नेता विपक्ष राहुल गांधी से नहीं, शिवसेना यूबीटी नेता संजय राउत के आचरण पर सीजेआई सूर्यकांत ने की थी टिप्पणी। उन्हीं से जवाब मांगा। राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन की याचिका के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी। लेकिन खबरें राहुल गांधी को लेकर चलाई गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना (यूबीटी) के नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और न्यायपालिका के खिलाफ की गई उनकी टिप्पणियों पर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने यह कदम उस समय उठाया, जब वह चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली INDIA गठबंधन के नेताओं की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। हालांकि चीफ जस्टिस ने टिप्पणी कल गुरुवार को राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी और स्पष्टीकरण मांगा था। उन्होंने किसी नेता का नाम नहीं लिया। लेकिन मीडिया के बड़े वर्ग ने इसे सीधे राहुल गांधी पर टिप्पणी समझा था और खबरें भी उसी अनुसार चलाई थीं। लाइव लॉ ने आज शुक्रवार को इस संबंध में नई रिपोर्ट प्रकाशित कर बताया है कि टिप्पणी संजय राउत को लेकर थी।
लाइव लॉ के मुताबिक 15 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिका में संजय राउत की ओर से उठाए गए मामले पर फिलहाल अस्थायी रूप से विचार किया जा रहा है, लेकिन इसके लिए उन्हें अपने आचरण के बारे में स्पष्टीकरण देना होगा।
राउत छठे याचिकाकर्ता हैं
अदालत ने आदेश में कहा, “W.P. (C) No. 1351/2026 (Item 25) में याचिकाकर्ता संख्या 6 की ओर से दायर याचिका को अस्थायी आधार पर स्वीकार किया जाता है, बशर्ते वे अपने आचरण के बारे में स्पष्टीकरण दें।” संजय राउत इस संयुक्त याचिका में छठे याचिकाकर्ता हैं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी विवाद के बीच भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) को राउत के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दी है।राहुल से मुलाकात नहीं करने पर राउत ने CJI की आलोचना की थी
संजय राउत ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के उस फैसले की आलोचना की थी, जिसमें उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं से मुलाकात करने से इनकार कर दिया था। राहुल गांधी चुनावी अनियमितताओं के आरोपों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष की चिंताएं मुख्य न्यायाधीश के सामने रखना चाहते थे। विपक्षी नेताओं का कहना था कि वे चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े सवालों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर अदालत को ज्ञापन देना चाहते थे।राउत ने इस संदर्भ में न्यायपालिका पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया था कि मुख्य न्यायाधीश और कई अन्य न्यायाधीशों ने लंदन में बीजेपी नेताओं के साथ बैडमिंटन खेला और बीजेपी के मंत्रियों की ओर से आयोजित रात्रिभोज में भी हिस्सा लिया, लेकिन जब विपक्ष के नेता उनसे मिलना चाहते हैं, तो उन्हें समय नहीं दिया जाता।
राउत की आपत्ति का मुख्य आधार यही था कि न्यायाधीश राजनीतिक नेताओं के साथ सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठाने वाले विपक्षी नेताओं को मुलाकात का समय क्यों नहीं मिलता। हालांकि, बैडमिंटन कार्यक्रम को लेकर लगाए गए उनके आरोपों को बाद में अटॉर्नी जनरल ने गलत बताया।
‘जज हाथीदांत के बुर्ज में नहीं रहते’, CJI की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से किसी एक को अपने आचरण के बारे में स्पष्टीकरण देना होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायाधीश अदालत के बाहर दिए जा रहे बयानों से अनजान नहीं हैं और वे किसी ‘हाथीदांत के बुर्ज’ (ivory towers) में नहीं रहते।
इस टिप्पणी का आशय था कि अदालत के बाहर न्यायपालिका के बारे में कही जा रही बातों की जानकारी न्यायाधीशों को भी रहती है। अदालत ने संजय राउत के मामले में उनके आचरण पर स्पष्टीकरण की शर्त लगाई, जबकि चुनाव आयोग से संबंधित याचिका पर सुनवाई का रास्ता भी खुला रखा।यहां ध्यान देने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने संजय राउत को इस आदेश में अवमानना का दोषी घोषित नहीं किया है। अदालत ने उनकी याचिका को अस्थायी रूप से स्वीकार करते हुए उनके आचरण पर जवाब मांगा है।
अटॉर्नी जनरल ने आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की मंजूरी क्यों दी?
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 15 अक्टूबर को सामने आया, जब अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन को संजय राउत और पत्रकार निखिल वागले के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दी। SCBA ने आरोप लगाया कि दोनों की टिप्पणियां न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को कमतर दिखाने वाली थीं। अटॉर्नी जनरल ने भी प्रथम दृष्टया इन टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया। बैडमिंटन कार्यक्रम के संबंध में अटॉर्नी जनरल ने दिल्ली हाई कोर्ट के 19 जून 2026 के आदेश का हवाला दिया। संबंधित विवाद में जिन तस्वीरों को लंदन में आयोजित कार्यक्रम से जुड़ा बताया गया था, SCBA के अनुसार वे वास्तव में नवंबर 2025 में दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में आयोजित एक कार्यक्रम की थीं।अटॉर्नी जनरल के मुताबिक, न्यायाधीशों के बीजेपी नेताओं के साथ लंदन में बैडमिंटन खेलने संबंधी राउत का दावा गलत था। उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट, विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश, की प्रतिष्ठा को कम करने वाली हो सकती हैं। SCBA ने वरिष्ठ अधिवक्ता और अपने अध्यक्ष प्रदीप कुमार राय के माध्यम से अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की थी। हालांकि, अटॉर्नी जनरल की सहमति मिलने का अर्थ यह नहीं है कि राउत या वागले को अवमानना का दोषी ठहरा दिया गया है। यह कार्यवाही शुरू करने की कानूनी अनुमति है।
INDIA गठबंधन की याचिका में कौन-कौन नेता शामिल हैं?
यह मामला Rahul Gandhi & Others v. Election Commission of India से जुड़ा है। याचिका में राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली तथा SIR से जुड़े फैसलों की न्यायिक समीक्षा की मांग की है। याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, माकपा के एमए बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माझी, एनसीपी (शरद पवार) की सुप्रिया सुले और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ईटी मोहम्मद बशीर शामिल हैं। बाद में विदुथलाई चिरुथैगल काची के अध्यक्ष थोल. थिरुमावलवन और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद सज्जाद अहमद किचलू भी याचिका से जुड़े।याचिका में विपक्ष ने क्या मांग की है?
INDIA गठबंधन के नेताओं की याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:
- रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं: SIR से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों की फाइलें, बैठक के कार्यवृत्त, अधिकारियों की टिप्पणियां और चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियां पेश की जाएं।
- स्वतंत्र जांच हो: कथित चुनावी अनियमितताओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच के लिए स्वतंत्र ऑडिट पैनल गठित किया जाए।
- पारदर्शिता सुनिश्चित हो: चुनाव आयोग के फैसलों की न्यायिक समीक्षा की जाए और चुनाव संबंधी कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
- डिजिटल रिकॉर्ड की जांच हो: याचिका में संबंधित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े डिजिटल लॉग उपलब्ध कराने की मांग भी शामिल है।
विपक्ष का कहना है कि SIR जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है और चुनाव आयोग के फैसलों की जांच होनी चाहिए। अदालत में इन मांगों पर विचार किया जाना अभी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है; याचिका में लगाए गए आरोपों को अपने आप में साबित तथ्य नहीं माना जा सकता।