ECI का काम 2023 से टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज देख रही है। टीसीएस को कब इसका टेंडर मिला, क्या शर्तें थीं। कुछ पता नहीं। टाटा की संस्था ने करीब ₹914.97 करोड़ राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा बांटा। इनमें BJP को लगभग ₹757.6 करोड़ यानी करीब 83% मिला।
टीसीएस में 12000 कर्मचारियों की छँटनी
नेता विपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने पूछा कि फॉर्म 6 में टीसीएस कंपनी ने बदलाव चुनाव आयोग के किस अधिकारी के आदेश पर किया। क्या उसे कानूनी अधिकार था। राहुल गांधी के इस ट्वीट के आते ही भूचाल आ गया। तमाम नये तथ्य सामने आये। अभी तक चुनाव आयोग की ओर से इस बारे में कोई स्पष्टीकरण या खंडन जारी नहीं किया गया है। लेकिन इस घटनाक्रम के बाद नये तथ्य और सवाल सामने आये हैं। देश में SIR को लेकर विवाद अब सिर्फ नामों के जुड़ने या कटने तक सीमित नहीं रह गया है।
सवाल चुनावी डेटा के उस डिजिटल ढांचे ECINET पर भी उठ रहे हैं, जिसके जरिए मतदाता पंजीकरण, संशोधन और चुनावी रोल का प्रबंधन किया जाता है। टाटा समूह की कंपनी टीसीएस इस काम को संभाल रही थी। आखिर उसको मिले ठेके को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया, उसकी शर्तों की कोई भी जानकारी पब्लिक डोमेन या आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं। अब अगले तथ्य को देखिये- टाटा समूह की कंपनियां Progressive Electoral Trust में चुनावी चंदे के लिए पैसा देती हैं। वो पैसा राजनीतिक दलों को चुनावी चंदे के रूप में बांटा जाता है। फरवरी 2025 की टाटा की रिपोर्ट से पता चलता है कि टाटा की कंपनियों ने PET को ₹915 करोड़ रुपये दिये। इसमें 83 फीसदी चंदा बीजेपी को अकेले मिला है। यह एक तथ्य है।
ECINET में TCS की भूमिका
राहुल गांधी के आरोप के बाद ECINET में TCS की भूमिका की पड़ताल ज़रूरी है। ईसीआईनेट पिछले साल लांच किया गया था और ERONET 2023 में आया था। अब ERONET इसी ईसीआईनेट के तहत काम करता है। ECI के अनुसार ERONET राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए एक केंद्रीकृत Electoral Roll Management System है। आयोग इसे मतदाता रजिस्ट्रेशन, विभिन्न फॉर्मों की प्रोग्रेस और चुनावी रोल के ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल करता है। ECI के अनुसार ERONET में सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का एकीकृत डेटाबेस है।
- रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच के अनुसार ERONET को C-DAC ने बनाया था, लेकिन 2023 से ERONET 2.0 के संचालन में TCS की भूमिका है। इस रिपोर्ट के मुताबिक यह तथ्य ECI की सार्वजनिक घोषणाओं के बजाय TCS के शेयरधारकों के लिए किए गए कॉरपोरेट डिस्क्लोजर से सामने आया। यानी चुनाव आयोग ने टीसीएस से जुड़े टेंडर और उसकी शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया।
- एक TCS कर्मचारी की सार्वजनिक प्रोफाइल में भी ERONET 2.0 पर अगस्त 2022 से मार्च 2025 तक काम करने और एक अरब से अधिक डेटा रिकॉर्ड के ETL से जुड़ी जिम्मेदारियों का उल्लेख मिलता है। हालांकि यह व्यक्तिगत प्रोफाइल है। इसे सरकारी कॉन्ट्रैक्ट से नहीं जोड़ा जा सकता।
- इन सवालों का जवाब देने के लिए कॉन्ट्रैक्ट, टेंडर/प्रोक्योरमेंट रिकॉर्ड, आदेश और सिस्टम ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक होना ज़रूरी है।
Form 6 में बदलाव का मामला
Indian Express की जांच के मुताबिक 2026 में ECINET पर ऑनलाइन Form 6 में एक अतिरिक्त घोषणा वाला हिस्सा दिखाई दिया। इसमें आवेदक या उसके माता-पिता के पिछले SIR से जुड़े विवरण मांगे जा रहे थे। महत्वपूर्ण बात यह थी कि कानूनी Form 6 में औपचारिक नियम संशोधन किए बिना यह अतिरिक्त हिस्सा जोड़ा गया था। Indian Express के अनुसार दो Election Commissioners सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस तरह के कदमों पर आपत्ति दर्ज की थी।
- बाद में ECI ने कुछ राज्यों में, जहां SIR पूरा हो चुका था, ऑनलाइन Form 6 से संबंधित SIR declaration को हटाया। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि Form 6 में यह डिजिटल बदलाव किस स्तर पर मंज़ूर हुआ, किस अधिकारी ने इसका निर्देश दिया और किस तकनीकी प्रक्रिया से इसे लाइव पोर्टल पर लागू किया गया? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी सरकारी डिजिटल सिस्टम में बदलाव के आमतौर पर कई स्तर होते हैं-requirement, approval, development, testing, user acceptance testing और production deployment। इन सभी चरणों का लॉग सार्वजनिक होने के बाद जवाबदेही तय हो जायेगी कि इसके पीछे कौन था/है।
चुनाव आयोग, टीसीएस और फॉर्म 6 को लेकर 14 सवालों के जवाब नहीं मिल रहे
इस पूरे मामले में इन सवालों के स्पष्ट जवाब सार्वजनिक किए जाने चाहिए:
- 1. ऑनलाइन Form 6 में बदलाव का प्रस्ताव किसने रखा?
