केंद्रीय मंत्री भगीरथ चौधरी को खीरा की खेती के लिए अपने ही मंत्रालय ने 99 लाख की सब्सिडी मिल गई। द इंडियन एक्सप्रेस ने एक खोजी रिपोर्ट में यह दावा किया है। रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी को उनके ही मंत्रालय के अधीन चलने वाली योजना के तहत सरकारी सब्सिडी मिली है। इनके साथ ही एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के परिवार को भी 1.16 करोड़ की सब्सिडी मिली है। यह मामला सामने आने के बाद हितों के टकराव को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

मामला राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव में मंत्री भगीरथ चौधरी के फार्म से जुड़ा है। अंग्रेज़ी अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार यहाँ लगे एक बोर्ड पर लिखा है कि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की ओर से इस परियोजना के लिए 99.60 लाख रुपये की सहायता दी गई है। हालाँकि बोर्ड पर यह नहीं लिखा कि इस योजना का लाभ लेने वाले स्वयं केंद्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री हैं।
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कैसे लाभ लिया मंत्री ने?

रिपोर्ट के अनुसार, भगीरथ चौधरी ने अपने खेत में बड़े पैमाने पर खीरे की व्यावसायिक खेती के लिए पॉलीहाउस परियोजना शुरू की। इस परियोजना की कुल लागत करीब 1.99 करोड़ रुपये बताई गई है।

इसमें क़रीब 49.80 लाख रुपये स्वयं लगाए गए। 1.49 करोड़ रुपये का बैंक से कर्ज लिया गया। परियोजना पूरी होने के बाद 99.03 लाख रुपये की सरकारी सब्सिडी सीधे बैंक ऋण खाते में जमा कर दी गई। यह सब्सिडी राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की योजना के तहत दी गई।

किस योजना के तहत मिली सब्सिडी?

यह सहायता 'डेवलपमेंट ऑफ कमर्शियल हॉर्टिकल्चर थ्रू प्रोडक्शन एंड पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर क्रॉप्स' योजना के तहत दी गई। यह योजना मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर का हिस्सा है, जिसे केंद्र सरकार 2014-15 से चला रही है।

योजना के तहत खीरा, टमाटर और शिमला मिर्च जैसी सब्जियों की व्यावसायिक खेती पर सहायता मिलती है। फूलों की खेती भी इसमें शामिल है। परियोजना लागत का 50 प्रतिशत, अधिकतम 1 करोड़ रुपये तक सब्सिडी दी जाती है।

विवाद क्यों खड़ा हुआ?

विवाद की वजह यह है कि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड कृषि मंत्रालय के अधीन काम करता है और उसके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में केंद्रीय कृषि मंत्री पदेन अध्यक्ष होते हैं, जबकि कृषि राज्य मंत्री पदेन उपाध्यक्ष होते हैं। यानी जिस बोर्ड के माध्यम से यह योजना संचालित होती है, उसी बोर्ड के पदेन उपाध्यक्ष स्वयं भगीरथ चौधरी हैं। हालाँकि, नियमों के अनुसार परियोजनाओं की अंतिम मंजूरी एक अलग प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी देती है, जिसमें अध्यक्ष और उपाध्यक्ष शामिल नहीं होते। इसके बावजूद सवाल उठ रहे हैं कि क्या मंत्री द्वारा अपने ही मंत्रालय की योजना का लाभ लेना हितों के टकराव की स्थिति पैदा करता है।

आवेदन और मंजूरी में तेजी

दस्तावेजों के अनुसार 15 अप्रैल 2025 को परियोजना के लिए आवेदन किया गया। मात्र 14 दिन बाद यानी 29 अप्रैल 2025 को सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई। 11 मार्च 2026 को अंतिम स्वीकृति दी गई। 30 मार्च 2026 को लगभग 99.03 लाख रुपये की सब्सिडी बैंक खाते में जमा कर दी गई।

मंत्री की संपत्ति घोषणा में परियोजना का ज़िक्र नहीं

द इंडियन एक्सप्रेस ने ख़बर दी है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में जमा मंत्री भगीरथ चौधरी की 31 मार्च 2025 तक की संपत्ति घोषणा में पीह गांव की कृषि भूमि का उल्लेख तो है, लेकिन इस परियोजना का कोई ज़िक्र नहीं है। हालांकि मंत्री कार्यालय के एक सहयोगी ने कहा कि परियोजना का विवरण सरकार को उपलब्ध कराया जाएगा।

पहले भी किया था आवेदन

रिपोर्ट के अनुसार, यह पहली बार नहीं था जब भगीरथ चौधरी ने इस योजना के लिए आवेदन किया था। वर्ष 2018 में भी उन्होंने आवेदन किया था, लेकिन तकनीकी कारणों से वह खारिज हो गया था। उसी वर्ष उनके बेटे ने भी इसी योजना के तहत आवेदन किया था, जिसे योजना की शर्तें पूरी न होने के कारण मंजूरी नहीं मिली थी।

मीडिया संस्थान ने भगीरथ चौधरी से यह पूछा कि क्या अपनी ही मंत्रालय की योजना का लाभ लेना हितों के टकराव का मामला माना जा सकता है? रिपोर्ट के अनुसार, खबर प्रकाशित होने तक मंत्री की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
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IAS अधिकारी के परिवार को भी मिली सब्सिडी

यह सिर्फ मंत्री जी तक सीमित नहीं है। वर्तमान में मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में सचिव नरेश पाल गंगवार के परिवार के तीन सदस्यों- मां, पत्नी और बेटे को इस योजना से 1.16 करोड़ रुपये से ज्यादा सब्सिडी मिली है। सभी प्रोजेक्ट जयपुर जिले में खीरे की खेती के हैं। रिपोर्ट के अनुसार उनकी मां बिंदुमती को 46.03 लाख रुपये जनवरी 2025 में, बेटा कुमार वृत्विक को 46.49 लाख रुपये मार्च 2023 में और पत्नी डॉ. रंजिता सिंह को 24.36 लाख रुपये 2021-22 में सब्सिडी मिली। 

गंगवार ने अपनी संपत्ति घोषणा में कुछ प्रोजेक्ट्स का जिक्र किया है, लेकिन नियमों के अनुसार परिवार के सदस्यों की जानकारी देने पर सवाल उठे हैं। उन्होंने जवाब दिया कि मां और बेटा उन पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं हैं, इसलिए उनकी जानकारी देना ज़रूरी नहीं था।

योजना के तहत कौन ले सकता है लाभ?

सरकारी नियमों के अनुसार इस योजना का लाभ किसान, स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन, सहकारी समितियां, कंपनियां, ट्रस्ट, विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान सभी ले सकते हैं, यदि वे निर्धारित शर्तें पूरी करते हों। योजना के तहत कम से कम 4000 वर्गमीटर भूमि, बैंक ऋण और अन्य तकनीकी मानकों को पूरा करना अनिवार्य होता है।

अब क्या सवाल उठ रहे हैं?

इस मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह बहस तेज हो गई है कि भले ही नियमों के तहत मंत्री की परियोजना को किसी अलग समिति ने मंजूरी दी हो, लेकिन क्या अपने ही मंत्रालय की योजना से सब्सिडी लेना नैतिक रूप से उचित माना जा सकता है।

फिलहाल इस मामले में सरकार या केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।