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अगर कंट्रोल न हुआ तो कोरोना में भारत हो सकता नंबर वन देश!

अब भारत में कोरोना अपने उरुज पर है और आँकड़े ख़तरनाक होते जा रहे हैं तो एक नयी बहस कि क्या हिंदुस्तान पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा कोरोना वाला देश बन सकता है यानी कोरोना प्रभावित देशों में पहले पायदान पर पहुँच सकता है? अगर यह सवाल किसी ने तीन महीने पहले पूछा होता तो शायद कभी नहीं कह पाता, पर आज की स्थिति में यह संभव है। 10 जुलाई तक भारत के रूस को पछाड़कर तीसरे स्थान पर पहुँच जाने की संभावना है। फिर हमारी प्रतिस्पर्धा डोनल्ड ट्रंप और बोसोनारो से है।

इन तीनों देशों के यहाँ एक बात समान है कि तीनों ही राजनेता अपनी आक्रामक शैलियों और बड़बोलेपन के कारण जाने जाते हैं और कोविड मामलों में तीनों का रवैया शुरुआत में एक जैसा ही था। बस हमारे लिए अच्छा यह हुआ कि हमारा ज़्यादा नुक़सान होने से पहले दुनिया के तमाम देशों में यह बढ़ चुका था तो हम उतने विलंब से नहीं थे जितना अमेरिका और ब्राज़ील थे। डोनल्ड ट्रंप ने शुरुआत में तो यहाँ तक कहा कि अमेरिका में सामान्य फ्लू से सालाना 30-35 हज़ार सालाना मौतें होती हैं तो ये कोई आपदा नहीं है लेकिन समय के साथ उन्हें इस रोग की भयावहता का एहसास हुआ। अब स्थिति यह है कि सामान्य इंफ्लूएंज़ा फ्लू की अपेक्षा 50 गुना ज़्यादा लोग मर रहे हैं। 

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अमेरिकी संस्थान सीडीसी (Central for Decease Control and Prevention) के अनुसार फ्लू से प्रभावित लोगों की मृत्यु दर 0.01 प्रतिशत रहती थी जबकि कोरोना की मृत्यु दर 5 प्रतिशत के आसपास चल रही है। वर्तमान में अमेरिका में कोरोना प्रभावितों की संख्या क़रीब 24 लाख हो गयी है। न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास समेत सात राज्यों में यह संख्या एक लाख के पार है और पूरे अमेरिका में 1.22 लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है। 

ब्राज़ील इस महामारी में एक उदाहरण बनकर उभरा है कि कैसे किसी आपदा से नहीं निपटना है। ब्राज़ील में पहला केस 26 फ़रवरी यानी भारत के एक महीने बाद मिला लेकिन ब्राज़ील के राष्ट्रपति उसे सामान्य फ्लू बताकर उसका मज़ाक़ उड़ाते रहे। ख़ुद कई सार्वजनिक जगहों पर जाते रहे जिससे यह साबित कर सकें कि कोरोना में कोई दम नहीं है लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बिगड़ने लगी और इतनी बिगड़ी कि एक समय पर ब्राज़ीलियन सरकार ने रोज़ का डाटा ही प्रकाशित करना बंद कर दिया। लेकिन वहाँ सिविल सोसाइटी और विपक्ष के लोग सुप्रीम कोर्ट चले गये और कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए यह आदेश दिया कि रोज़ाना बुलेटिन प्रकाशित किया जाए और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
ब्राज़ील में वायरस सबसे ज़्यादा अप्रत्याशित रहा है। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि कभी एक दिन में 16 हज़ार केस आते हैं तो कभी 55 हज़ार आते हैं। अमेरिका के बाद ब्राज़ील एकलौता ऐसा देश है जिसने 10 लाख का आँकड़ा पार किया है।
कमाल बात यह है कि जो देश सबसे ज़्यादा प्रभावित है उस देश में कोई फुल टाइम हेल्थ मिनिस्टर तक नहीं है। उनके राष्ट्रपति खुद दवाएँ प्रेसक्राइब कर रहे थे जैसा कि डोनल्ड ट्रंप ने किया था। और दोनों देशों ने बिना जाँच के ही भर-भर कर मलेरिया की दवाएँ खरीदीं जो बाद में किसी काम नहीं आयीं। 

धुर दक्षिणपंथी ब्राज़ीलियन सरकार इस महामारी में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की जगह पार्टी और रैलियाँ आयोजित कर रही थी, जैसे हमारे यहाँ डिजिटल रैलियाँ चल रही हैं। 

