सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को CBI की उस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह को कोयला ब्लॉक आवंटन (कोल घोटाला) मामले में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने मनमोहन सिंह के खिलाफ निचली अदालत द्वारा जारी समन और मामले को पूरी तरह से बंद कर दिया है।
चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सन् 2015 में एक विशेष अदालत द्वारा डॉ. मनमोहन सिंह को जारी किए गए समन को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि CBI द्वारा दाखिल क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला उचित नहीं था। शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा: "हम इस बात से संतुष्ट हैं कि विद्वान सत्र न्यायाधीश के पास CBI की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने और संज्ञान लेने के कोई मजबूत कारण नहीं थे। नतीजतन, हम विशेष अनुमति याचिका (SLP) को स्वीकार करते हैं और विशेष न्यायाधीश के आक्षेपित आदेशों को रद्द करते हैं। इसके परिणामस्वरूप CBI द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किया जाता है और मामले को गुण-दोष के आधार पर बंद किया जाता है।"
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कैसे बदनाम किया गया डॉ मनमोहन सिंह और कांग्रेस को

1960 के दशक के बाद भारतीय राजनीति के सबसे उथल-पुथल भरे दौर में से 2011 से 2014 के बीच का समय माना जाता है। इस अवधि के दौरान कोयला ब्लॉक आवंटन (जिसे मीडिया और विपक्ष ने 'कोलगेट' या 'कोयला घोटाला' नाम दिया) भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया। तत्कालीन UPA-2 सरकार और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे जनाक्रोश और एक आक्रामक राजनीतिक विपक्ष के संयुक्त प्रभाव ने मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत और प्रशासनिक साख को व्यापक क्षति पहुँचाई।
इस राजनीतिक अभियान का मुख्य आधार इंडिया अगेंस्ट करप्शन (IAC) आंदोलन था, जिसका नेतृत्व अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल जैसे चेहरे कर रहे थे। हालांकि इस आंदोलन की शुरुआत मुख्य रूप से जनलोकपाल विधेयक की मांग को लेकर हुई थी, लेकिन जल्द ही इसने UPA सरकार के विभिन्न प्रशासनिक फैसलों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया। IAC के नेताओं ने देश भर में रैलियां, भूख हड़तालें और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह माहौल बनाया कि मनमोहन सिंह सरकार के तहत बड़े पैमाने पर नीतिगत और वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। इस जन-आंदोलन ने आम जनता के मन में यह धारणा बनाने में अहम भूमिका निभाई कि तत्कालीन केंद्र सरकार और कांग्रेस भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है।

बीजेपी का चेहराः जनाक्रोश का लाभ उठाते हुए BJP ने संसद से लेकर सड़क तक सरकार के खिलाफ एक संगठित और चौतरफा राजनीतिक घेराबंदी शुरू की। 2012 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक मसौदा रिपोर्ट लीक हुई, जिसमें कोयला ब्लॉक आवंटन के कारण सरकारी खजाने को भारी काल्पनिक नुकसान (notional loss) होने का अनुमान लगाया गया था। चूंकि 2006 से 2009 के बीच कोयला मंत्रालय का प्रभार खुद डॉ. मनमोहन सिंह के पास था, इसलिए बीजेपी ने सीधे मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग उठाई। बीजेपी ने संसद के सत्रों को लगातार बाधित किया और यह तर्क दिया कि जब तक प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देते, तब तक कोई चर्चा संभव नहीं है।

तत्कालीन UPA सरकार और खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इन आरोपों का पुरजोर विरोध किया और इसे तथ्यहीन तथा राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। मनमोहन सिंह ने संसद में अपना पक्ष रखते हुए प्रसिद्ध पंक्तियां कही थीं- "हज़ारों जवाबों से अच्छी है मेरी ख़ामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू ढकी।" सरकार का मुख्य तर्क यह था कि कोयला ब्लॉकों का आवंटन उस समय की स्थापित नीति और राज्यों की सिफारिशों के आधार पर किया गया था, ताकि देश में बिजली और इस्पात क्षेत्र के विकास को गति दी जा सके। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि CAG द्वारा निकाला गया नुकसान का अनुमान काल्पनिक था और आवंटन से किसी निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुँचाने का कोई सबूत नहीं था।
तमाम स्पष्टीकरणों के बावजूद, बीजेपी के आक्रामक अभियानों और मीडिया ट्रायल के कारण यह फर्जी मुद्दा जनता के बीच गहराई से घर कर गया। इसने न केवल डॉ. मनमोहन सिंह की छवि को एक निष्पक्ष और ईमानदार अर्थशास्त्री से बदलकर एक असहाय नेता के रूप में पेश किया, बल्कि इसने 2014 के आम चुनावों के राजनीतिक नैरेटिव को भी तय कर दिया, जिसका खामियाजा कांग्रेस और पूरे UPA गठबंधन को उठाना पड़ा।

वरिष्ठ वकीलों ने अदालत में क्या दलील दी

शीर्ष अदालत में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। सिब्बल ने अदालत से अनुरोध किया कि याचिका का निपटारा करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ की गई टिप्पणियों को पूरी तरह से हटा (effaced) दिया जाए। मामले की पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा: स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश के खिलाफ जाकर हिंडाल्को (Hindalco) को कोयला ब्लॉक आवंटित करने का फैसला पूरी तरह से एक प्रशासनिक निर्णय था। किसी निजी संस्था को खदान या कोयला ब्लॉक आवंटित करना अवैध नहीं है और न ही कानून में इस पर कोई रोक थी। CBI द्वारा दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल किए जाने के बावजूद विशेष अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री को समन जारी किया था।
1 अप्रैल 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद से यह मामला लंबित था। बुधवार को शीर्ष अदालत ने समन को रद्द करते हुए इस पूरे विवाद पर विराम लगा दिया।