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गाड़ियों की बिक्री गिरी, अर्थव्यवस्था में मंदी का एक और संकेत

देश की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है। अर्थव्यवस्था के तमाम इंडीकेटर यही संकेत काफ़ी समय से देते रहे हैं, हालाँकि सरकार इसे लेकर तरह तरह के बहाने बनाती रही है। ताज़ा रिपोर्टों के मुताबिक़, मोटरगाड़ी उद्योग की हालत इतनी बुरी है कि पिछले दो साल में गाड़ी बेचने वाले सेक्टर को 2,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है। इस दौरान 300 से ज़्यादा डीलरों को अपना कामकाज बंद कर देना पड़ा है और कम से कम 3,000 लोगों की नौकरियाँ चली गई हैं।
इकोनॉमिक टाइम्स की ख़बर के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान निसान मोटर ने 38 तो हुंदे ने 23 डीलर बंद कर दिए। होंडा, मारुति, महिंद्रा एंड महिंद्रा और टाटा मोटर्स के डीलर भी कामकाज समेटने पर मजबूर हुए। मोटरगाड़ी बिक्री में गिरावट से यह स्पष्ट होता है कि पूरे कार उद्योग पर संकट है। गाड़ी कम बिकने का मतलब है कि कम गाड़ियाँ बनाई गई हैं, यानी कम उत्पादन हुआ है। कम उत्पादन का मतलब है कि ऑटो सेक्टर में मंदी है।
मोटरगाड़ी बिक्री में कमी से यह संकेत मिलता है कि लोगों के पास गाड़ी खरीदने लायक पैसे नहीं है, यानी उनकी क्रय शक्ति घटी है। क्रय शक्ति में गिरावट से यह साफ़ होता है अर्थव्यवस्था में मंदी है।
यह पहला मौका नहीं है न ही यह एक मात्र इंडीकेटर है, जो अर्थव्यवस्था के बार में संकेत देता है। इसके पहले दोपहिया गाड़ियों की बिक्री कम हुई थी। उसके पहले उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री कम हुई, रोज़मर्रा ख़पत की चीजों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई।

आय प्रभावित

न्यूज़ वेबसाइट ‘लाइव मिंट’ से बातचीत में सोसायटी फोर इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफ़ैक्च्रर्स यानी सियाम के निदेशक विष्णु माथुर ने कहा है, ‘आख़िरी के छह महीने में तेल की क़ीमतें बढ़ी हैं। इंश्योरेंस कराना महँगा हुआ है। टेलीकॉम और एविएशन सहित कई क्षेत्रों में नौकरियाँ जाने का भी असर रहा है। चूँकि लोगों की आय प्रभावित हुई है, लोग फ़िलहाल ऐसी चीजों पर पैसे ख़र्च नहीं करना चाहते हैं।’
ठीक इसी समय कारखाना उत्पादन सूचकांक गिरा। सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि की दर उम्मीद से कम और बीते 45 साल में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी की बात तो पुरानी हो चुकी है।
इसके पहले यह ख़बर आई थी कि तेल-साबुन और खाने-पीने जैसे उपभोक्ता सामान की माँग घट गयी है। नीलसन की रिपोर्ट में कहा गया है कि तत्काल खपत उपभोक्ता माल यानी एफ़एमसीजी उद्योग की वृद्धि दर धीमी होकर इस साल 11-12 प्रतिशत रह जाने की संभावना है। यह वर्ष 2018 के मुकाबले क़रीब दो प्रतिशत कम होगा। इसे अर्थव्यवस्था के धीमी होने या विकास की रफ़्तार के कम होने का संकेत माना जाता है। इसका साफ़ अर्थ यह हुआ कि सामान ख़रीदने की लोगों की क्षमता कम हुई है। इससे यह भी पता चलता है कि लोगों की आय में गिरावट आयी है। 
ऐसी कई रिपोर्टें आयी हैं जिसमें पिछले दो साल में लाखों लोगों की नौकरी छिन जाने की बात कही गयी है। इससे पहले खुदरा महँगाई दर बढ़कर 4 महीने के उच्च स्तर पर पहुँच गई है। देश की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर भी एक साल में 7.5 फ़ीसदी से घटकर 1.7 फ़ीसदी रह गई है।

औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर भी घटी

मार्च में ही एक और अर्थव्यवस्था की ख़राब तसवीर आयी थी। देश की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर जनवरी 2019 में पिछले वर्ष की समान अवधि के 7.5 फ़ीसदी से घटकर 1.7 फ़ीसदी हो गई है। यह बड़ी गिरावट है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी सीएसओ के आधिकारिक आँकड़े में कहा गया है कि माह-दर-माह आधार पर भी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) की वृद्धि दर में गिरावट आयी है। माना जा रहा है कि विनिर्माण क्षेत्र, विशेष रूप से पूँजीगत सामान और उपभोक्ता सामान क्षेत्र के सुस्त प्रदर्शन की वजह से आईआईपी की वृद्धि दर कम हुई है। रेटिंग एजेंसी केयर ने भी कुछ ऐसे ही कारण गिनाए हैं। इसका कहना है कि विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट का अंदाज़ा पहले से ही था। इसके अलावा पहले से ही बड़ा स्टॉक पड़ा हुआ था और माँग नहीं बढ़ने से उत्पादन में कमी आयी।
लेकिन सरकार अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम आँकड़ों को छिपा लेती है और तमाम बातों को खारिज कर देती है। सरकार अपनी नाकामी तो छुपा रही है, पर विपक्ष भी इस पर आक्रामक नहीं हो रहा है। सबका साथ, सबका विकास का दावा करने वाली सरकार की पोल खोलने के लिए विपक्ष ने अर्थव्यवस्था को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। यह  भी चिंता की बात है कि जिस कांग्रेस पार्टी के पास मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री राजनेता हैं, वह भी इस मुद्दे पर चुप है।
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