दिल्ली हाईकोर्ट दो डिजिटल अधिकार समूहों IFF और SFLC द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उनके खातों को ब्लॉक करने के कथित आदेशों को चुनौती दी गई थी। X ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि ये नोटिस बहुरूपिये ने भेजा था।
एक्स ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा है कि डिजिटल अधिकार की पैरवी करने वाले संगठनों- इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन यानी IFF और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर यानी SFLC के खातों को ब्लॉक करने के लिए दिल्ली पुलिस के नाम से भेजे गए नोटिस फर्जी थे। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार एक्स ने बताया कि उसकी आंतरिक जांच में नोटिस भेजने वाले के बहुरूपिया होने का पता चला है। प्लेटफॉर्म ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई है। इसके बाद हाईकोर्ट ने दोनों संगठनों की याचिकाओं का निपटारा कर दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट दोनों डिजिटल अधिकार संगठनों- IFF और SFLC की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। इन याचिकाओं में एक्स को उनके खाते और पोस्ट ब्लॉक करने के निर्देश देने वाले कथित नोटिसों को चुनौती दी गई थी। एक्स की ओर से अदालत में पेश वकील ने कहा कि प्लेटफॉर्म ने मामले की आंतरिक जाँच की है। जाँच में पता चला कि नोटिस भेजने वाला व्यक्ति दिल्ली पुलिस का अधिकारी नहीं था, बल्कि उसने पुलिस की पहचान का गलत इस्तेमाल किया था। एक्स ने अदालत को यह भी बताया कि दोनों संगठनों के खाते बंद नहीं किए जाएंगे। प्लेटफॉर्म ने इस मामले में दिल्ली पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने की जानकारी भी दी।
हमारी जांच में बहुरूपिये का पता चला: X
सुनवाई के दौरान एक्स के वकील ने अदालत को बताया कि प्लेटफॉर्म ने कथित नोटिसों की जाँच की थी। वकील के अनुसार, जांच में यह सामने आया कि नोटिस भेजने वाला व्यक्ति बहुरूपिया था। एक्स के वकील ने कहा, 'हमने आंतरिक जांच की है और पता चला है कि यह एक बहुरूपिया था।' उन्होंने अदालत को बताया कि एक्स ने इस मामले में दिल्ली पुलिस के पास शिकायत भी दर्ज कराई है।एक्स की ओर से यह साफ़ किए जाने के बाद कि IFF और SFLC के खातों को ब्लॉक नहीं किया जाएगा, दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों संगठनों की याचिकाओं का निपटारा कर दिया।
पुलिस से जवाब नहीं मिलने पर हाईकोर्ट पहुँचा था केस
IFF और SFLC ने अदालत का रुख तब किया था जब उन्हें एक्स की ओर से ऐसी सूचना मिली थी कि दिल्ली पुलिस ने उनके सोशल मीडिया पोस्ट और खातों को हटाने के लिए कथित तौर पर कानूनी अनुरोध भेजा है। दोनों संगठनों ने पुलिस से यह पुष्टि करने की कोशिश की थी कि क्या वास्तव में दिल्ली पुलिस ने एक्स को ऐसे नोटिस भेजे हैं। लेकिन पुलिस की ओर से जवाब नहीं मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की।IFF और SFLC जैसे संगठनों का काम इंटरनेट की स्वतंत्रता, डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े मुद्दों पर निगरानी रखना और उनका समर्थन करना है।
RSS के नाम से भी भेजे गए थे नोटिस
इस मामले की एक और अहम कड़ी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के नाम से भेजे गए कथित कानूनी नोटिस हैं। स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार 30 अक्टूबर को IFF और SFLC ने सार्वजनिक रूप से बताया था कि उन्हें आरएसएस के नाम से नोटिस मिले हैं। इन नोटिसों में कथित तौर पर दोनों संगठनों से सरकार के कंटेंट प्रतिबंध आदेशों का दस्तावेजीकरण करने और उनका विरोध करने से रोकने की मांग की गई थी। आरएसएस ने इन नोटिसों पर आधिकारिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की थी। हालाँकि, आरएसएस से जुड़े रतन शारदा और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सलाहकार कंचन गुप्ता ने सोशल मीडिया पर इन नोटिसों के संगठन की ओर से भेजे जाने से इनकार किया था।इसके बाद दोनों संगठनों को एक्स की ओर से एक और सूचना मिली। इसमें कहा गया था कि दिल्ली पुलिस ने एक 'अवैध सामग्री रिपोर्ट' भेजी है, जिसमें RSS के खिलाफ कथित मानहानिकारक पोस्ट और खातों को हटाने की मांग की गई है। इस सूचना के आधार पर दोनों संगठनों को लगा कि दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। लेकिन अब एक्स ने हाईकोर्ट में बताया है कि कथित पुलिस नोटिस एक बहुरूपिये ने भेजे थे।
क्या यह एक बड़े फर्जीवाड़े का हिस्सा था?
इस घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। RSS के नाम से कथित क़ानूनी नोटिस भेजे जाने, दिल्ली पुलिस के नाम पर एक्स को कंटेंट हटाने के निर्देश दिए जाने और फिर एक्स की जाँच में नोटिसों के फर्जी पाए जाने से मामला एक बड़े फर्जीवाड़े की ओर इशारा करता है।मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ यह कथित फर्जीवाड़ा केवल डिजिटल अधिकार संगठनों और RSS तक सीमित नहीं दिख रहा था, बल्कि दिल्ली पुलिस का नाम भी इसमें इस्तेमाल किया गया।
ऑनलाइन सेंसरशिप का सवाल
IFF और SFLC के खातों को ब्लॉक करने के कथित नोटिसों ने ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी कंटेंट प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले संगठनों की भूमिका को लेकर भी चिंता पैदा की थी। यदि किसी संगठन को सरकारी आदेशों की निगरानी करने या उनका विरोध करने से रोकने के लिए कानूनी नोटिस भेजे जाते हैं तो इससे डिजिटल अधिकारों पर असर पड़ सकता है। लेकिन इस मामले में एक्स के खुलासे के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि सरकारी एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामग्री हटाने के निर्देश कैसे भेजे जा सकते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक्स के बयान के बाद याचिकाओं का निपटारा कर दिया है। फिलहाल अदालत ने नोटिसों की सत्यता पर कोई अलग विस्तृत फैसला नहीं दिया है। मामले में आगे की जांच और दिल्ली पुलिस की शिकायत के परिणाम अहम होंगे।