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क्या रफ़ाल को फिर मुद्दा बनाएँगे राहुल, अकेले लड़ने की तैयारी में?

क्या रफ़ाल सौदे को फिर से राहुल गाँधी मुद्दा बनाएँगे? क्या कांग्रेस संसद के शीतकालीन सत्र में इसे उठाने की तैयारी कर रही है? ऐसा नहीं है तो फिर रफ़ाल सौदे पर सुप्रीम कोर्ट के पुनर्विचार दाचिकाएँ खारिज किए जाने के बावजूद राहुल गाँधी ने इस मुद्दे पर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ नए सिरे से जंग का एलान क्यों कर दिया है? सुप्रीम कोर्ट से अवमानना के मामले में बरी होते ही राहुल गाँधी ने रफ़ाल ख़रीद की जाँच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की अपनी पुरानी माँग दोहराई। राहुल गाँधी ने मोदी सरकार पर पलटवार करते हुए कहा कि इससे उसे बहुत ख़ुश नहीं होना चाहिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहीं नहीं कहा कि इस मामले की जाँच नहीं हो सकती।

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आते ही तोप के गोलों की तरह बीजेपी नेताओं के बयान राहुल गाँधी पर बरसने लगे। इस बीच राहुल ने ट्वीट करके कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जोसेफ़ ने रफ़ाल मामले की जाँच के लिए बड़ा दरवाज़ा खोल दिया है। राहुल गाँधी ने कहा, 'आज सर्वोच्च अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अपील करने के फ़ैसले को सही ठहराया है, सुप्रीम कोर्ट के सीमित अधिकार हैं और वह रफ़ाल मामले की जाँच नहीं कर सकती, इसलिए ही कांग्रेस ने वहाँ अपील नहीं की थी।' 

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कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी ऐसी ही बात कही। ज़ाहिर है कि अगले हफ़्ते शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में रफ़ाल की गूँज फिर सुनाई देगी। राहुल विपक्ष को लामबंद करके मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे। हालाँकि यह हैरानी की बात है कि किसी और विपक्षी दल की तरफ़ से रफ़ाल पर मोदी सरकार को घेरने की बात अभी तक नहीं कही गई है।

राहुल गाँधी फिर से रफ़ाल मुद्दे से मोदी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पार्टी में कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि रफ़ाल मुद्दा राजनीतिक रूप से अब ख़त्म हो चुका है। इस पर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करना समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी है। इन नेताओं का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से राहुल गाँधी ने रफ़ाल को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था। लेकिन जनता ने कांग्रेस के रुख़ का समर्थन नहीं किया। उल्टे बीजेपी जनता को यह समझाने में कामयाब रही कि रफ़ाल देश के लिए बेहद ज़रूरी है और कांग्रेस इस सौदे की जाँच के नाम पर इस ख़रीद को लटका कर देश को रफ़ाल से वंचित करना चाहती है।

ग़ौरतलब है कि कांग्रेस दो साल से रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन की माँग कर रही है। पिछले साल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से राहुल गाँधी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। तब राहुल गाँधी ने रफ़ाल सौदे में घोटाले का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया था। तीनों राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस को लगा था कि वह रफ़ाल को बीजेपी का बोफ़ोर्स बना सकती है।

बाद में जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि इसकी जाँच उसके दायरे में नहीं आती। सक्षम एजेंसी इसकी जाँच कर सकती है। तब राहुल गाँधी ने यह बयान दे दिया था कि ‘अब तो सुप्रीम कोर्ट भी मान चुका है कि चौकीदार चोर है।’ इसके बाद बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की याचिका दाखिल की थी। इस पर राहुल गाँधी को माफ़ीनामा देना पड़ा। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने लंबी दलीलों के बाद राहुल गाँधी के माफ़ीनामे को स्वीकार कर लिया और भविष्य में सोच-समझकर बोलने की नसीहत देकर उन्हें मामले से बरी कर दिया।  

राहुल न मानने वाले थे और न ही अब माने। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आते ही फिर शुरू हो गए। अब राहुल गाँधी सुप्रीम कोर्ट के जज के. एम. जोसेफ़ की दलीलों को आधार बना रहे हैं।

दरअसल रफ़ाल मामले की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच में चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल के साथ ही जस्टिस के. एम. जोसेफ़ शामिल रहे। जस्टिस जोसेफ़ ने रफ़ाल सौदे पर पुनर्विचार याचिका को खारिज करने पर तो सहमति जताई लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं की शिकायत पर कोर्ट एफ़आईआर दर्ज करने का निर्देश देती है, तो यह प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट की धारा 17ए के तहत व्यर्थ साबित होगा। हालाँकि उन्होंने कहा कि किसी गंभीर अपराध का खुलासा करने के लिए मामले में एफ़आईआर दर्ज की जानी चाहिए। जस्टिस जोसेफ़ ने कहा कि प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट की धारा 17ए किसी मामले की जाँच के लिए पहले मंज़ूरी की बात करता है। जस्टिस जोसेफ़ ने तो साफ़ कह दिया कि भ्रष्टाचार के मामलों में जाँच की जानी चाहिए। यहाँ यह भी ग़ौरतलब है कि तीन तलाक़ में क़ानून बनाने का फ़ैसला भी सिर्फ़ एक जज का था। सभी जजों ने क़ानून बनाने की बात नहीं कही थी।

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क्या राहुल को मिलेगा साथ?

बता दें कि पहले याचिकाकर्ताओं- प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा ने सीबीआई में ही रफ़ाल मामले में जाँच को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। जब सीबीआई ने इनकी शिकायत पर जाँच शुरू नहीं की तो इन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। 

अब राहुल गाँधी और याचिकाकर्ता यही दलील दे रहे हैं कि अगर पीठ के एक जज के फ़ैसले को मानते ही सरकार तीन तलाक़ पर क़ानून बना सकती है तो फिर रफ़ाल की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित क्यों नहीं की जा सकती? और सीबीआई क्यों इसकी प्राथमिक जाँच नहीं कर सकती? लेकिन राहुल के इस प्रयास पर कांग्रेस में ही यह सवाल भी उठने लगा है कि जब राहुल कांग्रेस अध्यक्ष रहते मोदी सरकार को इस मुद्दे पर नहीं झुका पाए तो फिर अब महज़ एक सांसद की हैसियत से भला कैसे झुका पाएँगे।

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यह बात सही है कि रफ़ाल पर राहुल के आक्रामक रुख़ से बीजेपी बचाव की मुद्रा मे आ गई थी। तब बीजेपी को लगने लगा था कि शायद लोकसभा चुनाव में उसे इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है। राहुल के इस नारे से परेशान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके जवाब में ‘मैं भी चौकीदार’ मुहिम शुरू करनी पड़ी थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार की दमदार वापसी के बाद रफ़ाल मुद्दा राजनीतिक रूप से अपनी अहमियत खो चुका है। इस मुद्दे पर विपक्ष की उतनी दिलचस्पी नहीं है। लोकसभा चुनाव में क़रारी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देते हुए राहुल गाँधी ने अपने खुले ख़त में इस बात पर अफसोस जताया था कि कई मुदों पर वह अकेले ही लड़ते रहे। इन्हीं में रफ़ाल भी एक मुद्दा है। ऐसे में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को डर है कि कहीं रफ़ाल पर राहुल की आवाज़ नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ बन कर न रह जाए।
यूसुफ़ अंसारी
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