सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को वैध ठहराते हुए 27 मई को कहा कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने/हटाने के लिए नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है। ऐसे संदिग्ध नागरिकता वाले नामों को उसे चार हफ्ते में केंद्र सरकार को भेजना होगा।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 27 मई को बिहार और अन्य राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की वैधता को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की तीन सदस्यीय बेंच ने मतदाता सूची से जुड़े नागरिकता के मुद्दे को भी साफ कर दिया। आम लोगों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि उसकी नागरिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या स्थिति साफ की है।
ECI नागरिकता की जांच कर सकता है, लेकिन सीमित दायरे में
इस मामले के सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर कि क्या चुनाव आयोग यानी ईसीआई किसी व्यक्ति की नागरिकता सीमित दायरे में तय कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग ऐसा कर सकता है, लेकिन सिर्फ यह तय करने के सीमित उद्देश्य से कि उस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं। इससे उस शख्स की नागरिकता खत्म नहीं हो जाएगी।
- अगर किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज विश्वसनीय नहीं लगता या संदेह पैदा करता है, तो चुनाव आयोग उसे मतदाता सूची में दर्ज करने से मना कर सकता है या कानून के अनुसार नाम हटाने की कार्यवाही कर सकता है।
- आयोग का निर्णय अंतिम नागरिकता निर्धारण नहीं माना जाएगा।
- कोर्ट ने कहा कि अगर आयोग किसी व्यक्ति की पात्रता को लेकर संतुष्ट नहीं होता, तो उसे उस व्यक्ति का मामला केंद्र सरकार के सक्षम अथॉरिटी को भेजना होगा। चुनाव आयोग का फैसला केवल मतदाता सूची तक सीमित रहेगा और नागरिकता का अंतिम निर्णय संबंधित ट्रिब्यूनल ही करेगा।
- चुनाव आयोग को यह निर्देश भी दिया गया कि 2003 की मतदाता सूची से “संदिग्ध नागरिकता” के आधार पर हटाए गए लोगों के नाम चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को भेजे जाएं।
इस फैसले का नतीजाः सुप्रीम कोर्ट के 27 मई के फैसले ने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) को एक तरह से असीमित अधिकार दे दिया है। विपक्ष और जनसंगठनों का यह आरोप और आशंका सही साबित हुई कि एसआईआर एक तरह से नागरिकता तय करने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल होगा। आसाना शब्दों में इसे समझिए- मतदाता सूची तैयार करने का काम आयोग के पास है लेकिन इस काम को सरकार के कर्मचारी अंजाम देते हैं। आम लोगों का पहला संघर्ष इस मतदाता सूची में बने रहने के लिए होगा। जैसे ही उसका नाम इस सूची कटेगा या नहीं होगा तो वो भारत में संदिग्ध नागरिक बन जाएगा। उसका नाम चुनाव आयोग को केंद्र सरकार की किसी अथॉरिटी या ट्रिब्यूनल के पास भेजा जाएगा। वहां से तय होगा कि उस शख्स का नाम मतदाता सूची में जोड़ा जाए या नहीं। अगर अथॉरिटी या ट्रिब्यूनल मना कर देता है तो उस शख्स की भारतीय नागरिकता खत्म हो जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि SIR प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि मतदाताओं से दस्तावेज मांगना नागरिकता की मौजूदा धारणा को खत्म करना नहीं है, बल्कि रिकॉर्ड की पुष्टि करने की एक प्रक्रिया है। कोर्ट ने कहा, “नागरिकता का परसेप्शन (धारणा) बना रहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सत्यापन नहीं किया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया संविधान में निहित “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव” की भावना को मजबूत करती है और चुनाव आयोग को इसे संचालित करने का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जयमॉल्या बागची की बेंच ने यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनाया, जिनमें जून 2025 में बिहार में शुरू किए गए SIR अभियान को चुनौती दी गई थी। अदालत ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 324, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत चुनाव आयोग को विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार प्राप्त है।
फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जब कानून स्वयं चुनाव आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण करने की अनुमति देता है, तो केवल इसलिए इस प्रक्रिया को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि यह नियमित पुनरीक्षण की पारंपरिक प्रक्रिया से पूरी तरह मेल नहीं खाती।
अदालत ने कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुद्धता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद है। कोर्ट ने माना कि पिछले 40 वर्षों में बड़े पैमाने पर नाम जुड़ने और हटने, तेज शहरीकरण, पलायन और संभावित डुप्लीकेशन जैसी परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग द्वारा विशेष पुनरीक्षण कराना उचित था।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि SIR प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि मतदाताओं से दस्तावेज मांगना नागरिकता की मौजूदा धारणा को खत्म करना नहीं है, बल्कि रिकॉर्ड की पुष्टि करने की एक प्रक्रिया है। कोर्ट ने कहा, “नागरिकता की धारणा बनी रहती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सत्यापन नहीं किया जा सकता।”
कई राज्यों में पूरा हो चुका है SIR
सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में SIR पूरा किया जा चुका है, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान समेत कई राज्यों में यह प्रक्रिया जारी है। इस मामले में जनवरी 2026 में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। याचिकाएं जून 2025 में दायर की गई थीं।किन लोगों ने दी थी चुनौती?
इस मामले में Association for Democratic Reforms, राजनीतिक कार्यकर्ता Yogendra Yadav, Mahua Moitra, Manoj Jha, K. C. Venugopal और Supriya Sule समेत कई नेताओं और संगठनों ने याचिकाएं दायर की थीं।याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा?
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि SIR एक “पिछले दरवाजे से नागरिकता जांच” जैसा अभियान है, जो NRC की तरह काम करता है। उनका कहना था कि पहले से मतदाता सूची में शामिल लोगों पर दोबारा नागरिकता साबित करने का बोझ डालना कानून के खिलाफ है।उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता तय करने वाली संस्था नहीं है और यह अधिकार केवल नागरिकता कानून के तहत सक्षम प्राधिकरणों को है। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने “लाल बाबू हुसैन” फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक बार मतदाता सूची में नाम दर्ज हो जाने पर नागरिकता की धारणा उसके पक्ष में मानी जाती है।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि SIR नागरिकता तय करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने का अभियान है। आयोग ने दलील दी कि संविधान नागरिकों को ही मतदान का अधिकार देता है, इसलिए मतदाता सूची से गैर-नागरिकों को हटाना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।आयोग ने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया “NRC जैसी कठोर जांच” नहीं बल्कि एक “लचीला और उदार सत्यापन मॉडल” है, जिसमें पर्याप्त प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।