महिला आरक्षण पर संविधान संशोधन बिल गिर गया। यानी लोकसभा ने इस बिल को सिरे से नकार दिया। यह मोदी सरकार के 12 साल के शासन में पहली बार हुआ है जब कोई संवैधानिक संशोधन बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। मोदी सरकार के लिए संसद में हाल के समय में यह बड़ा झटका माना जा रहा है, लेकिन कुछ जानकार यह भी कह रहे हैं कि सरकार विपक्ष को महिला आरक्षण विरोधी बताकर इसका राजनीतिक फायदा उठाएगी। विधेयक के गिरने के साथ ही बीजेपी की महिला सांसदों ने विरोध-प्रदर्शन किया और पार्टी ने सोमवार को देश भर में विरोध-प्रदर्शन की घोषणा की है। अमित शाह ने महिला बिल नहीं पास होने देने के लिए विपक्ष की कड़ी आलोचना की है।
मोदी सरकार द्वारा लाये गये इस विधेयक पर जब वोटिंग हुई तो 298 सांसदों ने इसके पक्ष में वोट किया, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ़ वोट किया। सत्ता पक्ष के गठबंधन एनडीए को इस बिल को पास कराने के लिए दो तिहाई वोट चाहिए थे लेकिन उसे वो संख्या नहीं मिल पाई। और ज़रूरी वोट नहीं मिलने का मतलब ही था कि लोकसभा में शुक्रवार शाम को महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले संवैधानिक (131वें संशोधन) बिल 2026 को गिरना था। यह बिल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता था। सरकार ने इसे जल्द लागू करने के लिए तीन बिल लाए थे, लेकिन मुख्य संवैधानिक संशोधन बिल के गिरने के बाद बाकी दो बिल भी आगे नहीं बढ़ाए जाएंगे। संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने यह जानकारी दी।
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दो दिन की लंबी बहस, पीएम का आग्रह

इस बिल पर दो दिन तक लंबी बहस हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को चेतावनी दी कि देश की महिलाएं उनके इरादों को देख रही हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को उनका हक देने का समय आ गया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर लिखा था, 'सरकार ने बिल से जुड़ी सभी आशंकाओं और गलतफहमियों को तथ्यों और तर्क से दूर कर दिया है। करीब चार दशक से महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा लंबित था। अब समय आ गया है कि देश की आधी आबादी को फैसले लेने में अपना हक मिले।' उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की थी कि वे संवेदनशील फैसला लें और बिल के पक्ष में वोट करें। मोदी ने कहा था, “नारी शक्ति की ओर से मैं सभी सदस्यों से अनुरोध करता हूं कि कुछ भी ऐसा न करें जो देश की महिलाओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाए। करोड़ों महिलाएं हमें देख रही हैं... हमारे इरादे और फैसले देख रही हैं।'

विपक्ष ने बिल का विरोध किया और कहा कि सरकार महिलाओं के आरक्षण के नाम पर सीमा पुनर्निर्धारण कराना चाहती है। उनका आरोप था कि इससे दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा और चुनावी नक्शा बदला जाएगा। विपक्ष ने कहा कि सीमा पुनर्निर्धारण को टालना चाहिए।

महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने बीजेपी पर महिलाओं की आड़ में देश के चुनावी नक्शे को बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 'आप देश की राजनीति में अपनी घटती ताकत से डर गए हैं और इसलिए चुनावी नक्शे को फिर से गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। आपने असम और जम्मू-कश्मीर में ऐसा किया और अब पूरे देश में ऐसा करने की कोशिश हो रही है। इसके लिए आपको संवैधानिक संशोधन की जरूरत पड़ेगी।'
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क्या था बिल में?

संवैधानिक (131वां संशोधन) बिल 2026, 2023 के महिलाओं के आरक्षण कानून को बदलने वाला था। 2023 का कानून लोकसभा और विधानसभाओं में 33% महिलाओं को आरक्षण देता है, लेकिन उसे जनगणना और डिलिमिटेशन के बाद लागू करने की शर्त थी। नया बिल इसे जल्द लागू करने और लोकसभा की सीटें बढ़ाकर लगभग 850 तक करने का प्रावधान करता था, ताकि आरक्षण बिना किसी सीट घटाए दिया जा सके। इसमें यह भी प्रावधान था कि नई जनगणना के बिना ही पुरानी जनगणना के आधार पर सीटों की नई सीमा तय कर दी जाए।

सरकार की रणनीति क्या?

सरकार ने अंतिम समय तक विपक्ष को मनाने की कोशिश की। समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य दलों से संपर्क किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। अमित शाह ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे महिलाओं के आरक्षण को रोकने के लिए बहाने बना रहे हैं। एनडीए के एक नेता ने बताया कि अब रणनीति यह है कि बिल हारने दो और खुद को महिलाओं के अधिकारों का शहीद बताओ।
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क्यों है यह मुद्दा अहम?

महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें मिलनी हैं। लेकिन बिना नई जनगणना के यह आरक्षण कब और कैसे लागू होगा, यह अभी अनिश्चित है। विपक्ष का तर्क है कि नई जनगणना के बाद ही सीटें बढ़ाई जाएं और आरक्षण लागू हो, ताकि सभी वर्गों का सही प्रतिनिधित्व हो सके। अभी यह साफ़ नहीं है कि सरकार इस बिल को दोबारा कब और कैसे सदन में लाएगी। तीन दिन की विशेष बैठक में यह पहला बड़ा विधेयक था जो पास नहीं हो सका।

क्या होगा आगे?

सरकार ने कहा कि अब बिल गिरने के बाद वे जनता के बीच जाएंगे और विपक्ष को जवाबदेह ठहराएंगे। यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है। महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। 2023 में बिल पास हुआ था, लेकिन लागू नहीं हो सका।