अब हम कहाँ तक जा सकते हैं इस प्रतिस्पर्धा में, इस पर तो एम्स के निदेशक डॉ. गुलेरिया ने जुलाई में कोरोना संक्रमण के शिखर पर होने की बात कही थी। बाद में ICMR की एक रिपोर्ट आयी जिसमें कहा गया कि नवंबर तक यह शिखर पर होगा। जुलाई अंत तक हमारे यहाँ 22 लाख मरीज़ होंगे और अगर यह वाक़ई में नवंबर तक शिखर पर जाता है तो हिंदुस्तान में कम से कम 18 करोड़ मरीज़ होने की संभावना बनती है। लाॅकडाउन अपनी अधिकतम सीमा तक पहुँच चुका है वो काम नहीं आ रहा है और सरकार के पास कोई आउट ऑफ़ द बॉक्स रणनीति भी नहीं है। राजनीतिक कारणों के चलते केंद्र सरकार तमाम ढीले पडे़ राज्यों पर कोई दबाव नहीं डाल रही है। अभी तक प्रति दस लाख लोगों पर टेस्ट के आधार पर हम 138वें स्थान पर हैं तो जिन भी राज्यों ने औसत से ख़राब टेस्टिंग की है उनका खामियाजा सबको भुगतना होगा। तेलंगाना हफ्ते भर पहले तक मात्र 400-500 टेस्ट रोज़ाना कर रहा था जब कोर्ट ने फटकार लगाई तो टेस्टिंग कुछ आगे बढ़ी और अब ज़बरदस्त तरीक़े से मरीज़ सामने आ रहे हैं।

दुनिया भर के तमाम डाटा वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार यह बात कहते आ रहे हैं कि 3 प्रतिशत से ज़्यादा पॉजिटिविटी की दर ख़तरनाक है और स्थिति यह है कि दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, तेलंगाना जैसे राज्य 20 प्रतिशत से ऊपर हैं।
तमाम राज्य अलग-अलग तरीक़े की चालबाज़ियाँ कर रहे हैं जिससे केस कम आएँ, लेकिन जितनी जल्दी वो समझ लेंगे कि समस्या बीमारी है न कि उसकी गिनती, उतनी जल्दी वो आम लोगों को राहत दे पायेंगे। 

हमारे पास सीखने के लिए हर तरीक़े के उदाहरण मौजूद हैं कि कैसे इटली और इंग्लैंड शुरुआत में असफल होते हैं पर बाद में संक्रमण पर नियंत्रण पा लेते हैं। कैसे रूस इतने संक्रमित लोगों के होने के बाद भी मृत्यु दर को 1.5 प्रतिशत से भी नीचे रखता है और 60 प्रतिशत से ज़्यादा लोगों को रिकवर कर देता है। यूएई और बहरीन जैसे उदाहरण हैं जिन्होंने लगभग हर तीसरा आदमी टेस्ट कर लिया है। यह हम पर निर्भर करता है कि किससे सीखना चाहते हैं।

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फ़िलहाल जो डराने वाली बात है कि क्रिटिकल केसों के मामले में हम दूसरे नंबर पर हैं। यहाँ तक कि इस मामले में ब्राज़ील भी हमसे पीछे है। हमारे यहाँ हर साल डेंगू, चिकनगुनिया, चमकी बुखार, निमोनिया से ना जाने कितनी मौतें हो जाती हैं और कोरोना के संक्रमण की रफ्तार के आगे ये सब कहीं टिकते ही नहीं। ऐसे में जिस देश का स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी दुनिया में 112वें नंबर पर है वो भविष्य में डाटा मैनिपुलेट करके तो इससे निजात नहीं पा सकता है। हम जुलाई के आख़िरी तक ब्राज़ील और अक्टूबर तक अमेरिका को पछाड़ कर नंबर एक पर होंगे। बस सरकार को टेस्टिंग करनी होगी, बड़े स्तर पर टेस्टिंग करनी होगी। जल्दी रिजल्ट मिल सके और आसान टेस्टिंग हो, इसके उपाय तलाशने होंगे और जितने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को टेस्ट कर सकेंगे उतनी जल्दी इससे बाहर निकल पायेंगे वरना प्रशासन की ढिलाई से हर शहर में 10 लोग भी छूट गये तो वापस महीने दो महीने में वहीं पहुँचा देंगे।
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अभिषेक सिंह
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