क्या सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद लोकसभा ने टीएमसी बागियों को नोटिस जारी किया? सचिवालय का नोटिस 25 अगस्त का है। उसी दिन कोर्ट लोकसभा स्पीकर को नोटिस देने की सोच रहा था तो सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि स्पीकर पहले ही सांसदों को नोटिस दे चुके हैं।
टीएमसी के बागी लोकसभा स्पीकर के साथ। (फाइल फोटो)
तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के ख़िलाफ़ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर अब लोकसभा सचिवालय ने औपचारिक कार्रवाई शुरू कर दी है। सचिवालय ने सभी 20 सांसदों को नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर अपना जवाब देने को कहा है। यह क़दम तब उठाया गया है जब एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए शीघ्र निर्णय की ज़रूरत पर जोर दिया था। कोर्ट ने बागी सांसदों को नोटिस दिया था और लोकसभा स्पीकर को नोटिस देने पर विचार किया था, लेकिन इन्हें नोटिस जारी नहीं किया था। अभिषेक बनर्जी 18 जून को लोकसभा में दायर याचिका पर कार्रवाई में बहुत ज़्यादा देरी होने पर सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुँचे।
दिलचस्प बात यह है कि द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा सचिवालय द्वारा बुधवार को जारी नोटिस पर 25 अगस्त की तारीख दर्ज है। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से संबंधित सांसदों को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
अभिषेक बनर्जी की याचिका पर नोटिस
लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी नोटिस के अनुसार यह कार्रवाई टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी द्वारा दायर अयोग्यता याचिका के आधार पर की गई है।
अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया है कि ये सांसद टीएमसी के टिकट पर चुने गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई का दामन थाम लिया। इसलिए उन्हें संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
लोकसभा सचिवालय ने अपने नोटिस में लोकसभा सदस्य (दल-बदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1985 के नियम 6 और नियम 7(3) का हवाला दिया है।
नोटिस में कहा गया है कि संबंधित सांसदों को यह पत्र मिलने के सात दिनों के भीतर अपना पक्ष लिखित रूप में पेश करना होगा, ताकि लोकसभा अध्यक्ष इस मामले पर आगे विचार कर सकें।
इसके साथ ही अभिषेक बनर्जी की 18 जून को दायर मूल अयोग्यता याचिका की प्रति भी नोटिस के साथ भेजी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई थी सख्ती
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने मंगलवार को अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई की थी। सुनवाई के दौरान अदालत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को भी नोटिस जारी करने पर विचार कर रही थी। तभी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सांसदों को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किया और यह साफ़ किया कि उद्देश्य किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ आदेश देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि अयोग्यता याचिकाओं पर समयबद्ध तरीके से फैसला लिया जाए।बहरहाल, अब लोकसभा सचिवालय का नोटिस सामने आने के बाद यह साफ़ हो गया है कि अयोग्यता प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ चुकी है।
किन सांसदों को मिला नोटिस?
अयोग्यता याचिकाओं में जिन 20 सांसदों के नाम हैं, उनमें काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंद्योपाध्याय, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, रचना बनर्जी, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, पार्थ भौमिक, अरूप चक्रवर्ती, दीपक देव अधिकारी, सायोनी घोष, बापी हलदार, मोहम्मद अबू ताहेर खान, कालीपद सारेन खेरवाल, असीत कुमार माल, जून मालिया, मिताली बाग, खलीलुर रहमान, माला रॉय, शर्मिला सरकार और यूसुफ पठान शामिल हैं।
बागी सांसद एनसीपीआई में शामिल
इस साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के इन 20 सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई में शामिल होने का फ़ैसला किया था। इसके बाद उन्होंने लोकसभा में अलग समूह के रूप में मान्यता की भी मांग की। हाल ही में मानसून सत्र के दौरान टीएमसी बाग़ियों को लोकसभा में अलग सीटें भी आवंटित की गई थीं। टीएमसी का कहना है कि सांसदों ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है, इसलिए उनकी लोकसभा सदस्यता ख़त्म होनी चाहिए।
पहले भी स्पीकर से मिल चुके हैं अभिषेक
अभिषेक बनर्जी ने 18 जून को अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की थीं। इसके बाद उन्होंने 27 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष को लिखित रूप से याद दिलाया और 12 अगस्त को स्वयं उनसे मुलाकात कर जल्द कार्रवाई की मांग भी की थी।अब लोकसभा सचिवालय द्वारा सात दिन के भीतर जवाब मांगने के बाद माना जा रहा है कि इस मामले की सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
बहरहाल, अब सभी 20 सांसदों को सात दिन के भीतर अपना जवाब देना होगा। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष उपलब्ध दस्तावेजों, दोनों पक्षों के तर्कों और दल-बदल कानून के प्रावधानों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेंगे। इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट की भी नजर बनी हुई है। यदि अयोग्यता याचिकाओं पर लंबे समय तक फ़ैसला नहीं होता तो अदालत आगे भी इस मामले में हस्तक्षेप कर सकती है।