CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर सीजेपी के दिल्ली प्रोटेस्ट से पहले पुलिस की बेहद सख़्त कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई की। अदालत ने मेट्रो सेवाएँ बंद करने, ट्रेनें रद्द करने, लोगों की आवाजाही रोकने और इंटरनेट बंद करने पर बड़ा फ़ैसला सुनावाया।
कुछ वकीलों ने मार्च निकालने की कोशिश की
CEC ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ दिल्ली प्रोटेस्ट में पुलिस की बेहद सख्ती को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को साफ़ निर्देश दिया है कि शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों की अवैध हिरासत नहीं होनी चाहिए। इसने मेट्रो और रेल सेवाओं पर प्रतिबंध हटाने, लोगों की आवाजाही में रुकावट नहीं डालने और इंटरनेट को बहाल करने के भी निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई में ये निर्देश जारी किए।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने साफ़ किया कि किसी भी व्यक्ति को क़ानून में तय प्रक्रिया के अलावा हिरासत में नहीं लिया जा सकता है। अदालत ने कहा कि मेट्रो और रेल सेवाएँ सामान्य रूप से चलनी चाहिए, जब तक सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत किसी प्रतिबंध की ज़रूरत न हो। पीठ ने शहर में लोगों की स्वतंत्र आवाजाही की अनुमति देने और यातायात तथा कानून-व्यवस्था की स्थिति को ध्यान में रखते हुए बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा करने का भी निर्देश दिया। अदालत ने इंटरनेट सेवाएं भी बिना बाधा जारी रखने को कहा।
अदालत ने दिखाई सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन इलाकों में निषेधाज्ञा लागू नहीं है, वहां शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों के जुटने होने पर उन्हें कानून की प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि पुलिस कथित तौर पर लोगों को ट्रेनों से उतार रही थी और जंतर-मंतर से चार किलोमीटर के दायरे से बाहर भी लोगों को पकड़ा जा रहा था। उन्होंने इंटरनेट सेवाओं पर रोक और मेट्रो स्टेशनों के बंद होने का मुद्दा भी उठाया।वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान उनके साथ भी मारपीट की गई। उन्होंने कहा कि मामला केवल वकीलों के अधिकारों का नहीं, बल्कि आम नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध करने के अधिकार का है। फरासत ने अदालत में कहा कि प्रदर्शन के दौरान लोगों को खड़े रहने तक की अनुमति नहीं दी जा रही थी। उनके मुताबिक, उन्हें पकड़कर एक चलती बस में डाल दिया गया। उन्होंने राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को बहाल करने की मांग की।
अन्य वकीलों ने भी आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया और लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई। ये आरोप सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं और वकीलों की ओर से लगाए गए; इन पर अधिकारियों का जवाब अदालत में मांगा गया है।
अदालत के आसपास निषेधाज्ञा का बोर्ड हटाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि अब तक ऐसा नहीं किया गया है तो अदालत के आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लगाए जाने से संबंधित बोर्ड हटा दिया जाए। पीठ ने कहा कि ऐसा माहौल नहीं होना चाहिए जिससे लोगों को न्याय तक पहुंचने में किसी तरह की बाधा हो। अदालत ने साफ़ किया कि किसी भी अदालत में आने-जाने का रास्ता बाधित नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी धारा 163 लागू की गई थी। उन्होंने प्रदर्शन के दौरान बच्चों और अन्य लोगों के साथ कथित मारपीट का जिक्र करते हुए बैरिकेड हटाने और आवाजाही बहाल करने की मांग की।
वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि न्याय तक पहुंचने का मतलब वकीलों तक पहुंच भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस थानों में वकीलों के साथ मारपीट की गई और उन्हें एफआईआर दर्ज करने की धमकी दी गई। एक महिला वकील ने भी अदालत को बताया कि वह करीब 150 अन्य वकीलों के साथ शांतिपूर्वक चल रही थीं, लेकिन उनमें से चार को पकड़कर पुलिस वैन में ले जाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें धक्का दिया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया। उनके मुताबिक, संबंधित पुलिसकर्मियों ने नाम की पहचान बताने वाला बैज भी नहीं पहना था।
मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रखने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह बंद करने के बजाय ज़रूरत पड़ने पर उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। अदालत ने अपने शुक्रवार के आदेश का भी ज़िक्र किया, जिसमें दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करने के फ़ैसले पर दोबारा विचार करने को कहा गया था।
