SIR पर न्यायपालिका में दो धड़े बन गए हैं! पूर्व जज जस्टिस गोपाल गौड़ा और जस्टिस भुइयां ने SIR की आलोचना की। पूर्व CJI गवई ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी की आलोचना की तो जस्टिस अभय ओका ने बचाव किया। 42 पूर्व जजों ने ECI का समर्थन किया।
SIR को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायपालिका के भीतर भी बहस का विषय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस गोपाल गौड़ा ने SIR को सही ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ही वापस लेने की मांग कर दी है। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने अदालत के सामने तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और अदालत को गुमराह किया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की मतदाताओं के बड़े पैमाने पर वोट देने के अधिकार से वंचित किए जाने को लेकर की गई टिप्पणी पर पूर्व सीजेआई बीआर गवई ने सवाल उठाया। पूर्व सीजेआई गवई ने उनकी टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि किसी मौजूदा जज को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने जस्टिस भुइयां का बचाव करते हुए कहा कि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज ने कोई न्यायिक ग़लत काम नहीं किया है।
दूसरी ओर, 42 पूर्व जजों ने एक खुला ख़त लिखकर चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के ख़िलाफ़ चल रहे अभियान पर चिंता जताई है। उन्होंने SIR को क़ानून के तहत की जाने वाली मतदाता सूची सुधार प्रक्रिया बताया और बिना पर्याप्त सबूत के 'वोट चोरी' जैसे आरोप लगाने का विरोध किया है। इस तरह SIR को लेकर अब बहस केवल राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रह गई है। न्यायपालिका से जुड़े मौजूदा और पूर्व जज भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय रखते नज़र आ रहे हैं।
पूर्व जज जस्टिस गोपाल गौड़ा क्या बोले?
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस गोपाल गौड़ा ने कहा है कि SIR को सही ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को वापस लिया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि यह फ़ैसला चुनाव आयोग की ओर से तथ्यों को ग़लत तरीक़े से पेश करने और अदालत को गुमराह करने का परिणाम था। जस्टिस गौड़ा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर अपना फ़ैसला वापस लेना चाहिए और चुनाव आयोग से सभी संबंधित रिकॉर्ड मंगाने चाहिए।जस्टिस भुइयां का बचाव किया
जस्टिस गौड़ा ने मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की उस टिप्पणी का भी बचाव किया जिसमें उन्होंने बड़े पैमाने पर मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित किए जाने पर चिंता जताई थी। जस्टिस गौड़ा का कहना है कि जस्टिस भुइयां ने कोई न्यायिक अनुचित आचरण नहीं किया। उनके मुताबिक, एक जज संवैधानिक मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त कर सकता है। उन्होंने पूर्व CJI बीआर गवई की जस्टिस भुइयां की आलोचना पर भी सवाल उठाया और पूछा कि पूर्व CJI को ऐसी आलोचना करने का क्या अधिकार है। जस्टिस गौड़ा ने यह भी कहा कि जब बीआर गवई बॉम्बे हाईकोर्ट के जज थे, तब उन्होंने उस समय के चर्चित जस्टिस लोया मामले पर टिप्पणी की थी, जबकि उस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी।
पूर्व CJI बीआर गवई ने क्यों जताई थी आपत्ति?
विवाद की शुरुआत जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की उस टिप्पणी से हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी है और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान ऐसे दो वर्गों की कल्पना नहीं करता जिनमें एक वर्ग के पास वोट देने का अधिकार हो और दूसरे के पास न हो।
पूर्व CJI बीआर गवई ने कहा था कि न्यायिक मर्यादा के तहत किसी मौजूदा जज को ऐसे मामले पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जो सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हो। गवई ने कहा था कि जब मामला उसी अदालत में सुनवाई के लिए लंबित है तो जज को उस पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज एसएन ढींगरा और आरएस सोढ़ी ने भी जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर सवाल उठाए थे। सेवानिवृत्त जज एसएन ढींगरा का कहना था कि जब यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तो सार्वजनिक कार्यक्रम में इस तरह की टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए थी। वहीं, पूर्व जज आरएस सोढ़ी ने SIR को सीधे तौर पर मताधिकार से वंचित करने के रूप में पेश करने पर सवाल उठाया था।
जस्टिस भुइयां के समर्थन में जस्टिस ओका
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस अभय ओका ने जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का बचाव किया है। उनका कहना है कि जस्टिस भुइयां ने कोई न्यायिक अनुचित आचरण नहीं किया। जस्टिस ओका के मुताबिक, किसी मौजूदा जज का अपने सामने या किसी समकक्ष पीठ के सामने लंबित मामले के गुण-दोष पर सार्वजनिक टिप्पणी करना निश्चित रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन उनके मुताबिक, जस्टिस भुइयां ने ऐसा नहीं किया।जस्टिस ओका ने कहा कि जज भी एक नागरिक है और वह देश के महत्वपूर्ण मुद्दों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। हां, उसे आत्म-संयम रखना चाहिए और किसी खास मामले पर मीडिया में जाकर अपनी राय नहीं देनी चाहिए। लेकिन अगर कोई जज किसी लॉ कॉलेज में कानून के छात्रों के बीच किसी संवैधानिक या कानूनी मुद्दे पर चर्चा करता है तो वह कानून के छात्र की तरह उस मुद्दे पर अपने विचार रख सकता है।
