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मौलाना महमूद मदनी

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दोनों गुट क्यों हो रहे एक?

भारतीय मुसलमानों के प्रमुख संगठन जमीयत उलमा-ए-हिंद (JUH) के दोनों गुट एक होने जा रहे हैं। मौलाना महमूद मदनी गुट ने शुक्रवार को दो दिवसीय बैठक के बाद, अरशद मदनी गुट के साथ विलय की प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रस्ताव पारित किया। अरशद मदनी गुट की कार्यसमिति ने पिछले महीने इस विलय को हरी झंडी दे दी थी। जेयूएच के देश में 1.5 करोड़ सदस्य और अनुयायी हैं। यह देश के सबसे बड़े मुस्लिम संगठनों में माना जाता है। 
2008 में दोनों गुट अलग हुए थे। महमूद मदनी गुट की कार्य समिति के सदस्यों ने तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के संचालन के तरीके पर आपत्ति जताई थी, और उन्होंने अपना गुट बनाया था।
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पिछले शुक्रवार को पारित हुए प्रस्ताव से अब 14 साल बाद दोनों गुटों में सुलह का रास्ता खुला है। एक बयान में संगठन ने कहा कि लंबे विचार-विमर्श के बाद, आम राय से जमीयत उलेमा-ए-हिंद की कार्य समिति संगठन की हालिया सुलह प्रक्रिया की सराहना करती है और सुलह की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सहमत है। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए, वर्किंग कमेटी ने जमीयत के अध्यक्ष मौलाना महमूद, अरशद मदनी को जमीयत के संविधान के अनुसार सुलह की प्रक्रिया जारी रखने के लिए अधिकृत किया है। 
इस विलय को आसान बनाने के लिए वर्किंग कमेटी ने यह भी प्रस्ताव पारित किया कि कार्य समिति के सभी सदस्य, विशेष आमंत्रित, राज्य अध्यक्ष और महासचिव जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी को अपना इस्तीफा सौंप दें। 
कार्यसमिति ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि धार्मिक कट्टरता और राजनीतिक नेताओं द्वारा प्रचारित धार्मिक नेताओं का अपमान देश के लिए एक गंभीर खतरा है और ग्लोबल बिरादरी के बीच देश की छवि को धूमिल करेगा। विशेष रूप से, सत्तारूढ़ दल, उससे जुड़े राजनीतिक नेताओं और यहां तक कि संसद के सदस्यों और विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अपमानजनक बयानों को तुरंत रोका जाना चाहिए।
प्रस्ताव में कहा गया कि जमीयत-उलेमा-ए-हिंद भारत सरकार से सांप्रदायिक विरोधी दंगों और अपमानजनक बयानों को तुरंत रोकने और हिंसा को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आलोक में प्रभावी कानून लागू करने का अनुरोध करती है। साथ ही बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के बीच विश्वास का माहौल बनाने की अपील करती है। जेयूएच ने कहा उसने विभिन्न धार्मिक समुदायों के नेताओं के बीच "सद्भावना" कार्यक्रम आयोजित करना शुरू कर दिया है।

यह विलय क्यों

देश में बढ़ती सांप्रदायिकता और मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को देखते हुए जेयूएच के दोनों गुटों को मर्ज करने की जरूरत महसूस की गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नेताओं का मानना है कि मुसलमानों के तमाम संगठन अलग-अलग रहकर मुसलमानों के मुद्दों के लिए नहीं लड़ सकते। अगर वे एक होकर लड़ते हैं तो इससे न सिर्फ मजबूती मिलेगी, बल्कि उस आवाज को सरकार को भी सुनना होगा। इसलिए मदनी परिवार ने अपने घर से ही इस एकता की शुरुआत की थी। हालांकि पिछले दिनों जमीयत की जो कॉन्फ्रेंस देवबंद (सहारनपुर) में हुई थी, उसमें भी तमाम मुस्लिम संगठनों से एकता की अपील की गई थी। लेकिन उस अपील पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसके बाद मदनी परिवार ने सबसे पहले अपने घर में ही एकता की जरूरत महसूस की।

Why are the two factions of Jamiat Ulema-e-Hind uniting - Satya Hindi
मौलाना अरशद मदनी
देवबंद बैठक में लगभग 2,000 सदस्य एकसाथ आए थे। अरशद मदनी भी निमंत्रण पर बैठक में शामिल हुए थे। उसी बैठक में अरशद मदनी ने संकेत दे दिया था कि यह "एकजुट होने" का समय है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने उस समय जो खबर दी थी, उसमें अरशद मदनी ने आपस में विलय करके एक बैनर के तहत मुसलमानों की चिंता को और अधिक मुखर रूप से सामने रखने का तरीका बताया था। खबर में उनके हवाले से कहा गया था कि हमारी कार्य समिति ने विलय के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है और शर्तों पर बातचीत करने के लिए इसे मुझ पर छोड़ दिया है। अब हमें दूसरे गुट की कार्यसमिति के निर्णय का इंतजार करना होगा और जुलाई में उनकी बैठक में अपना पक्ष रखना होगा। चीजें वहीं से आगे बढ़ेंगी। 

