दो चुनाव आयुक्तों की गंभीर आपत्तियों के बाद टीएमसी नेता डेरेक ओब्रायन ने कहा, 'लोकतंत्र बचाने के लिए सीईसी पर महाभियोग चले'। मार्च में सीईसी ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ आया प्रस्ताव लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति ने खारिज कर दिया था। विपक्ष ये आरोप पहले से ही लगा रहा है।
दो चुनाव आयुक्तों की गंभीर आपत्तियों के बाद फिर से विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाने की मांग की है। टीएमसी नेता डेरेक ओब्रायन ने कहा, 'लोकतंत्र बचाने के लिए सीईसी पर महाभियोग चले'। दो आयुक्तों ने जिस तरह से आरोप लगाए हैं वैसे ही आरोप लगाते हुए विपक्षी दलों ने इस साल मार्च में ज्ञानेश कुमाार के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में पेश भी किया था। मार्च में 193 विपक्षी सांसदों ने सीईसी को हटाने का नोटिस दिया था, लेकिन अप्रैल में लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति ने बिना कार्यवाही आगे बढ़ाए खारिज कर दिया था। तब राज्यसभा सभापति के विस्तृत आदेश में कहा गया था कि विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप राजनीतिक बहस के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन वे सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए ज़रूरी प्रथम दृष्टया आधार नहीं बनाते।
लेकिन अब SIR को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट आने से अब विपक्ष के आरोप पुष्ट होते लग रहे हैं। ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ विपक्षी नेता काफ़ी पहले से गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। राहुल गांधी ने तो 'वोट चोरी' को लेकर बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की थी और वह लगातार वोट चोरी का मुद्दा उठाते रहे हैं। ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ विपक्ष ने ऐसे ही 7 बड़े आरोप लगाते हुए महाभियोग प्रस्ताव पेश किया था। अब दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के सामने आने के बाद क्या यह पुष्ट नहीं होता कि विपक्ष के न तो आरोप और न ही महाभियोग प्रस्ताव राजनीतिक था।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाया गया हटाने का प्रस्ताव और चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियां अब एक ही सवाल के दो अलग-अलग अध्याय की तरह सामने आ रहे हैं। मार्च 2026 में विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस दिया था। लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। लोकसभा में ऐसे नोटिस के लिए कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है। इस लिहाज से दोनों सदनों में आवश्यक शुरुआती संख्या पूरी थी।
विपक्ष ने इसमें सात गंभीर आरोप लगाए थे, जिनमें कथित पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, मिसबिहैवियर, चुनावी धोखाधड़ी की जांच में बाधा डालना और SIR के ज़रिए बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने जैसे आरोप शामिल थे। विपक्ष का कहना था कि सीईसी ने अपने संवैधानिक पद की निष्पक्षता के अनुरूप काम नहीं किया और कई मामलों में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले फैसले लिए। यह किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में लाया गया पहला ऐसा नोटिस था। लेकिन 6 अप्रैल 2026 को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने दोनों नोटिसों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उस समय जारी आधिकारिक बुलेटिन में विस्तृत कारण नहीं दिए गए थे।
बाद में सामने आए लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति के आदेशों में बताया गया कि आरोपों को संवैधानिक रूप से किसी सीईसी को हटाने की कार्यवाही शुरू करने के लिए ज़रूरी मानक पर खरा नहीं पाया गया।
फिर महाभियोग प्रस्ताव क्यों खारिज किया?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। 6 अप्रैल को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने अलग-अलग आदेशों में नोटिस स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। दोनों ने जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल किया। शुरुआत में जारी संसदीय बुलेटिन में विस्तृत कारण नहीं बताए गए थे। उसमें केवल कहा गया कि नोटिस पर उचित विचार और संबंधित सभी पहलुओं के सावधानीपूर्वक आकलन के बाद उसे स्वीकार नहीं किया गया।
लेकिन बाद में राज्यसभा सभापति का विस्तृत आदेश सामने आया। उसमें कहा गया कि विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप राजनीतिक बहस के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन वे सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए जरूरी प्रथम दृष्टया आधार नहीं बनाते।'आरोपों के लिए जरूरी सबूत नहीं'
सी. पी. राधाकृष्णन के आदेश के मुताबिक, आरोपों में ऐसा पर्याप्त प्रमाण नहीं था जिससे सीईसी के खिलाफ ‘मिसबिहैवियर’ का प्रथम दृष्टया मामला बनता हो। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ आरोप ऐसे विषयों से संबंधित थे जिन पर अदालतें पहले ही विचार कर चुकी थीं या जो उस समय न्यायिक समीक्षा के तहत थे। इसलिए उन्हें सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया का आधार नहीं बनाया जा सकता है।
महाभियोग जैसे हटाने के नोटिस के पीछे सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा SIR था। विपक्ष का आरोप था कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विपक्ष ने खास तौर पर सवाल उठाए थे। विपक्ष का कहना था कि इस प्रक्रिया से उन मतदाताओं पर ज्यादा असर पड़ सकता है जिनके पास पुराने दस्तावेज या रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। हालाँकि चुनाव आयोग ने SIR को मतदाता सूची को सत्यापित और अपडेट करने की प्रक्रिया बताया है और विपक्ष के राजनीतिक आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।
अब सामने आईं दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां
यही वह बिंदु है जहां नई रिपोर्ट मार्च के विवाद से जुड़ती है। इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार आपत्तियों का संबंध कई बड़े मुद्दों से था- नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाना और बहाल करना, SIR से जुड़े फैसले, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस और IT सिस्टम, मतदाता सूची के नियंत्रण का दिल्ली में केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में मतदाता नाम हटाने से जुड़ी अपीलें और गोवा में पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने से जुड़े मामले।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी चिंताओं को आगे बढ़ाते हुए कैबिनेट सचिव तक भी पत्र भेजे। यानी अब यह विवाद सिर्फ विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग के भीतर के दो सदस्यों ने भी कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।
चुनाव आयोग ने नई रिपोर्ट पर क्या कहा?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद की रिपोर्ट को खारिज किया है। चुनाव आयोग के अनुसार, एसआईआर सहित उसके सभी फ़ैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और अंतिम फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए। आयोग ने कहा कि अलग-अलग विचार या सुझाव निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं और उन्हें अंतिम फ़ैसले से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।दिलचस्प बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस की अपनी फॉलो-अप रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने 14 आपत्ति नोट्स के अस्तित्व, तारीख़ या उनकी सामग्री से इनकार नहीं किया, लेकिन उन्हें ‘सलाह’ बताया और कहा कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। रिपोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि अगर ये सुझाव थे तो कुछ मामलों में उठाई गई खास आपत्तियों का क्या हुआ।
विपक्ष का पुराना सवाल अब क्यों चर्चा में है?
विपक्ष लंबे समय से चुनाव आयोग की निष्पक्षता और SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाता रहा है। राहुल गांधी ने मतदाता सूची और कथित ‘वोट चोरी’ को लेकर कई बार चुनाव आयोग पर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने बिहार तथा पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में SIR की प्रक्रिया की आलोचना की।
मार्च में इन्हीं सवालों को संसद में सीईसी को हटाने के प्रस्ताव के रूप में पेश किया गया था। उस समय प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ। अब सितंबर में चुनाव आयोग के दो मौजूदा सदस्यों की लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने फिर से महाभियोग प्रस्ताव से ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की है।