- 2. ECI में इसे किस अधिकारी ने मंज़ूर किया?
- 3. TCS को तकनीकी बदलाव करने का निर्देश किसने दिया?
- 4. निर्देश किस तारीख को जारी हुआ?
- 5. ECI के IT Division का कौन अधिकारी TCS से तालमेल कर रहा था?
- 6. TCS में बदलाव के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन था?
- 7. User Acceptance Testing किसने किया?
- 8. Production deployment की अनुमति किसने दी?
- 9. बदलाव किस तारीख और किस समय live हुआ?
- 10. संबंधित server/change-management logs क्या कहते हैं?
- 11. क्या deployment से पहले legal vetting हुई?
- 12. क्या तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के सामने यह प्रस्ताव रखा गया था?
- 13. यदि नहीं, तो प्रशासनिक अधिकार के तहत इसे किसने मंजूरी दी?
- 14. इस बदलाव का independent security और compliance audit हुआ या नहीं?
गोवा का मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
गोवा का मामला इस पूरे विवाद को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। दिए गए विवरण के मुताबिक, चुनावी अधिकारियों ने सुनवाई के बाद 97 मतदाताओं को पात्र पाया था। लेकिन पहले हटाए गए नामों को वापस मतदाता सूची में शामिल करने के लिए ECINET में आवश्यक तकनीकी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। गोवा के अधिकारियों ने सात दिनों के भीतर आठ बार संवाद करके सिस्टम में आवश्यक सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की।
इस मामले में ECI के एक Deputy Election Commissioner ने DG-IT डॉ. सीमा खन्ना को लिखा कि IT सिस्टम ऐसा नहीं होना चाहिए जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई को रोक दे।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर किसी वैधानिक Electoral Registration Officer ने किसी मतदाता को सुनवाई के बाद पात्र माना है, लेकिन सॉफ्टवेयर उसे उस निर्णय को लागू करने की अनुमति ही नहीं देता, तो सवाल उठता है कि अंतिम नियंत्रण किसके पास है- कानूनी अधिकारी के पास या सॉफ्टवेयर सिस्टम के पास?
क्या सॉफ्टवेयर ने चुनाव अधिकारियों की पावर छीन ली?
गोवा प्रकरण से एक बड़ा संस्थागत सवाल पैदा होता है। यदि Electoral Registration Officer (ईआरओ) के पास किसी मतदाता का नाम बहाल करने का वैधानिक अधिकार है, लेकिन केंद्रीय डिजिटल सिस्टम में ऐसी कार्रवाई करने का विकल्प उपलब्ध नहीं है, तो क्या डिजिटल आर्किटेक्चर ने अधिकारी की वैधानिक शक्ति को व्यवहार में सीमित कर दिया?
और यदि ऐसा हुआ, तो-
- इस सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर को किसने डिजाइन और मंजूर किया?
- उसमें ऐसी सीमा किसने निर्धारित की?
- और उसे हटाने या बदलने का अधिकार किसके पास था?
- गोवा प्रकरण में TCS का नाम इसलिए सामने आया है क्योंकि उपलब्ध विवरण के मुताबिक सॉफ्टवेयर की तकनीकी कार्यक्षमता ECI के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी थी।
विपक्ष को डिजिटल वोटर लिस्ट क्यों नहीं मिली?
