इसे अधिवक्ता मुदित गुप्ता के माध्यम से दाखिल किया गया है।अदालत ने फिलहाल इस सवाल पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। उसने केवल यह तय किया है कि आरोपों पर संबंधित पक्षों को सुनने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाए। यही वजह है कि CEC के फौरन निलंबन की मांग स्वीकार नहीं हुई, लेकिन मामले को नोटिस जारी करके न्यायिक जांच के दायरे में जरूर लाया गया है। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने अगला महत्वपूर्ण चरण चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के जवाब तथा उन दस्तावेजों की जांच होगी जिनके आधार पर CEC ज्ञानेश कुमार और आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।