रविवार की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से कहा कि 10 अक्टूबर को मेट्रो सेवाओं में कोई कटौती नहीं की गई थी और ट्रेनें निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चलाई गई थीं। उन्होंने बताया कि दिल्ली मेट्रो के कुल 303 स्टेशनों में से 47 स्टेशनों को बंद या प्रतिबंधित किया गया था। मेहता के मुताबिक, 10 अक्टूबर को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कुल 4,750 ट्रेन सेवाएं चलाई गईं। उन्होंने यह भी कहा कि मेट्रो पूरी तरह चल रही है और सभी स्टेशन शनिवार रात 10 बजे से खुले हैं।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि मेट्रो का संचालन सामान्य कार्यक्रम के अनुसार जारी रहना चाहिए। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी वास्तविक जरूरतों के आधार पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अदालत ने अधिकारियों से मंगलवार तक जवाब और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। उसने यह भी पूछा कि रेलवे अधिकारियों की ओर से जारी सलाह और सेवाओं से जुड़े फैसलों का आधार क्या था।
इंटरनेट सेवाएं बहाल रखने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं बिना बाधा जारी रखने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान वकीलों ने आरोप लगाया कि इंटरनेट बंद होने से लोगों को यह पता लगाने में परेशानी हुई कि किन लोगों को हिरासत में लिया गया है और उन्हें कहां रखा गया है। वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें थीं, लेकिन सरकार की ओर से कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा था। उन्होंने यह भी दावा किया कि दिल्ली में 45 हिरासत केंद्र बनाए जाने की खबरें थीं।
गुरुस्वामी ने कहा कि मेट्रो सेवाओं और इंटरनेट पर रोक लगाकर नागरिकों की आवाजाही तथा जानकारी हासिल करने को बाधित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने हिरासत में लिए गए लोगों की स्थिति को लेकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी दायर की थी।
हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों को छोड़ दिया गया है। इस आधार पर उन्होंने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर आगे सुनवाई की ज]रूरत नहीं रह सकती। अदालत के सामने हिरासत और पुलिस कार्रवाई को लेकर उठाए गए अन्य सवालों पर कार्यवाही जारी रही।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार
सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर भी चर्चा हुई। अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था सहित कुछ निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने कहा कि इस मामले में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सवाल है। इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि अनुच्छेद 19(2) का मतलब पूर्ण प्रतिबंध नहीं, बल्कि जरूरत के मुताबिक नियमन है।
अदालत ने कहा कि वह इस सवाल पर भी सुनवाई करना चाहती है कि पुलिस की कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप थी या नहीं।
अवमानना याचिका पर अधिकारियों से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंध जारी रखकर अधिकारियों ने अदालत के 9 अक्टूबर के आदेश का पालन नहीं किया। पीठ ने कथित अवमानना के आरोपों पर संबंधित अधिकारियों से हलफनामा दाखिल करने और पहले दिए गए आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट पेश करने को कहा है। रविवार को सुनवाई के लिए जिन अन्य याचिकाओं का पहले से सूचीबद्ध होना तय नहीं था, उन्हें भी अवमानना की कार्यवाही के साथ जोड़ने का निर्देश दिया गया। अदालत के सामने राजनीतिक नेताओं की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका भी थी। यह याचिका वरिष्ठ वकील और तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने दायर की थी।
याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया, पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया और सार्वजनिक परिवहन तथा इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियां लगाई गईं। महिला प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के साथ कथित व्यवहार का मुद्दा भी उठाया गया।
CEC ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन
यह पूरा मामला 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए उस प्रदर्शन से जुड़ा है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की गई है। प्रदर्शन का संबंध चुनाव आयोग और मतदाता सूची के SIR को लेकर चल रहे विवाद से था।
प्रदर्शन से पहले दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों और कानून-व्यवस्था की चिंताओं का हवाला देते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, इंटरनेट सेवाओं पर रोक और लोगों की आवाजाही सीमित करने को लेकर विवाद खड़ा हुआ। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से कहा था कि मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह रोकने के बजाय जरूरत के अनुसार नियंत्रित किया जाए, ताकि आम लोगों को परेशानी न हो। अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह ठप नहीं किया जाना चाहिए। रविवार की विशेष सुनवाई में अदालत ने इन निर्देशों के पालन और पुलिस कार्रवाई से जुड़े व्यापक सवालों पर भी विचार किया।