ECI CEC Selection CJI: सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि जब CBI डायरेक्टर और लोकपाल की नियुक्ति करने वाले चयन पैनल में CJI शामिल हैं, तो सीईसी और चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया से बाहर रखने की क्या वजह है?
देश में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया है कि संसद ने नया कानून बनाते समय मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखने का फैसला क्यों किया?
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि "चुनाव आयोग को न केवल स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, बल्कि उसे स्वतंत्र रूप से काम करते हुए दिखना भी चाहिए।"
- अन्य चयन समितियों से तुलना: पीठ ने टिप्पणी की कि जब सीबीआई (CBI) निदेशक और लोकपाल की नियुक्ति करने वाले चयन पैनल में CJI शामिल हैं, तो देश के लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के पदों की चयन प्रक्रिया से CJI को बाहर रखने का क्या कारण हो सकता है?
- "न्याय होना ही नहीं, दिखना भी चाहिए": अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रधानमंत्री पर अविश्वास का मामला नहीं है। पीठ ने कहा- "हम यह नहीं कह रहे हैं कि मौजूदा समिति से निष्पक्षता हासिल नहीं हुई है। लेकिन जैसे न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए, हम उसी दूसरे पहलू की बात कर रहे हैं।"
मामला और विवाद की पृष्ठभूमि
यह सुनवाई 2023 के उस कानून (Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हो रही है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति का प्रावधान किया गया है। वर्तमान चयन पैनल में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता), और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।इससे पहले वर्ष 2023 में ही सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चयन पैनल में प्रधानमंत्री, CJI और विपक्ष के नेता शामिल रहेंगे। हालांकि, संसद ने बाद में कानून बनाकर CJI की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया।
केंद्र सरकार की दलीलें
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता और अटॉर्नी जनरल (AG) आर. वेंकटरमणी ने सरकार का पक्ष रखा: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि अदालत को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ काम करेंगे। उन्होंने कहा, "लोगों को प्रधानमंत्री पर भरोसा होना चाहिए। अगर उनके फैसलों को अविश्वास की नजर से देखा जाएगा, तो फिर क्या मंत्रिमंडल चुनते समय भी किसी पूर्व न्यायाधीश या बाहरी व्यक्ति से सलाह लेने का प्रावधान होना चाहिए?"अटॉर्नी जनरल ने कहा कि केवल इसलिए संसद के कानून पर सवाल नहीं उठाया जा सकता कि कोई दूसरा मॉडल भी संभव था। उन्होंने कहा कि "संसद का मुंह बंद नहीं किया जा सकता" और राज्य के तीनों अंगों (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि CJI की जगह कैबिनेट मंत्री को रखने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती। पिछले सात दशकों से अधिक समय से चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां पूरी तरह कार्यपालिका द्वारा ही की जाती रही हैं और देश में हमेशा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न हुए हैं।
केंद्र सरकार ने आग्रह किया कि इस मामले में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं, इसलिए इसे एक बड़ी संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं (प्रशांत भूषण, गोपाल शंकरनारायणन, डी. शेषाद्रि नायडू और संजय पारिख) ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि 20 दिनों की लंबी सुनवाई के बाद सरकार अब यह मांग उठा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने की केंद्र सरकार की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।