अमेरिकी टैरिफ़ से भारतीय कपड़ा निर्यात को बड़ा झटका लगा है। अगर 3-6 महीने भी ऐसा जारी रहा तो नुक़सान ऐसा होगा कि उबरना मुश्किल हो जाएगा। निर्यातक टैरिफ़ से बेहद चिंतित हैं। उन्होंने उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन को एक पत्र लिखकर कहा है कि अगर कोई व्यापार समझौता नहीं हुआ और टैरिफ ऐसे ही चलते रहे तो भारत की बाजार हिस्सेदारी को हमेशा के लिए नुक़सान हो सकता है। इससे लाखों नौकरियाँ भी ख़तरे में पड़ सकती हैं। निर्यातकों का कहना है कि अब उनके पास और झटके सहने की क्षमता नहीं बची है।

यह पत्र अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल यानी एईपीसी की ओर से लिखा गया है। तमिलनाडु का तिरुपुर कपड़ा क्लस्टर इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित है, क्योंकि यह अमेरिकी बाजार पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। तिरुपुर से हर साल क़रीब 14000 करोड़ रुपये के कपड़े अमेरिका को निर्यात किए जाते हैं।

पत्र में कहा गया है कि अमेरिका ने हाल ही में आयात पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया है और इसके अलावा रूसी तेल से जुड़ी 25 प्रतिशत अतिरिक्त पेनल्टी भी। इससे भारत के अमेरिका को जाने वाले कपड़ा निर्यात में भारी बाधा आ रही है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला, तो ऑर्डर रुक जाएंगे, नौकरियां जाएंगी और बाजार हमेशा के लिए दूर जा सकता है।
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25% छूट देने के बाद भी बुरा हाल

एईपीसी ने बताया कि टैरिफ बढ़ने के डर से अमेरिकी खरीदार नए ऑर्डर रोक रहे हैं या रद्द कर रहे हैं। वे बीच में टैरिफ बढ़ने का जोखिम नहीं लेना चाहते। निर्यातक पहले ही 25 प्रतिशत डिस्काउंट दे चुके हैं, लेकिन अब और टैरिफ सहना व्यापारिक रूप से असंभव है। लागत खरीदारों पर डालना भी संभव नहीं है।

निर्यातकों ने कहा कि कपड़ा उद्योग ने देशहित में पहले ही काफी नुकसान सहा है, ताकि निर्यात और रोजगार बचे रहें। अब और झटके सहने की क्षमता नहीं बची। अगर 3-6 महीने भी देरी हुई तो इस महत्वपूर्ण निर्यात क्षेत्र को हमेशा का नुकसान हो सकता है। वे सरकार से तुरंत मदद मांग रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका के अलावा अन्य देशों में बाजार बनाना कोई छोटी अवधि का विकल्प नहीं है। वैकल्पिक बाजार विकसित करने में 2-3 साल लगते हैं।

बांग्लादेश, वियतनाम, चीन का होगा कब्जा?

एईपीसी ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी बाजार को अचानक गँवा दिया गया तो ग्राहक हमेशा के लिए चले जाएंगे और विशेष छूट मिलने वाले प्रतिस्पर्धी देश भारत की जगह ले लेंगे। इसलिए, व्यापार समझौते के पूरा होने तक कपड़ा निर्यात के लिए अंतरिम सुरक्षा उपायों की मांग की गई है।

अनिश्चितता के कारण ऑर्डर अब बांग्लादेश, वियतनाम और यहां तक कि चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को मिल रहे हैं। इन देशों पर टैरिफ कम है, जबकि भारत पर 50 प्रतिशत तक का सबसे ज़्यादा टैरिफ़ लगाया गया है।

यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि 2024 में भारत ने अमेरिका को 10.3 अरब डॉलर के कपड़े और टेक्सटाइल निर्यात किए। 2023-24 में भारत के विश्व निर्यात में कपड़े और टेक्सटाइल की हिस्सेदारी 8.21 प्रतिशत थी। कपड़े और टेक्सटाइल की सप्लाई चेन ज्यादातर घरेलू है, क्योंकि 90 प्रतिशत इनपुट देश में ही मिलते हैं। यह क्षेत्र श्रम-केंद्रित है, यानी इसमें बहुत सारे लोगों को रोजगार मिलता है।

हालांकि, सरकार ने इस क्षेत्र की मदद के लिए कुछ कदम उठाए हैं। कपास जैसे मुख्य कच्चे माल पर ड्यूटी कम की गई, टेक्सटाइल सप्लाई चेन पर असर डालने वाले कई क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर वापस लिए गए और एमएसएमई को इनपुट सामग्री उपलब्ध कराने में मदद की गई। लेकिन ये क़दम नाकाफ़ी साबित हुए हैं।
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तमिलनाडु ने चेताया था- 30 लाख नौकरियाँ ख़तरे में

तमिलनाडु ने इसी महीने केंद्र सरकार को चेतावनी दी है कि अगर टैरिफ़ की स्थिति ऐसी ही रही तो राज्य में 30 लाख नौकरियाँ तुरंत ख़तरे में पड़ सकती हैं। यह बात तमिलनाडु के वित्त मंत्री थंगम थेन्नारासु ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में हुई प्री-बजट बैठक में कही।

तमिलनाडु ने क़रीब एक पखवाड़े हुई उस बैठक में केंद्र से मिलने वाली फंडिंग में देरी, जीएसटी से राजस्व घाटा और अमेरिकी टैरिफ से होने वाला नुकसान जैसे कई मुद्दों पर विस्तार से बात की। बैठक के दौरान थेन्नारासु ने छोटे और मध्यम उद्योगों पर संकट के बादल मंडराने और इनके बंद होने की बात कही। उन्होंने कहा कि इनके बंद होने से बड़ी संख्या में नौकरियाँ जाएँगी।

तमिलनाडु का निर्यात बहुत हद तक अमेरिका पर निर्भर है। राज्य के कुल सामान निर्यात का 31% अमेरिका जाता है। खासकर टेक्सटाइल सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित है। तमिलनाडु भारत के कुल टेक्सटाइल निर्यात का 28% करता है और यहाँ 75 लाख से ज्यादा लोग इस सेक्टर में काम करते हैं।
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थेन्नारासु ने कहा था, 'ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ़ से हमारे निर्यात पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। अगर यही हाल रहा तो 30 लाख नौकरियाँ तुरंत खतरे में आ सकती हैं। कई छोटे-मध्यम उद्योग यानी एमएसएमई बंद होने की कगार पर हैं।' उन्होंने केंद्र से टेक्सटाइल सेक्टर के लिए विशेष पैकेज मांगा, जिसमें ब्याज पर सब्सिडी, सामान्य सब्सिडी, निर्यात प्रोत्साहन और टैक्स राहत शामिल हो।

कपड़ा उद्योग में छोटी और बड़ी कंपनियां साथ काम करती हैं, लेकिन निर्यात ज्यादातर बड़ी कंपनियां करती हैं। फिर भी अमेरिकी टैरिफ का झटका सभी उत्पादकों को लगेगा और यह घरेलू सप्लायरों तक फैलेगा। यह स्थिति भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए बड़ा संकट है। निर्यातक सरकार से उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द कोई समाधान निकले, वरना रोजगार और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।