संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन कमेटी (UN Committee on the Elimination of Racial Discrimination- UNCERD) ने भारत में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), दलितों और रोहिंग्या शरणार्थियों सहित कुछ समुदायों के मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। कमेटी ने भारत से भेदभाव, नफरत फैलाने वाले भाषणों और घृणा अपराधों से तत्काल निपटने तथा मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने को कहा है। 

विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट को खारिज किया

भारत ने बुधवार को इस रिपोर्ट में कही गई बातों को खारिज कर दिया। भारत ने इन बातों को "राजनीति से प्रेरित" और "बेहद दुर्भावनापूर्ण" बताया और कहा कि इनमें बिना किसी ठोस आधार के सामान्य और मनगढ़ंत आरोप लगाए गए हैं। भारत इसकी कड़ी निंदा करता है।" विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत ने "रचनात्मक जुड़ाव की भावना" के साथ समीक्षा में हिस्सा लिया था और नस्लीय भेदभाव से निपटने के लिए अपनी अटूट प्रतिबद्धता को दोहराया। बयान में आगे कहा गया कि समीक्षा के दौरान भारत ने अपने संवैधानिक सुरक्षा उपायों, कानूनी ढांचे, विविधता और वंचित समुदायों की सुरक्षा के प्रयासों पर ज़ोर दिया। MEA ने कहा, "हालांकि हम तय प्रक्रिया के ज़रिए कमिटी की टिप्पणियों का जवाब देंगे, लेकिन भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अगुआई वाले अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल ने समीक्षा बैठक के दौरान ही तमाम आरोपों को खारिज कर दिया था।"

11वीं बैठक के बाद आई टिप्पणी

UNCERD ने 11 और 12 अगस्त 2026 को अपनी 11वीं बैठक में इसकी समीक्षा की थी। यह लंबे अंतराल के बाद भारत की समीक्षा थी। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किया। कमेटी की हालिया टिप्पणियां इसी समीक्षा के बाद सामने आई हैं। कमेटी ने खास तौर पर कानून लागू करने वाली एजेंसियों से जुड़े कथित मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता जताई। इनमें एक्स्ट्रा जूडिशल किलिंग, मनमानी और लंबे समय तक हिरासत, उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना गिरफ्तारी, यातना, दुर्व्यवहार और यौन हिंसा जैसे आरोप शामिल हैं। कमेटी ने ऐसे मामलों की तत्काल, निष्पक्ष और प्रभावी जांच तथा दोषियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत बताई है। हालांकि इस कमेटी की रिपोर्ट को भारतीय सदस्यों ने खारिज कर दिया।

दलित समुदायों को लेकर चिंता

संयुक्त राष्ट्र कमेटी ने भारत में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और दलित समुदायों के सामने मौजूद भेदभाव तथा हिंसा के मुद्दे को भी उठाया है। कमेटी का कहना है कि कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान वंचित और सामाजिक रूप से कमजोर समुदायों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। कमेटी ने नस्लीय या जातीय आधार पर होने वाली हिंसा और भेदभाव के मामलों में प्रभावी जांच तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है। उसका कहना है कि केवल कानूनों का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और पीड़ितों को न्याय मिलना भी जरूरी है।
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बंगाली भाषी मुसलमानों और रोहिंग्या का मुद्दा

UNCERD ने भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों और बंगाली भाषी मुसलमानों के साथ कथित भेदभाव, पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकारों की स्थिति पर भी चिंता जताई है। समिति ने भारत से ऐसे समुदायों के खिलाफ भेदभाव, नफरत फैलाने वाले भाषण और घृणा अपराधों से तत्काल निपटने को कहा है। 
कमेटी ने विशेष रूप से सामूहिक निष्कासन (collective expulsions) से बचने और शरण मांगने वाले लोगों के अधिकारों का सम्मान करने की बात कही है। यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में मौजूद 'नॉन-रिफाउलमेंट' (non-refoulement) के सिद्धांत से भी जुड़ा है, जिसके तहत किसी शरणार्थी या शरण मांगने वाले व्यक्ति को ऐसी जगह वापस भेजने से बचना होता है जहां उसके जीवन या स्वतंत्रता को गंभीर खतरा हो।

2017 के गृह मंत्रालय के आदेश का भी संदर्भ

समिति की चिंता के संदर्भ में भारत सरकार के 2017 के गृह मंत्रालय के उस आदेश का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें रोहिंग्या लोगों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए उनके बारे में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिए गए थे। बाद के वर्षों में रोहिंग्या समुदाय को लेकर पुलिस कार्रवाई और निर्वासन के मुद्दे लगातार बहस का विषय रहे हैं।

कमेटी ने यह भी ध्यान दिलाया कि अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई और कुछ समुदायों के खिलाफ बढ़ी कार्रवाई के आरोपों की पृष्ठभूमि में मानवाधिकारों की रक्षा महत्वपूर्ण है।

भारत ने क्या कहा?

समीक्षा के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने देश की बहुलता, विविधता और विशाल सामाजिक जटिलता को रेखांकित करते हुए मानवाधिकार और समानता सुनिश्चित करने के लिए किए जा रहे प्रयासों को सामने रखा। भारत की ओर से यह भी कहा गया कि देश सभी नागरिकों के लिए समानता, गरिमा और अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है। भारत ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया।

कमेटी ने भारत से इन कदमों की सिफारिश की

UNCERD की प्रमुख चिंताओं और सिफारिशों में broadly ये बातें शामिल हैं—
  • SC, ST और दलित समुदायों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को प्रभावी तरीके से रोकना।
  • नस्लीय या जातीय आधार पर होने वाली हिंसा के मामलों की तत्काल जांच करना।
  • मनमानी गिरफ्तारी और लंबे समय तक बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के हिरासत से बचना।
  • बंगाली भाषी मुसलमानों और रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ भेदभाव तथा घृणा अपराधों से निपटना।
  • सामूहिक निष्कासन से बचना और शरण मांगने वालों के अधिकारों की रक्षा करना।
  • कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए प्रभावी जवाबदेही सुनिश्चित करना।

क्या है UNCERD?

संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (UNCERD) एक स्वतंत्र विशेषज्ञ निकाय है, जो International Convention on the Elimination of All Forms of Racial Discrimination (ICERD) के तहत देशों द्वारा नस्लीय भेदभाव खत्म करने से संबंधित दायित्वों के पालन की समीक्षा करती है। समिति में 18 स्वतंत्र विशेषज्ञ हैं। भारत इस अंतरराष्ट्रीय समझौते का पक्षकार है और समय-समय पर समिति के सामने अपनी स्थिति और उठाए गए कदमों की जानकारी प्रस्तुत करता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए क्या मायने?

UNCERD की टिप्पणियां कानूनी रूप से किसी भारतीय अदालत के आदेश जैसी नहीं हैं, लेकिन वे भारत की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। खासकर SC-ST समुदायों, दलितों, रोहिंग्या और अन्य कमजोर समूहों से जुड़े मामलों में समिति की टिप्पणियां भारत की मानवाधिकार नीतियों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जवाबदेही पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी को रेखांकित करती हैं।
अब भारत के सामने चुनौती यह है कि वह समिति द्वारा उठाई गई चिंताओं पर प्रभावी कदमों के जरिए यह सुनिश्चित करे कि भेदभाव और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, पीड़ितों को न्याय मिले और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की कार्रवाई में संवैधानिक तथा मानवाधिकार मानकों का पालन हो।