'भुइयां ने SC आदेश की आलोचना नहीं की'
जस्टिस ओका ने कहा कि उन्होंने जस्टिस भुइयां का पूरा भाषण ध्यान से सुना है। उनके मुताबिक, भाषण में जस्टिस भुइयां ने SIR से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश की आलोचना नहीं की। यह भाषण NALSAR यूनिवर्सिटी में आयोजित एक प्रतियोगिता के समापन समारोह में दिया गया था। जस्टिस ओका के मुताबिक, उसका विषय भी वोट देने के अधिकार से जुड़ा था।
जस्टिस ओका ने बताया कि जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में वयस्क मताधिकार के इतिहास और संविधान के अनुच्छेद 326 की चर्चा की थी। अनुच्छेद 326 वयस्क नागरिकों को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव में मतदान के अधिकार से जोड़ता है। जस्टिस भुइयां ने इसी संवैधानिक प्रावधान के संदर्भ में मताधिकार के महत्व की बात की थी। जस्टिस ओका का कहना है कि अगर किसी चुनावी पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत लाखों मतदाताओं के नाम हटा दिए जाते हैं और ऐसा मनमाने तरीके से होता है तो वह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के सवाल को जन्म दे सकता है।
SIR, चुनाव आयोग के बचाव में 42 पूर्व जजों का खुला ख़त
इसी बीच 42 पूर्व जजों ने एक खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाए जाने पर चिंता जताई है। इन पूर्व जजों ने कहा कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को लगातार कमजोर करने की कोशिशों से लोगों का भरोसा कम हो सकता है। पत्र में SIR का बचाव करते हुए इसे कानूनी रूप से स्थापित प्रक्रिया बताया गया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और सही रखना है। पूर्व जजों ने 'वोट चोरी' जैसे आरोपों पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि अगर ऐसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं तो उनके समर्थन में सबूत भी सामने रखे जाने चाहिए।
'संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमला हो रहा है'
42 पूर्व जजों ने अपने पत्र में कहा है कि भारत की संवैधानिक संस्थाएं लगातार हमले का सामना कर रही हैं। पत्र में चुनाव आयोग को इस कथित अभियान के केंद्र में बताते हुए न्यायपालिका और दूसरी वैधानिक संस्थाओं का भी ज़िक्र किया गया है। पूर्व जजों के मुताबिक, संस्थाओं की आलोचना लोकतंत्र में नागरिकों का अधिकार है, लेकिन किसी संस्था को लगातार बदनाम करना अलग बात है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठते रहे तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जनता का भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है।
विपक्ष के 'वोट चोरी' अभियान पर भी निशाना
पूर्व जजों के खुले पत्र में विपक्ष के 'वोट चोरी' अभियान पर भी तीखी टिप्पणी की गई है। पत्र में कहा गया है कि 'वोट चोरी' जैसे आरोप प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए जाते हैं, लेकिन अदालत में उनके समर्थन में पर्याप्त प्रमाण नहीं रखे जाते। पत्र में यह सवाल भी उठाया गया कि अगर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर सवाल चुनाव हारने के बाद उठाए जाते हैं, तो उन्हीं मशीनों से मिली जीत पर सवाल क्यों नहीं उठाए जाते।
SIR मामला अदालत में
यह पूरा विवाद तब बढ़ा है जब SIR को चुनौती देने वाली याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इसके अलावा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस कानून में मुख्य न्यायाधीश को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति से बाहर रखने का प्रावधान भी विवाद का विषय रहा है। इसलिए जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी और उस पर पूर्व CJI की आपत्ति ने न्यायिक मर्यादा बनाम संवैधानिक मुद्दों पर न्यायाधीशों की सार्वजनिक चर्चा को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है।
एक तरफ जस्टिस बीआर गवई और कुछ पूर्व जजों का तर्क है कि लंबित मामले पर मौजूदा जजों को सार्वजनिक टिप्पणी से बचना चाहिए। दूसरी तरफ जस्टिस अभय ओका और जस्टिस गोपाला गौड़ा का कहना है कि जस्टिस भुइयां ने किसी लंबित मामले की मेरिट पर टिप्पणी नहीं की और मताधिकार जैसे संवैधानिक मुद्दे पर चर्चा करना न्यायिक अनुचित आचरण नहीं है। इसी बीच 42 पूर्व जजों ने चुनाव आयोग और SIR का बचाव करते हुए राजनीतिक आरोपों से संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचने की चेतावनी दी है।
इस तरह SIR को लेकर विवाद अब मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से आगे बढ़कर न्यायिक मर्यादा, संवैधानिक अधिकार, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और अदालत के फैसलों की समीक्षा जैसे बड़े सवालों तक पहुंच गया है।