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लोकप्रिय राम मंदिर से लोकहितकारी रामराज्य तक का सफ़र

धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक होते हैं। विज्ञान का आधार होता है तर्क और अनुसंधान जबकि धर्म का आधार होता है श्रद्धा और विश्वास। विज्ञान निष्कर्ष निकालता है और धर्म इसे समाज तक पहुंचाता  है। दुर्भाग्य से, 21वीं शताब्दी में दुनिया में धर्म और विज्ञान के बीच दूरी बढ़ने लगी है। विज्ञान आवश्यकता से अधिक भौतिकवाद की दिशा में जाता दिख रहा है और धर्म आवश्यकता से अधिक रूढ़िवादी अंधविश्वास की राह पर।

सर्वोच्च न्यायालय आज अयोध्या मामले पर फ़ैसला सुनायेगा। इससे पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में राम जन्मभूमि भूमि/बाबरी मसजिद के स्वामित्व के मामले में विवादित भूमि के त्रिकोणीय स्वामित्व का निर्णय दिया था, जिसमें एक भाग सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को, एक भाग निर्मोही अखाड़े को तथा एक भाग पर रामलला को स्वामित्व दिया गया था। 

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भारतीय न्यायपालिका के सामने आज यह अवसर है कि वह आस्था बनाम दस्तावेज के बीच से एक को चुनकर ध्रुवीकरण का रास्ता खोले या क़ानून की एक ऐसी न्यायपूर्ण अभिनव परिभाषा दे जिससे विज्ञान एवं धर्म के बीच समन्वय का मार्ग प्रशस्त हो। क्योंकि अयोध्या मामले में एक पक्ष जहां भगवान राम पर आस्था को मुख्य तर्क बनाये हुए है, वहीं दूसरे पक्ष ने ऐतिहासिक प्रमाण को अपना प्रमुख तर्क बनाया है।  

रामचंद्र जी को लोग भगवान मानते हैं। वेदों में राम का जिक्र नहीं है, उपनिषदों में से एक में स्वयं रामचंद्र जी के संवाद हैं तथा पुराणों में रामजी पर कई कथाएं हैं। राम दशरथ नंदन थे या दशावतार में से एक, यह धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी भिन्न-भिन्न है। राम पौराणिक पुरुष रहें हो, चाहे ऐतिहासिक पुरुष रहे हों, पर निश्चित रूप से वह मर्यादा पुरुषोत्तम थे। रामायण के 300 से अधिक संस्करण भारत की विभिन्न भाषाओं से लेकर समूचे दक्षिण एशिया तथा जापान तक में प्रचलित हैं। 

आख़िर क्या कारण है कि हजारों वर्षों से राम करोड़ों लोगों के दिल में रमे हैं? हर धर्म के इतिहास में कई महापुरुषों का वर्णन मिलता है, अधिकाँश महापुरुष बुराई के ख़िलाफ़ विपरीत परिस्थिति में भी जद्दोजहद कर अंततोगत्वा विजय हासिल करते हुए दर्शाये गए हैं। भगवान राम का चरित्र एक ऐसा अविरल चरित्र है, जिसमें बुराई पर जीत के बाद के आगे की भी कथा है जिसमें उन्होंने एक नूतन व्यवस्था का आगाज किया जो उनके देवलोकगमन के बाद भी सुचारू चलती हुई दिखाई देती है। सामान्य भाषा में इसे रामराज्य कहा जाता है।

राम के चरित्र की कुछ विशेषताएं स्वयंस्पष्ट हैं। जैसे राम, परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले युग्मों के बीच तारतम्य बिठाने का उत्तम उदाहरण हैं। स्थूल दृष्टि से देखें तो रामसेतु का निर्माण इसका एक प्रतीक है। नदी पर तो अनेक पुल बने पर सागर के किनारों को पाटने का काम राम ने ही किया।

सूक्ष्म दृष्टि से भी देखें तो दशरथ-विदेह, वशिष्ठ-विश्वामित्र, लक्ष्मण-परशुराम, लक्ष्मण-भरत, बाली-सुग्रीव, विभीषण-रावण, इन सभी पात्रों की सोच, व्यवहार, चाल-चलन एक दूसरे के विरोधी होते हुए भी राम द्वारा इनमें सफलतापूर्वक सामंजस्य बिठाने का प्रयास दर्शाया गया है। अतः परस्पर हितों का टकराव होते हुए भी, उनमें तारतम्य बिठाना राम के चरित्र की विशेषता है।  आज 21वीं सदी में भी मानव विकास के इस मुक़ाम पर लोकतंत्र की यही भावना है कि सभी परस्पर विरोधी युग्म कैसे सहजीवन जी सकते हैं।  भारत समेत अनेक लोकतांत्रिक देशों के संविधान भी इसी अनेकता में एकता को यथार्थ में बदलने का प्रयास ही तो हैं।  

