यूपी एमएलसी चुनाव में बीजेपी को झटका और सपा की सीटें बढ़ने के बाद अमित शाह ने 2027 में बीजेपी की सरकार बनने पर समान नागरिक संहिता लागू करने का ऐलान किया। क्या बीजेपी फिर हिंदुत्व के एजेंडे पर लौट रही है?
यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति में हिंदुत्व की वापसी के संकेत मिले हैं। एमएलसी चुनाव में समाजवादी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन और बीजेपी को मिले झटके के बीच अमित शाह ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने का वादा किया। क्या बीजेपी विकास और संगठन के साथ अब अपने पुराने वैचारिक एजेंडे को भी चुनाव के केंद्र में लाना चाहती है? कम से कम अमित शाह के आज सामने आये बयान से तो यही संकेत मिल रहा है। बीजेपी के पूरी राजनीति इसी हिंदुत्व के दम पर चलती रही। लेकिन जनता इस एजेंडे से उकता चुकी है। एमएलसी चुनाव ने इसे साबित भी कर दिया है।
उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव में बीजेपी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। समाजवादी पार्टी ने 2020 के मुकाबले अपना प्रदर्शन बेहतर किया और अपनी सीटों की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच कर ली। कुछ सीटों पर सपा ने बीजेपी से अधिक वोट शेयर भी हासिल किया। इन नतीजों ने बीजेपी के सामने एक राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। खासकर इसलिए कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार और बीजेपी संगठन लगातार विकास, कानून-व्यवस्था और अपनी राजनीतिक उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहे हैं।
इस बार जब सरकार सत्ता में आएगी, तो उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू की जाएगी। यूसीसी पहले ही कई राज्यों में लागू हो चुकी है। अगर आप उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनाते हैं, तो हम उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू करेंगे। -अमित शाह, केंद्रीय गृहमंत्री शुक्रवार 30 अक्टूबर लखनऊ
यूपी प्रदेश बीजेपी कार्यकारिणी बैठक
एमएलसी चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने का ऐलान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। अमित शाह ने शुक्रवार 30 अक्टूबर को लखनऊ में बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि अगर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता में लौटती है, तो उत्तर प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी।
यह घोषणा सिर्फ एक नीतिगत वादा नहीं है। इसे यूपी की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में बीजेपी के चुनावी एजेंडे और विपक्ष की चुनौती के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के तौर पर भी देखा जा सकता है।
उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में बीजेपी ने छह सीटें जीतकर अपनी पुरानी संख्या बरकरार रखी। लेकिन समाजवादी पार्टी ने तीन से पांच सीटों तक पहुंचकर अपनी स्थिति मजबूत की। यहां बीजेपी के लिए चुनौती सिर्फ सीटों की संख्या नहीं है। चुनाव से पहले पार्टी को उम्मीद थी कि वह अपने प्रदर्शन में सुधार करेगी और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक ताकत का संदेश देगी।
इसके उलट, सपा ने लखनऊ स्नातक सीट बीजेपी से छीन ली और आगरा शिक्षक सीट पर जीत हासिल की, जो 2020 में निर्दलीय उम्मीदवार के पास थी। सपा ने वाराणसी की दोनों सीटों और इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट पर भी अपना कब्जा बरकरार रखा। बीजेपी ने मेरठ और आगरा की स्नातक सीटों के साथ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चार सीटें जीतीं। गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर बीजेपी की जीत बेहद करीबी रही।
वाराणसी और लखनऊ में बीजेपी को झटकाः एमएलसी चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत वाराणसी और लखनऊ से आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी ने स्नातक और शिक्षक, दोनों सीटें जीत लीं। लखनऊ में भी सपा ने स्नातक सीट पर बीजेपी को हराया। वाराणसी में सपा उम्मीदवार आशुतोष सिन्हा ने 55,046 वोट हासिल किए, जबकि लखनऊ में कांति सिंह ने बीजेपी के अवनीश कुमार सिंह को हराया। लखनऊ में कांति सिंह को 56,905 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को 39,778 वोट मिले।
ये नतीजे बीजेपी के लिए इसलिए भी अहम हैं क्योंकि पार्टी इन क्षेत्रों को अपनी राजनीतिक ताकत के केंद्रों में गिनती रही है। हालांकि, एमएलसी चुनाव में मतदाता सामान्य विधानसभा चुनावों की तरह सभी नागरिक नहीं होते। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में सीमित और विशेष मतदाता वर्ग मतदान करता है। फिर भी, इन नतीजों से बीजेपी को यह संकेत जरूर मिला है कि विपक्षी समाजवादी पार्टी कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर रही है।
एमएलसी चुनाव के बाद बीजेपी ने हिंदुत्व का एजेंडा तेज किया?
