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अर्थव्यवस्था फटेहाल, सरकार ने रिज़र्व बैक से माँगे 30 हज़ार करोड़ रुपये

केंद्र सरकार ने रिज़र्व बैंक से अंतरिम लाभांश के रूप में 30 हज़ार करोड़ रुपए माँगे हैं। इसके पहले ही इस साल केंद्रीय बैंक ने सरकार को 1,76,051 करोड़ रुपए दिए हैं, जिसमें लाभांश के 52,637 करोड़ रुपए भी शामिल हैं। बाकी पैसे बैंक ने सरप्लस रिज़र्व से दिए हैं।
रिज़र्व बैंक ने इसके पहले पिछले साल यानी वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान भी सरकार को 10 हज़ाार करोड़ रुपए का लाभांश दिया था। इसके अलावा केंद्रीय बैंक ने मार्च 2019 में 28 हज़ार करोड़ रुपए का लाभांश दिया था। 
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साल 2019-2020 के बजट के लिए सरकार के पास कुल 7.10 लाख करोड़ रुपए का उधार है, जो साल 2018-19 के बजट में उधार 5.35 लाख करोड़ रुपये के उधार से बहुत ज़्यादा है। 
रिज़र्व बैंक से साल भर में ही 2 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा लेना यह बताता है कि केंद्र सरकार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार अपनी इस आर्थिक बदहाल की वजह से ही रिजर्व बैंक से पैसे से ले रही है।

पैसे का जुगाड़

पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार कहीं से भी पैसे जुगाड़ करना चाहती है। जीएसटी और प्रत्यक्ष कर के रूप में इसे उम्मीद से कम पैसे मिले हैं। सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में 5 प्रतिशत की कटौती कर दी। इस वजह से सरकार को हर साल 1.45 लाख करोड़ रुपए कम मिलेंगे।
सरकार ने इसके अलावा विदेशी और घरेलू पोर्टफ़ोलियो निवेशकों के शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स में भी कटौती का एलान किया है, जिस वजह से सरकार को हर साल 1,400 करोड़ रुपए कम टैक्स मिलेंगे। इससे साफ़ है कि सरकार को हर हाल में कम पैसे मिल रहे हैं। 

कर उगाही लक्ष्य से कम 

सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष में प्रत्यक्ष कर उगाही राजस्व में 17.30 प्रतिशत की बढोतरी और कुल 13.35 लाख करोड़ रुपए की उगाही का लक्ष्य रखा था।  पर इसके पहले छह महीने यानी अप्रैल से 15 सितंबर तक 4.40 लाख करोड़ रुपये की कर उगाही हो सकी। 

चालू साल में पहले सरकार ने कर उगाही का लक्ष्य 13.80 लाख करोड़ रुपये रखा था, पर बाद में उसे घटा कर 13.35 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। यानी सरकार ने खुद यह मान लिया कि 45,000 करोड़ रुपए कम उगाही ही हो सकेगी। 

6 साल की न्यूनतम जीडीपी 

भारत सरकार के आँकड़ों के मुताबिक़, सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 7 साल के न्यूनतम स्तर 5 प्रतिशत पर पहुँच चुका है।अप्रैल-जून 2019 की यह जीडीपी वृद्धि दर पिछले साल इसी तिमाही की वृद्धि दर 8 फ़ीसदी की अपेक्षा काफ़ी कम है। पाँच फ़ीसदी की यह वृद्धि दर 25 क्वार्टर में सबसे कम है। सबसे बड़ी गिरावट विनिर्माण क्षेत्र में आई है। इसमें सिर्फ़ 0.6 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है जो पिछले साल इसी अवधि की वृद्धि दर 12.1 फ़ीसदी से काफ़ी कम है। विश्लेषकों का भी कहना है कि गिरावट के लिए मुख्य तौर पर उपभोक्ताओं की कमज़ोर माँग और कमज़ोर निजी निवेश ज़िम्मेदार है। 

कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों में ख़राब प्रदर्शन के कारण जनवरी-मार्च 2018-19 में विकास दर पाँच साल के निचले स्तर 5.8 प्रतिशत तक फिसल गई थी। यह 20 तिमाहियों में सबसे कम वृद्धि दर थी। तब क़रीब दो साल बाद भारत को चीन ने पीछे कर दिया था। यूपीए के दूसरे कार्यकाल में जनवरी-मार्च 2013-14 की अंतिम तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत थी। वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रही, जो पिछले वित्त वर्ष में 7.2 प्रतिशत से कम थी। यह 2014-15 के बाद से जीडीपी की वृद्धि सबसे धीमी थी क्योंकि इससे पहले 2013-14 में यह दर 6.4 प्रतिशत रही थी।

और टूटेगा रूपया!

रुपये में लगातार गिरावट आ रही है। विदेशी निवेशकों के इक्विटी बाज़ार से पैसे निकालने की वजह से भी रूपया टूट रहा है क्योंकि जो भी पैसा निकाला जा रहा है वह डॉलर के रूप में ही बाहर जा रहा है। 

समझा जाता है कि भारतीय मुद्रा छह साल के न्यूनतम स्तर पर जल्द ही पहुँच सकता है। लेकिन यह डर भी बना हुआ है कि स्थिति और बुरी हो सकती है।

जेपी मॉर्गन चेज़ का अनुमान है कि रुपया बीते साल के अक्टूबर के स्तर से भी नीचे चला जाएगा। वहीं जापानी इनवेस्टमेंट बैंक नोमुरा को आशंका है कि रुपया इस साल के अंत तक 72.50 के स्तर तक पहुँच जाएगा। 

इसका मतलब यह है कि एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 72.50 रुपये हो जाएगी। ब्लूमबर्ग ने एक सर्वे में पाया था कि रुपया औसतन 72 प्रति डॉलर तक रहेगा। 

अब सवाल यह उठता है कि क्या रिज़र्व बैंक से पैसे लेकर सरकार अपनी स्थिति सुधारेगी? लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि केंद्रीय बैंक से पैसे लेकर क्या वाकई अर्थव्यवस्था सुधरेगी? 

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