सुप्रीम कोर्ट में दायर नई याचिका में ECI में चल रहे विवाद को बड़े संदर्भ में देखने के लिए SIT की मांग की गई है। इसमें सीईसी के अलावा सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग, डायरेक्टर जनरल (IT) सीमा खन्ना पर भी मुकदमा चलाने की मांग की गई है।
कौन चला रहा था चुनाव आयोगः मनीष गर्ग, सीमा खन्ना, ज्ञानेश कुमार
चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को नई याचिका दायर कर ज्ञानेश कुमार, मनीष गर्ग, सीमा खन्ना समेत चुनाव आयोग के कुछ अन्य अधिकारियों के खिलाफ वैधानिक कर्तव्य उल्लंघन के मामले में आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की गई है। साथ ही SIR के दौरान करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक जांच/Special Investigation Team (SIT) गठित करने की मांग की गई है। अभी तक इस मामले में दायर याचिकाओं में सिर्फ ज्ञानेश कुमार गुप्ता का ही जिक्र हो रहा था लेकिन अब नई याचिका में मनीष गर्ग और सीमा खन्ना के नाम भी सामने आये हैं।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि अगर CEC ने दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना या बहुमत की राय के विपरीत कोई फैसले, दिशानिर्देश या सॉफ्टवेयर बदलाव किए हैं, तो उन्हें असंवैधानिक, अधिकार क्षेत्र से बाहर और शुरू से ही शून्य घोषित किया जाए।
अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल हुई याचिका
यह याचिका वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है। उनके पक्ष से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड चंद कुरैशी हैं। याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार के अलावा सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग, डायरेक्टर जनरल (IT) सीमा खन्ना तथा जांच में जिम्मेदार पाए जाने वाले अन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने सक्षम प्राधिकारी को Representation of the People Act, 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज करने और अभियोजन शुरू करने का निर्देश देने की मांग की है। यह धारा मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन या सुधार से जुड़े कुछ आधिकारिक कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान करती है।कौन हैं मनीष गर्ग
भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता के बाद दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं। तीनों को समान अधिकार प्राप्त हैं। इनके बाद मनीष गर्ग का नाम आता है जो चुनाव आयोग में वरिष्ठ डिप्टी चुनाव आयुक्त हैं। आरोप है कि चुनाव आयोग के तमाम विवादित फैसलों में मनीष गर्ग की भूमिका रही है। सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अपनी आपत्तियों में कई बार मनीष गर्ग का नाम लिया है।
- 2025 में बिहार SIR की तैयारियों की समीक्षा करने वाली ECI टीम का नेतृत्व उन्होंने किया था।
- सितंबर 2026 में वाराणसी में EVM और VVPAT की First Level Checking (FLC) संबंधी कार्यशाला भी उनके नेतृत्व/अध्यक्षता में हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश के 21 जिलों के चुनाव अधिकारी शामिल हुए।
- अगस्त 2026 में CEC ज्ञानेश कुमार के लखनऊ दौरे के दौरान भी Maneesh Garg ECI delegation के सदस्य थे।
Form 6 में बदलाव पर भी सवाल
याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े Form 6 में कथित तौर पर अनधिकृत बदलाव किया गया। Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता के पंजीकरण के लिए किया जाता है। याचिका के मुताबिक, मई 2026 में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने Form 6 में बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी। जोशी की आपत्ति थी कि वैधानिक Form 6 में बदलाव तब तक नहीं किया जा सकता जब तक Registration of Electors Rules, 1960 में संबंधित संशोधन न किया जाए। इसके बाद संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई थी।याचिका के अनुसार इसके बावजूद ECINet पोर्टल पर Form 6 में ऐसे सवाल जोड़े गए जिनमें आवेदक या उसके रिश्तेदारों की पिछली SIR मतदाता सूची में मौजूदगी से संबंधित जानकारी मांगी गई। याचिका में संधू की बाद की टिप्पणी का भी हवाला दिया गया है, जिसमें इस बदलाव को कथित तौर पर “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताया गया था।
तीन सदस्यीय आयोग में मतभेद का आरोप
यह याचिका उस समय दाखिल हुई है जब The Indian Express की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी। इनमें Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटा के प्रबंधन तथा केंद्रीकरण से जुड़े मुद्दे शामिल थे।रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ आपत्तियां ऐसे फैसलों से संबंधित थीं जिन्हें दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या उनकी सिफारिशों के विपरीत लिया गया था। हालांकि, चुनाव आयोग ने आयोग के भीतर किसी मतभेद की बात से इनकार किया है। ECI का कहना है कि SIR समेत पिछले एक साल में लिए गए फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी शामिल थी।
2023 के कानून की धारा 18 का हवाला
याचिका में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो मामला बहुमत की राय से तय किया जाना चाहिए। इसी आधार पर याचिका में मांग की गई है कि ज्ञानेश कुमार के तहत शुरू, मंजूर या लागू किए गए ऐसे सभी फैसलों, निर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को रद्द किया जाए, जिन्हें पूर्ण आयोग की सहमति के बिना या चुनाव आयुक्तों की बहुमत राय के खिलाफ लागू किया गया हो।13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने की SIT जांच
याचिका का एक बड़ा हिस्सा SIR के दौरान मतदाता सूची से कथित तौर पर हटाए गए नामों की जांच से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र Judicial Inquiry Commission/SIT गठित करने की मांग की है। इसमें साइबर सुरक्षा और IT विशेषज्ञों को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित जांच में ECINet और ERONet डेटाबेस का फोरेंसिक ऑडिट कराने तथा SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कथित तौर पर करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने की परिस्थितियों की जांच करने की मांग की गई है। यह आंकड़ा फिलहाल याचिकाकर्ता के आरोप/दावे के रूप में सामने आया है, अदालत द्वारा स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख अपीलों का मुद्दा
याचिका में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने को चुनौती देने वाली करीब 16.10 लाख अपीलों का भी उल्लेख किया गया है।याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि इन अपीलों को कथित तौर पर चुनाव आयोग के नाम पर दाखिल किया गया। SIT से इन अपीलों को दाखिल करने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान और उनकी भूमिका की जांच करने की मांग की गई है।