एमएलसी चुनाव के नतीजों और अमित शाह के यूसीसी संबंधी ऐलान के बीच राजनीतिक संबंध तलाशना स्वाभाविक है। दरअसल, बीजेपी की राजनीति में समान नागरिक संहिता नया मुद्दा नहीं है। यह पार्टी के लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक एजेंडे का हिस्सा रहा है। उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद बीजेपी ने इसे अपने शासन और वैचारिक प्रतिबद्धता के उदाहरण के तौर पर पेश किया है। लेकिन यूपी में यूसीसी को लेकर पिछले चार-पांच साल से सिर्फ बयान ही सामने आये हैं।
- अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी की घटना सामने आने के बाद यूपी में बीजेपी के धार्मिक एजेंडे पीछे छूट गये थे।
- अयोध्या राम मंदिर में चोरी का मामला एमएलसी चुनाव के दौरान हावी रहा और अब जब नतीजे आये तो बीजेपी को समझ में आ गया
अयोध्या राम मंदिर चोरी की घटना पर बीजेपी और उसकी यूपी सरकार ने लीपापोती की।
- अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट की नियुक्तियों या तो आरएसएस या फिर पीएमओ का सीधा हाथ था।
समाजवादी पार्टी लगातार सामाजिक न्याय, पिछड़ों और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति के जरिए अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक समीकरणों को भी साधे।
समाजवादी पार्टी के लिए क्या है एमएलसी चुनाव का संदेश?
समाजवादी पार्टी के लिए इन नतीजों का महत्व सिर्फ दो अतिरिक्त सीटें जीतने तक सीमित नहीं है। अखिलेश यादव की पार्टी ने लखनऊ और वाराणसी जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जीत हासिल की। इससे सपा को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और बीजेपी को चुनौती देने का अवसर मिला है। एमएलसी चुनाव में सपा की पांच सीटों की जीत ने उसे विधान परिषद में भी मजबूत किया है। पार्टी की संख्या 10 से बढ़कर 12 हो गई है, जिससे उसे नेता प्रतिपक्ष का पद बनाए रखने में मदद मिली है। लेकिन सपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। एमएलसी चुनाव में जीतने वाले मतदाता समूह विधानसभा चुनाव के व्यापक मतदाता वर्ग से अलग हैं। इसलिए यह देखना होगा कि सपा इस राजनीतिक बढ़त को विधानसभा चुनाव में कितनी प्रभावी तरीके से बदल पाती है।बीजेपी के सामने 2027 की बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच एक बड़े राजनीतिक मुकाबले के रूप में उभर रहा है।
बीजेपी के सामने सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी का लक्ष्य है। वहीं, समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने बेहतर प्रदर्शन के बाद विधानसभा चुनाव में भी उसी राजनीतिक बढ़त को बनाए रखना चाहती है। एमएलसी चुनाव ने बीजेपी को यह संकेत दिया है कि विपक्ष को कमजोर मानकर चलना जोखिम भरा हो सकता है। समाजवादी पार्टी ने न केवल अपनी सीटें बढ़ाईं, बल्कि बीजेपी के कुछ मजबूत क्षेत्रों में भी उसे चुनौती दी।ऐसे में अमित शाह का यूसीसी लागू करने का ऐलान बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है, जिसमें पार्टी विकास और संगठन के साथ हिंदुत्व को भी चुनावी बहस के केंद्र में रखना चाहती है।लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यूसीसी जैसे मुद्दे बीजेपी को 2027 में सत्ता में वापसी कराने के लिए पर्याप्त होंगे? या फिर समाजवादी पार्टी की सामाजिक समीकरणों और स्थानीय मुद्दों पर आधारित राजनीति बीजेपी के लिए नई चुनौती बनकर उभरेगी? एमएलसी चुनाव के नतीजे इस सवाल का अंतिम जवाब नहीं देते। लेकिन वे इतना जरूर बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 2027 की लड़ाई बीजेपी के लिए आसान नहीं होने वाली है।