दिल्ली दंगे में आरोपी उमर खालिद, शारजील इमाम को सोमवार को ज़मानत नहीं मिली। इससे पहले 21 बार उनकी ज़मानत अर्जी नामंजूर की गई। क्या देश में दो कानून हैं। रसूखदारों के लिए अलग और राजनीतिक एक्टिविस्टों के लिए अलग?
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से संबंधित मामले में उमर खालिद, शारजील इमाम की ज़मानत सोमवार को नामंज़ूर कर दी। इससे पहले बार-बार तारीख मिलती रही थी। हाईकोर्ट में यही हुआ और सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला कई बार टला। कभी जज नहीं, कभी जज को ज़रूरी काम की वजह से टालना पड़ा। कभी वकील वजह बने।
अभी तक यह मुकदमा शुरू नहीं हो पाया है। ट्रायल कोर्ट में जब से यह केस जमानत के लिए सुना गया और सुप्रीम कोर्ट में नवंबर तक 21 बार इस केस की सुनवाई टल चुकी है। हर बार तारीख मिलती रही है।
उमर खालिद और अन्य ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 2 सितंबर को उन्हें ज़मानत देने से इनकार करने के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। शीर्ष अदालत ने 22 सितंबर को पुलिस को नोटिस जारी किया था। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर हुई झड़पों के बाद फरवरी 2020 में दिल्ली में दंगे हुए थे। दिल्ली पुलिस के अनुसार, दंगों में 53 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए। उस दौरान बड़े पैमाने पर सोशल एक्टिविस्टों, छात्र नेताओं, मुस्लिम युवकों पर केस दर्ज हुए थे।
आसाराम को ज़मानत क्यों
दूसरी तरफ गुजरात हाई कोर्ट ने रेप केस में मुजरिम आसाराम की सजा को नवंबर 2025 में मेडिकल आधार पर 6 महीने के लिए सस्पेंड कर दिया है। यानी ज़मानत पर बाहर आया आसाराम 6 महीने और बाहर रहेगा।
आसाराम की सज़ा पर छह महीने का निलंबन आदेश गुजरात हाईकोर्ट की एक बेंच ने दिया था। आसाराम 2013 के रेप के मामले में दोषी करार है और उसे सजा सुनाई जा चुकी है। इससे पहले, राजस्थान हाईकोर्ट ने पिछले महीने आसाराम को सज़ा के निलंबन के साथ ज़मानत दे दी थी। अदालत ने उसकी "वेजीटेटिव कंडीशन" (अचेत अवस्था) और जेल में इलाज के लिए मेडिकल सुविधाओं की कमी को देखते हुए अपील स्वीकार कर ली थी।
अप्रैल 2018 में, जोधपुर की एक सेशन कोर्ट ने आसाराम को 2013 में अपने आश्रम में एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के लिए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी।
हालांकि रेप पीड़िता के वकील ने जबरदस्त आपत्ति जताई। पीड़िता के वकील बी.बी. नाइक ने दलील दी: “पिछली बार मैंने कहा था कि वह (आसाराम) भारत का दौरा करना चाहते हैं। 27 अगस्त के राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश में भी यह दर्ज किया गया है। आज वह इलाज ले रहे हैं। पेश किए गए मेडिकल प्रमाणपत्रों में यह नहीं कहा गया है कि उनकी स्थिति गंभीर है।”
राम रहीम को बार-बार जेल से बाहर जाने की इजाज़त क्यों
रेप के दोषी गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर 40 दिन की पैरोल मिल गई। वो हरियाणा के रोहतक में सुनारिया जेल में बंद है और पैरोल के दौरान सिरसा जिले में अपने डेरे के मुख्यालय में रहेगा। यह 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद उसकी 15वीं अस्थायी रिहाई है। 2021 के बाद हर साल उनको क़रीब 90 दिन की पैरोल मिल रही है और अब तक वह 350 से ज़्यादा दिन जेल से बाहर रहा है। उसको लगातार मिल रही ऐसी छूट पर बीजेपी सरकार पर सवाल उठते रहे हैं।
यह चौथी बार है जब पैरोल पर वे सिरसा डेरा जा रहा है। पहले की कई पैरोल या फरलो में वे उत्तर प्रदेश के बागपत में डेरे के आश्रम में रहता था। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को आखिरी बार अगस्त 2025 में 40 दिन की पैरोल मिली थी। उससे पहले अप्रैल में 21 दिन का फरलो और जनवरी में 30 दिन की पैरोल मिली थी, जो दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले थी।
फरलो किसी खास वजह के बिना दिया जा सकता है, अगर कैदी ने जेल में कुछ समय गुजारा हो। पैरोल किसी जरूरी वजह से मिलती है। राम रहीम को ज्यादातर पैरोल मिली हैं।
2017 में सीबीआई कोर्ट ने राम रहीम को अपनी दो महिला अनुयायियों से बलात्कार के लिए 20 साल की सजा सुनाई थी। यह घटना सिरसा डेरे में हुई थी। 2021 में उन्हें एक पत्रकार राम चंदर छत्रपति की हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा मिली थी।
इन दोनों फ़ैसलों को राम रहीम ने कोर्ट में चुनौती दे रखी है। इसके अलावा डेरा के मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के एक अन्य मामले में सजा हुई थी, लेकिन मई 2024 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया।
फरवरी 2024 में हाईकोर्ट ने कहा था कि राम रहीम को पैरोल बिना कोर्ट की इजाजत के नहीं दी जा सकती। यह उस समय कहा गया जब उन्हें 50 दिन की पैरोल मिली थी। लेकिन अगस्त 2024 में हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल या फरलो की अर्जी हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट 2022 के तहत बिना पक्षपात के तय की जाए। फैसला जेल विभाग पर छोड़ दिया गया।
राम रहीम की बार-बार पैरोल का शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी यानी एसजीपीसी जैसे सिख संगठनों ने विरोध किया है। वे कहते हैं कि दोषी व्यक्ति को इतनी बार रिहाई देना गलत है। कई लोग इसे राजनीतिक बताते हैं, क्योंकि डेरा सच्चा सौदा के लाखों अनुयायी हरियाणा, पंजाब और अन्य राज्यों में हैं और चुनाव में असर डाल सकते हैं।
ये तीनों मामले न्याय व्यवस्था की दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाते हैं। आसाराम और राम रहीम जैसे गंभीर अपराधी को बार-बार पैरोल मिल रही है, जबकि उमर खालिद और शारजील इमाम जैसे एक्टिविस्टों को पांच साल से भी ज्यादा समय से ज़मानत भी नहीं मिल रही। जानकार कहते हैं कि यूएपीए जैसे सख्त कानूनों में ज़मान मिलना मुश्किल होता है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा जुड़ा होता है। लेकिन आसाराम और राम रहीम के मामले में पैरोल आसानी से मिल जाती है, क्योंकि यह अच्छे व्यवहार पर आधारित होती है। हालाँकि, कई संगठन और लोग कहते हैं कि यह राजनीतिक प्रभाव का नतीजा है। आसाराम और राम रहीम के आश्रम-डेरे का बड़ा प्रभाव है, जबकि उमर जैसे एक्टिविस्ट सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलते हैं।