क्यों हुए थे अलग

2006 में अध्यक्ष असद मदनी के निधन के बाद जेयूएच में विभाजन शुरू हो गया था। अरशद मदनी अध्यक्ष बन चुके थे। असद मदनी के बेटे और अरशद मदनी के भतीजे महमूद मदनी संगठन के महासचिव थे। पावर सेंटर बंटने और संगठन के कामकाज को लेकर अरशद मदनी और महमूद मदनी के बीच विवाद छिड़ गया। फैसलों को निरंकुश बताते हुए अरशद मदनी को संयुक्त जमीयत के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने एक नई कार्यकारी समिति का गठन किया जबकि मौजूदा जमीयत उलेमा-ए-हिंद का नेतृत्व महमूद मदनी के पास है।
यह मामला अदालत में भी पहुंचा था। 2017 में, दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों गुटों को मध्यस्थता के माध्यम से अपने मतभेदों को सुलझाने और आम सहमति पर पहुंचने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा था कि यह देश का पुराना संगठन है। इसे आप लोग मिलजुल कर चलाएं।

क्या है जमीयत उलेमा-ए-हिंद

जमीयत उलेमा-ए-हिंद का इतिहास गौरवशाली है। इसके नेताओं ने भारत की आजादी की लड़ाई में शहादत दी है। तमाम शहरों में अंग्रेजों के खिलाफ छेड़े गए आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई है। जमीयत के इतिहास की शुरुआत 1919 से होती है।

23 नवंबर 1919 को, खिलाफत समिति (उस समय के खिलाफत मूवमेंट की कमेटी) ने दिल्ली में अपना पहला सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें पूरे भारत के मुस्लिम विद्वानों ने भाग लिया। बाद में, उनमें से 25 मुस्लिम विद्वानों के एक समूह ने दिल्ली के कृष्णा थिएटर हॉल में एक अलग सम्मेलन आयोजित किया और जमीयत उलमा-ए-हिंद का गठन किया। इन लोगों में अब्दुल बारी फिरंगी महली, अहमद सईद देहलवी, किफायतुल्लाह देहलवी, मुनिरुज्जमां खान, मोहम्मद अकरम खान, मुहम्मद इब्राहिम मीर सियालकोटी और सनाउल्लाह अमृतसरी शामिल थे। अन्य लोगों में अब्दुल हलीम गयावी, आजाद सुभानी, बख्श अमृतसरी, इब्राहिम दरभंगावी, मुहम्मद अब्दुल्ला, मुहम्मद इमाम सिंधी, मुहम्मद असदुल्ला सिंधी, मुहम्मद फकीर, मुहम्मद अनीस, मुहम्मद सादिक, खुदाबख्श मुजफ्फरपुरी, ख्वाजा गुलाम निजामुद्दीन, कादिर बख्श, सलामतुल्लाह, सैय्यद इस्माइल, सैय्यद कमालुद्दीन, सैय्यद मुहम्मद दाऊद और ताज मुहम्मद शामिल थे। 

पहला अध्यक्ष

जब जमीयत उलेमा-ए-हिंद की स्थापना हुई, किफायतुल्लाह देहलवी को अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया और अहमद सईद देहलवी को अंतरिम सचिव बनाया गया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद की पहली आम बैठक 28 दिसंबर 1919 को सनाउल्लाह अमृतसरी के अनुरोध पर अमृतसर में हुई थी, जिसमें किफ़ायतुल्ला देहलवी ने संगठन के संविधान का एक मसौदा प्रस्तुत किया था। एक आम धारणा यह है कि जमीयत की स्थापना महमूद हसन देवबंदी और हुसैन अहमद मदनी सहित उनके अन्य सहयोगियों ने की थी, हालांकि यह सच नहीं है। क्योंकि संगठन की स्थापना के समय वे माल्टा में जेल में थे।

महत्वपूर्ण जानकारियां

8 सितंबर 1920 को जमीयत ने एक धार्मिक फरमान जारी किया, जिसे फतवा तार-ए-मवलत कहा गया, जिसमें ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार किया गया था। यह अबुल मोहसिन सज्जाद द्वारा लिखा गया था और 500 विद्वानों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था। ब्रिटिश राज के दौरान जमीयत ने भारत में ब्रिटिश शासन का विरोध किया और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। 1919 में अपनी स्थापना के बाद से इसका लक्ष्य "ब्रिटिश मुक्त भारत" था। इसने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान "इदाराह हरबियाह" (अनुवाद - युद्ध परिषद) नामक एक संस्था का गठन किया।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा मानती है। वो वहां चलने वाले अलगाववादी आंदोलन का समर्थन नहीं करती। जमीयत ने गजवा-ए-हिन्द को गलत तरीके से पेश किए जाने पर भी आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि गजवा-ए-हिन्द को गलत अर्थों में पेश करके भारत में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों की एकजुटता को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नेताओं ने कई बार आरएसएस की तारीफ उसकी संगठन क्षमता और सामाजिक कार्यों के लिए की है। यह अलग बात है कि आरएसएस का मुखपत्र और उससे जुड़े तमाम कट्टर दक्षिणपंथी संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद को भारत विरोधी मानते हैं। जिन संगठनों का भारत की आजादी की लड़ाई में अपना कोई योगदान नहीं है, वो संगठन भी जमीयत को राष्ट्र विरोधी संगठन बताते हैं।
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