Supreme Court government school entry restrictions- सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी स्कूलों में पत्रकारों, YouTubers और बाहरी लोगों की एंट्री, फोटो-वीडियोग्राफी पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका सुनने से इनकार किया। मामला CJP के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान से जुड़ा है।
सरकारी स्कूलों में पत्रकारों, YouTubers, सोशल मीडिया से जुड़े लोगों और सिविल सोसायटी प्रतिनिधियों के प्रवेश तथा स्कूलों में फोटो-वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइवस्ट्रीमिंग पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस रिट याचिका को सुनने से मना कर दिया।
- अनुच्छेद 32 क्या हैः भारतीय संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का मौलिक अधिकार देता है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसे "संविधान का दिल और आत्मा" कहा था।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब Cockroach Janat Party (CJP) की ओर से सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को सामने लाने के लिए ‘School Thik Karo’ यानी ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चलाया जा रहा है। अभियान के तहत सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे की स्थिति को सार्वजनिक करने का प्रयास किया जा रहा है।
याचिका न सुनने का कारण नहीं बताया
याचिकाकर्ता प्रिया मिश्रा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई की। पीठ में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे। पीठ ने साफ कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस रिट याचिका को सुनने के लिए इच्छुक नहीं है। अदालत ने कहा: “We are not inclined to entertain the writ petition filed under Article 32 of the Constitution of India.” याचिका का मामला Priya Mishra v. Union of India & Ors. है और इसे Writ Petition (Civil) No. 1095/2026 के रूप में दर्ज किया गया था।
राजस्थान के 16 अगस्त के सर्कुलर को दी गई थी चुनौती
याचिका में राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से 16 अगस्त 2026 को जारी सर्कुलर को विशेष रूप से चुनौती दी गई थी। इस सर्कुलर के मुताबिक सरकारी स्कूल परिसर में किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश के लिए स्कूल के प्रधानाचार्य से पहले अनुमति लेना जरूरी है। इसके अलावा स्कूल में फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइवस्ट्रीमिंग के लिए भी पूर्व लिखित अनुमति की आवश्यकता बताई गई है। याचिका में दावा किया गया कि इस तरह के नियमों का असर उन पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और डिजिटल मीडिया से जुड़े लोगों पर पड़ सकता है जो सार्वजनिक हित के मुद्दों को सामने लाने के लिए सरकारी संस्थानों का दस्तावेजीकरण करते हैं।उत्तर प्रदेश में भी सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों पर प्रतिबंध
याचिका में उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से जारी 19 अगस्त 2026 के आदेश का भी उल्लेख किया गया। इस आदेश में बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों को सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना परिषद के स्कूलों में प्रवेश करने तथा वहां फोटो या वीडियो बनाने से रोका गया है। याचिका के मुताबिक उत्तर प्रदेश के दूसरे जिलों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए हैं। इनमें आजमगढ़, बलिया, बस्ती, बलरामपुर, शामली और आगरा शामिल हैं।याचिकाकर्ता ने किन मौलिक अधिकारों का हवाला दिया?
याचिकाकर्ता ने इन प्रतिबंधों को संविधान में मिले कई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था। याचिका में अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g), 21 और 21-A का हवाला दिया गया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में पत्रकारिता और सार्वजनिक संस्थानों से जुड़ी सूचनाओं को जनता तक पहुंचाने का अधिकार भी शामिल है। हालांकि याचिका में यह भी स्वीकार किया गया कि राज्य का दायित्व है कि वह सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की निजता, गरिमा और सुरक्षा की रक्षा करे।बच्चों की तस्वीर और स्कूल की हालत में अंतर का तर्कः याचिका में एक महत्वपूर्ण अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया गया। इसमें कहा गया कि किसी बच्चे की पहचान उजागर करने वाली तस्वीर या वीडियो रिकॉर्ड करना और किसी सरकारी स्कूल की भौतिक स्थिति को रिकॉर्ड करना एक ही बात नहीं है। याचिकाकर्ता के मुताबिक बच्चों की सुरक्षा और निजता के नाम पर ऐसे प्रतिबंध नहीं लगाए जाने चाहिए जिससे सार्वजनिक हित में स्कूलों के बुनियादी ढांचे की स्थिति का दस्तावेजीकरण भी असंभव हो जाए। याचिका में खास तौर पर स्कूलों के क्लासरूम, भवन, शौचालय, पीने के पानी की व्यवस्था, बिजली, मिड-डे मील और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को रिकॉर्ड करने की जरूरत बताई गई।
‘ब्लैंकेट बैन’ हटाने की मांग
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उन आदेशों को उस सीमा तक रद्द करने की मांग की थी, जहां वे व्यापक या blanket restrictions लगाते हैं। याचिका में यह भी अनुरोध किया गया था कि सार्वजनिक हित में दस्तावेजीकरण को नियंत्रित करने वाले किसी भी नियम को reasonableness, necessity और proportionality यानी तर्कसंगतता, आवश्यकता और अनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों पर विस्तृत फैसला देने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल याचिका को entertain करने से ही इनकार कर दिया।सीजेपी का स्कूल ठीक करो अभियान और याचिका का महत्व
इस मामले का राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। याचिका ऐसे समय दाखिल हुई जब Cockroach Janat Party (CJP) सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं और उनकी कमियों को सामने लाने के लिए ‘School Thik Karo’ अभियान चला रही है। इस अभियान के जरिए सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सार्वजनिक करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियोग्राफी पर प्रतिबंध को लेकर यह सवाल उठा कि क्या सार्वजनिक संस्थानों की स्थिति की स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर इस तरह की पाबंदी लगाई जा सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश इन प्रतिबंधों की संवैधानिक वैधता पर कोई विस्तृत निर्णय नहीं देता। अदालत ने केवल संबंधित अनुच्छेद 32 याचिका को सुनने से इनकार किया है। लेकिन सवाल ये है कि लोकतंत्र में ऐसे प्रतिबंधों को जायज़ कैसे ठहराया जा सकता है। अदालत को वाजिब कारण बताना चाहिए था कि आखिर उसने इतनी महत्वपूर्ण याचिका को सुनने से क्यों मना किया।