राम बुद्धिनिष्ठ थे, इसका उदाहरण यह है कि राम ने धनुष भंग विश्वामित्र जी के कहने पर किया, भरत मिलन में भरत की बात ही रखी, सुग्रीव से मित्रता हनुमान की सलाह पर की, सीता की खोज सुग्रीव के सुविधानुसार की, सागर का गर्वभंग लक्ष्मण की राय से, सेतु निर्माण समुद्र की सलाह पर और रावण नाभि वध विभीषण के कहने पर किया। आज 21वीं सदी की सभ्य सामाजिक व्यवस्था में भी तो ऐसी ही बुद्धि पर निष्ठा को आदर्श माना गया है, जहां जिसकी लाठी उसकी भैंस के स्थान पर उचित या अनुचित का विचार बहुमत-अल्पमत के द्वारा नहीं लॉजिक से, राय-मशविरे से किये जाने की व्यवस्था बनाई गई है।   

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राम के लोकप्रिय बनने का सबसे बड़ा कारण उनके द्वारा रामराज्य की स्थापना रही। एक ऐसा राज्य जहां न कोई रोगी होता था, न कोई अनपढ़, न कोई ग़रीब होता, न शोषित। रामायण में रामराज्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि -

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज शरीरा।।

नहीं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

सब गुनग्य पंडित सब ज्ञानी। सब कृतग्य नहीं कपट सयानी।।

जिस आदर्श को कवि राम राज्य कहता है, उसमें तो असल में भरत राज्य, अर्थात नंदीग्राम का खड़ाऊं राज्य, अर्थात लोकस्वराज्य की चर्चा है, जिसमें सत्ता व्यक्ति या विशिष्ट व्यक्तियों के हाथ में न होकर सामान्य नागरिकों के हाथ में होती है। राम की अनुपस्थिति और राजा दशरथ की मृत्यु के बावजूद, 14 वर्षों तक अयोध्या में एक भी अप्रिय घटना नहीं घटी क्योंकि भरत ने स्वयं को केवल सुरक्षा एवं न्याय तक सीमित रखा, प्रशासन के चक्कर में नहीं पड़े। 

आजकल जब सरकारें रावण की दो प्रिय कभी न ख़त्म होनी वाली परियोजनाएं, जैसे - सागर के पानी को मीठा बनाना और स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने जैसे उपक्रमों को ही साध्य मान बैठी हों, वैसे में यदि किसी राम ने लीक से हटकर जनता को मूलभूत सुरक्षा, न्याय, सुविधा तथा स्वतंत्रता देने वाली नूतन व्यवस्था की नींव डाली तो रामराज्य की स्थापना करने वाले उस राम को यदि सैकड़ों पीढ़ियों से करोड़ों लोगों ने आदर्श भगवत स्वरूप माना है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

ऐसे समुद्रवत गंभीर और हिमालय जैसे स्थिर राम को जनप्रतिनिधि राष्ट्रपुरुष मानते हुए ही शायद हमारे संविधान शिल्पियों ने संविधान सभा द्वारा अंगीकृत भारत के मूल संविधान की प्रतियों में राम के चित्र को स्थान दिया।
आदर्श स्थिति यह होगी कि भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका ऐसे संविधान सम्मत राम की विस्तृत व्याख्या करे और उनकी स्मृति में अयोध्या में राम जन्मस्थान पर एक भव्य स्मारक की अनुमति दे, जहां धार्मिक अनुष्ठानों के स्थान पर विश्वभर की 300 से अधिक रामायणों में उल्लिखित उस प्रगतिशील रामराज्य पर शोध होगा जो अभिनव मानव सभ्यता का इष्ट है और वर्तमान विश्व का मार्गदर्शक भी और इसके नतीजतन भारत को विश्वगुरु की हैसियत दिलवाने वाला भी। रही बात साकार तथा निराकार की उपासना हेतु मंदिर-मसजिद की, तो वे आसपास में हैं भी, नए बनाये भी जा सकते हैं। बाक़ी अंततोगत्वा, अदालत के फ़ैसले को आदर देना हर भारतीय का लोकतांत्रिक फर्ज तो है ही।
सिद्धार्थ शर्मा
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