इस विवाद का एक हिस्सा चुनाव आयोग की पारदर्शिता को लेकर भी है। विपक्षी दलों ने डिजिटल मतदाता सूची उपलब्ध कराने की मांग की है, जबकि चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के तरीकों को लेकर विवाद रहा है। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अपनी कई प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस तथ्य का उल्लेख किया कि उन्होंने डिजिटल मतदाता सूची मांगी लेकिन उपलब्ध नहीं कराई गई। यहां मूल सवाल यह है कि डिजिटल युग में जब मतदाता सूची एक सॉफ्टवेयर प्रणाली के जरिए संचालित हो रही है, तो राजनीतिक दलों और नागरिकों को यह कैसे सुनिश्चित कराया जाएगा कि-
- कौन सा नाम कब जोड़ा गया?
- कब हटाया गया?
- किस अधिकारी ने हटाया?
- किस आधार पर हटाया?
- किस अधिकारी ने बहाली की?
- किस समय सिस्टम में बदलाव हुआ?
- यदि ऐसी जानकारी का tamper-proof audit trail उपलब्ध हो, तो मतदाता सूची में किसी भी बदलाव की स्वतंत्र जांच संभव हो सकती है।
टाटा समूह ने चंदा लुटाया, सबसे बड़ी लाभार्थी बीजेपी- 83% रही
2024-25 में Tata Group से जुड़े Progressive Electoral Trust (PET) को लगभग ₹915 करोड़ मिले। इस रकम में Tata Sons, Tata Consultancy Services (TCS), Tata Steel, Tata Motors, Tata Power समेत कई कंपनियां शामिल हैं।
- उपलब्ध चुनावी चंदा रिपोर्टों के मुताबिक PET ने करीब ₹914.97 करोड़ राजनीतिक दलों को बांटा। इनमें BJP को लगभग ₹757.6 करोड़ यानी करीब 83 फीसदी मिला, जबकि कांग्रेस को लगभग ₹77.3 करोड़ यानी 8.4 फीसदी मिले। बाकी आठ दलों को ₹10-₹10 करोड़ दिए गए।
- Tata Group की प्रमुख कंपनियों के योगदान में Tata Sons के करीब ₹308 करोड़, TCS के ₹217.6 करोड़ और Tata Steel के ₹173 करोड़ शामिल थे।
इसका मतलब यह है कि TCS ने PET में करीब ₹217.6 करोड़ का योगदान दिया था, लेकिन उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि TCS के इस व्यक्तिगत योगदान का कोई निश्चित हिस्सा सीधे BJP को गया। Electoral Trust व्यवस्था में कंपनियां ट्रस्ट को पैसा देती हैं और ट्रस्ट राजनीतिक दलों को रकम बांटता है।
टाटा को दो बीजेपी शासित राज्यों में सेमीकंडक्टर का काम मिला
Scroll की एक जांच से पता चला है कि केंद्र सरकार द्वारा टाटा समूह की दो सेमीकंडक्टर इकाइयों को 44,000 करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी देने की घोषणा के कुछ ही हफ्तों बाद टाटा समूह ने बीजेपी को 757 करोड़ रुपये का डोनेशन दिया। यह डोनेशन अप्रैल 2024 में, आम चुनाव से कुछ दिन पहले किया गया था। बीजेपी शासित राज्यों असम और गुजरात में टाटा समूह की दो सेमीकंडक्टर यूनिटों को फरवरी 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी दी गई थी। इन दोनों इकाइयों के लिए केंद्र सरकार की सब्सिडी लगभग 44,023 करोड़ रुपये है।
- हालांकि सेमीकंडक्टर की फैक्ट्री पहले महाराष्ट्र में लगनी थी। लेकिन बाद में उसे गुजरात शिफ्ट किया गया। इस पर शिवसेना यूबीटी और कांग्रेस ने कई सवाल उठाये थे।
टाटा समूह, चुनाव आयोग और केंद्र सरकार सवालों से बच नहीं सकते
नेता विपक्ष राहुल गांधी के बयान के बाद पूरा मामला गंभीर हो गया है। आखिर टीसीएस ने किस कानूनी प्रावधान के तहत फॉर्म 6 में बदलाव किया। उसे सार्वजनिक रूप से आज नहीं तो कल यह बताना पड़ेगा कि यह बदलाव किसके कहने पर किया गया। चुनाव आयोग को बताना होगा कि आयोग के किस अधिकारी ने इस बदलाव का आदेश दिया। आयोग की वो बैठक कब हुई थी, जिसमें इस तरह के बदलाव को मंजूरी दी गई। क्या इस बदलाव की जानकारी आयोग के सभी सदस्यों को थी।