लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार 2 फरवरी को जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब से कुछ अंश सदन में पढ़ने चाहे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह फौरन उठकर खड़े हो गए कि नियमों के तहत सदन में किसी किताब या मैग़ज़ीन के किसी भी हिस्से को नहीं पढ़ा जा सकता। लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने भी नियमों का हवाला देकर राहुल गांधी को रोक दिया। संसद में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी मांग की कि राहुल गांधी को बोलने दिया जाए लेकिन स्पीकर ने अनुमति नहीं दी। 
सवाल है कि राहुल गांधी उस किताब से ऐसा क्या पढ़ना चाहते हैं, जो सरकार सामने नहीं आने देना चाहती है। यह मामला लद्दाख में चीन की सेना के आगे बढ़ने से जुड़ा है। जिसकी गलवान घाटी में भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच टकराव हुआ। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता समय-समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि चीन ने भारत के बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया है। लेकिन मोदी सरकार इसको मनाने से इंकार कर रहती रही है। बल्कि पीएम मोदी ने बयान भी दिया था कि हमारी सीमा में न कोई आया था और न कोई आया है। पीएम मोदी के बयान के बाद यह मामला सुलझने की बजाय उलझ गया। 
उसके बाद लगातार ऐसी खबरें आती रहीं कि चीन ने भारत की कई सीमाओं पर कब्जा कर रखा है। लेकिन सरकार उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। रिटायर्ड जनरल नरवणे की किताब से पता चलता है कि एक बार ऐसी स्थिति जब आई तो भारत का शीर्ष नेतृत्व यानी पीएम मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह समेत तमाम लोग फैसला नहीं ले सके। नरवणे चूंकि जनरल थे तो उनसे ज्यादा असली कहानी कोई नहीं जानता। लेकिन उन्होंने उन तथ्यों को किताब में लिख दिया। इसलिए सरकार घबरा रही है कि उसकी कमज़ोरी बाहर आ जाएगी। कारवां मैगज़ीन ने जनरल नरवणे की किताब के कुछ अंशों को प्रकाशित किया है। राहुल गांधी कारवां पत्रिका में प्रकाशित उन्हीं अंशों को 2 फरवरी को पढ़ना चाहते थे। 
कारवां पत्रिका के मुताबिक जनरल नरवणे ने लिखा हैः
भारतीय सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को 31 अगस्त 2020 की रात 8:15 बजे एक फोन कॉल मिला। उन्हें जो सूचना मिली, उसने उन्हें चौंका दिया। चार चीनी टैंक, पैदल सेना के साथ, पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर जाने वाले एक खड़ी पहाड़ी रास्ते पर चढ़ते हुए आगे बढ़ने लगे थे। जोशी ने इस गतिविधि की सूचना फौरन सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी, जिन्होंने स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझ लिया।
ये टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय ठिकानों से कुछ ही सौ मीटर की दूरी पर थे। वह रणनीतिक ऊंचाई जिसे भारतीय बलों ने कुछ ही घंटे पहले, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ एक खतरनाक संघर्ष में, अपने कब्जे में लिया था। विवादित वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी)- जो दोनों देशों के बीच वास्तविक सीमा है- के इस दुर्गम इलाके में ऊंचाई का हर मीटर रणनीतिक बढ़त में बदल जाता है।
भारतीय सैनिकों ने एक इल्यूमिनेटिंग राउंड दागा, जो चेतावनी थी। इसका कोई असर नहीं हुआ। चीनी आगे बढ़ते रहे। नरवणे ने भारत के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के शीर्ष लोगों को घबराहट भरे फोन करने शुरू किए। जिनमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल थे।


नरवणे अपनी अप्रकाशित आत्मकथा *फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी* में लिखते हैं, “हर एक से मेरा सवाल था- ‘मेरे लिए क्या आदेश हैं?’”

स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और स्पष्ट निर्देशों की मांग कर रही थी। दूसरी तरफ प्रोटोकॉल था। नरवणे को स्पष्ट आदेश थे कि “ऊपर से मंजूरी मिलने तक” गोली न चलाई जाए। उनके वरिष्ठों की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिला। मिनट बीतते गए। रात 9:10 बजे जोशी ने फिर फोन किया।


चीनी टैंक आगे बढ़ते रहे और अब दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे। रात 9:25 बजे नरवणे ने फिर राजनाथ सिंह को फोन कर “स्पष्ट निर्देश” मांगे। कोई जवाब नहीं मिला।


इसी बीच, पीएलए कमांडर मेजर जनरल ल्यू लिन का संदेश आया। उन्होंने तनाव कम करने का प्रस्ताव रखा- दोनों पक्ष आगे की गतिविधि रोक दें और स्थानीय कमांडर अगले दिन सुबह 9:30 बजे दर्रे पर मिलें, दोनों ओर से तीन-तीन प्रतिनिधि हों। यह एक उचित प्रस्ताव लग रहा था। कुछ देर के लिए ऐसा लगा कि टकराव से निकलने का रास्ता बन रहा है।
रात 10 बजे नरवणे ने यह संदेश राजनाथ सिंह और अजित डोभाल तक पहुंचाया। दस मिनट बाद उत्तरी कमान से फिर फोन आया। चीनी टैंक नहीं रुके थे। वे अब शिखर से मात्र पांच सौ मीटर दूर थे।


नरवणे को याद है कि जोशी ने कहा, “उन्हें रोकने का एकमात्र तरीका हमारी अपनी मध्यम तोपखाने से फायर खोलना है, जो तैयार और तैनात है।” पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा पर तोपखाने की छोटी-मोटी फायरिंग आम बात थी, जहां डिवीजन और कोर कमांडरों को बिना ऊपर से अनुमति लिए प्रतिदिन सैकड़ों गोले दागने का अधिकार था।


लेकिन यह चीन था। मामला अलग था। पीएलए के साथ तोपखाने की भिड़ंत कहीं बड़े संघर्ष में बदल सकती थी।
नरवणे लिखते हैं, “मेरी स्थिति बेहद नाजुक थी।” एक तरफ “कमांड थी जो हर संभव साधन से फायर खोलना चाहती थी,” और दूसरी तरफ सरकार की एक कमेटी थी “जो अब तक मुझे स्पष्ट कार्यकारी आदेश नहीं दे पाई थी।” सेना मुख्यालय के ऑपरेशन रूम में विकल्पों पर विचार हो रहा था और उन्हें खारिज किया जा रहा था। पूरा उत्तरी मोर्चा हाई अलर्ट पर था।


संभावित टकराव वाले क्षेत्रों की निगरानी की जा रही थी। लेकिन निर्णायक बिंदु रेचिन ला था। नरवणे ने रक्षा मंत्री को एक और फोन किया, जिन्होंने वापस कॉल करने का वादा किया। समय खिंचता गया। हर मिनट चीनी टैंकों के शिखर तक पहुंचने के और करीब ले जा रहा था। रात 10:30 बजे राजनाथ सिंह का फोन आया।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी, जिनका निर्देश एक ही वाक्य में था- “जो उचित समझो, वह करो।”
यह फैसला “पूरी तरह सैन्य” स्तर पर होना था। मोदी से सलाह ली गई थी। उन्हें जानकारी दी गई थी। लेकिन उन्होंने निर्णय लेने से इनकार कर दिया था। नरवणे याद करते हैं, “मुझे मुश्किल हालात में डाल दिया गया था। इस पूरी छूट के साथ अब पूरा जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी।”