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फाइल फोटो

7 दिनों में पूरे देश में लागू हो जाएगा सीएए? जानें केंद्रीय मंत्री का दावा

केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने दावा किया है कि अगले सात दिनों में पूरे देश में नागरिकता (संशोधन) कानून यानी सीएए लागू कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया गया है और अगले सात दिनों के भीतर पूरे देश में सीएए लागू किया जाएगा, ये मेरी गारंटी है। उन्होंने यह बात पश्चिम बंगाल में एक सार्वजनिक सभा में कही है।

सीएए को दिसंबर 2019 में अधिनियमित किया गया था और 10 जनवरी, 2020 को क़ानून बन गया। लेकिन सीएए नियमों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है और इसी वजह से अभी तक इस क़ानून के तहत किसी को नागरिकता नहीं दी जा सकी है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। इन देशों के हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदाय के उन लोगों को नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए थे।

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दिसंबर 2019 में संसद द्वारा सीएए पारित होने और बाद में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद देश के कुछ हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। 

सीएए 2019 के अंत में और 2020 की शुरुआत में देश में प्रमुख मुद्दा था। इसको लेकर देश के कुछ हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इस क़ानून को भेदभावपूर्ण क़रार दिया गया था और इसकी व्यापक रूप में आलोचना की गई थी। ऐसा इसलिए था कि यह धर्म के आधार पर नागरिकता देने की बात करता है। आलोचकों का कहना है कि नियोजित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर या एनआरसी के साथ इस क़ानून से लाखों मुसलमान अपनी नागरिकता खो देंगे। हालांकि, केंद्र का कहना है कि कोई भी भारतीय अपनी नागरिकता नहीं खोएगा। जबकि पहले गृह मंत्री अमित शाह क़्रोनोलॉजी समझाते हुए कह चुके हैं कि सीएए के बाद एनआरसी और फिर एनपीआर आएगा। 

इसी आशंका को देखते हुए देश भर के अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। जामिया के शाहीन बाग में महिलाओं ने शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन किया था। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में भी बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था। यूपी में कई जगहों पर ऐसे ही प्रदर्शन किए गए थे। उत्तर पूर्वी राज्यों में भी तब बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। कई जगहों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने के आरोप में बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया था। कई जगहों पर लोगों के मारे जाने की ख़बर भी आई थी।
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शाहीन बाग का आंदोलन तीन महीने से ज़्यादा समय तक चला था। कंपकंपाती सर्द रात में भी महिलाएँ डटी रहीं। इस बीच उनको हटाने की लगातार कोशिशें हुईं। सुप्रीम कोर्ट तक में मामला गया। और आख़िरकार कोविड लॉकडाउन के दौरान उन्हें बड़ी मुश्किल से हटाया गया। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ था। तब पुलिस पर आरोप लगा था कि उसने जामिया के होस्टल में घुसकर छात्रों पर लाठी चार्ज किया था। हालाँकि पुलिस इन आरोपों को खारिज करती रही। 

लेकिन सीएए के क़ानून बनने के बाद सरकार लगातार कहती रही कि इसको लागू होने से कोई रोक नहीं सकता है। पिछले साल 27 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सीएए के कार्यान्वयन को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि यह देश का कानून है और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर इस मुद्दे पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया था। ऐसे ही बयानों में इसको लागू किए जाने में पाँच साल बित गए। 

किसी भी कानून के नियम राष्ट्रपति की सहमति के छह महीने के भीतर तैयार किए जाने चाहिए या लोकसभा और राज्यसभा में अधीनस्थ विधान समितियों से विस्तार की मांग की जानी चाहिए। 2020 से गृह मंत्रालय नियम बनाने के लिए संसदीय समितियों से एक्सटेंशन लेता रहा है।
इसी महीने एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि सरकार लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के नियमों को अधिसूचित किया जा सकता है। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार एक अधिकारी ने कहा कि सीएए के तहत आवेदन, प्रसंस्करण और नागरिकता देने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा एक ऑनलाइन प्रणाली ढूंढी जा रही है।
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रिपोर्ट के अनुसार पदाधिकारी ने कहा, 'नियम तैयार हैं और ऑनलाइन पोर्टल भी मौजूद है और पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। आवेदकों को उस वर्ष की घोषणा करनी होगी जब उन्होंने यात्रा दस्तावेजों के बिना भारत में प्रवेश किया था। आवेदकों से कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा। जो लोग पहले ही नागरिकता के लिए आवेदन कर चुके हैं उन्हें नए सिरे से आवेदन करने की आवश्यकता नहीं होगी।'

तो सवाल है कि ऐन चुनाव से पहले ही सीएए के नियमों को अधिसूचित क्यों किया जा रहा है? क्या 2024 का इंतज़ार हो रहा था? चुनावों से पहले ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप झेलती रही बीजेपी क्या किसी चुनावी मक़सद से इसे अब अधिसूचित करने जा रही है?

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क़मर वहीद नक़वी
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