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मोदी से निराश विदेशी निवेशक शेयर बाज़ार से खींच रहे हैं हाथ

दुनिया के निवेशकों का नरेंद्र मोदी पर से भरोसा उठता जा रहा है। यह इससे समझा जा सकता है कि जून से अगस्त के तिमाही में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से लगभग 4.50 अरब डॉलर निकाल लिए हैं। ये वही लोग हैं, जिन्होंने भारतीय शेयर बाज़ार में 45 अरब डॉलर का निवेश किया था। 
नरेंद्र मोदी जब पहली बार 2014 में प्रधानमंत्री बने, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का मानना था कि वह आर्थिक सुधार कर देश की अर्थव्यवस्था को और तेजी देने में कामयाब होंगे और उसे अधिक से अधिक व्यवसाय-हितैषी बनाएँगे। इसका नतीजा यह हुआ कि  उनके आने के बाद से अब तक छह साल में विदेशी संस्थागत निवेशक (एफ़आईआई) ने भारतीय शेयर बाज़ार में लगभग 45 अरब डॉलर का निवेश किया था। 
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पर मोदी सरकार ने कोई आर्थिक सुधार नहीं किया। इसके अलावा देश की अर्थव्यवस्था बुरे दौर में है और मंदी छाई हुई है। इस वजह से विदेशी निवेशकों ने हाथ खींचना शुरू कर दिया है। क्या इसके लिए विदेशी निवेशक ज़िम्मेदार हैं? शायद नहीं, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था बदहाली में है।
भारत की अर्थव्यवस्था लगातार 5 तिमाही से फिसलती आ रही है और 2013 के उस स्तर पर पहुँच चुकी है, जब यह सबसे कमज़ोर समझी जाती थी। मोदी इसके एक साल बाद सत्ता में आए थे।

 क्या है मामला?

सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 5  प्रतिशत तक पहुँच गई। तमाम इन्डीकेटर देश की आर्थिक बदहाली की  पुष्टि करते हैं। कार की बिक्री में रिकार्ड गिरावट हो रही है, विदेशी  निवेश बुरी तरह गिरा है, बेरोज़गारी की दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर है, दुनिया के सबसे बुरे खराब कर्ज (बैड लोन) की वजह से बैंकिंग उद्योग की स्थिति बेहद बुरी है। सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर ड्रोन हमलों के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमत बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति और बदतर हो सकती है। 

क्या मोदी ज़िम्मेदार हैं?

पर्यवेक्षकों का कहना है कि मोदी सरकार ने आर्थिक सुधार नहीं किया है, जिसकी उम्मीद लोगों को थी। सरकार ने न तो श्रम सुधार किए हैं और न ही इसने अब तक सरकारी कंपनियों में विनिवेश का काम शुरू किया है। हालाँकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों जिन सुधारों की घोषणा की, उनमें कुछ बदलाव श्रम क़ानूनों से भी जुड़े हुए थे। इसी तरह सरकार जल्द ही कुछ सार्वजनिक कंपनियों की बिक्री करने जा रही है। पर निवेशकों का मानना है कि इसमें काफ़ी देर हो चुकी है। 
पर्यवेक्षकों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था स्ट्रक्चरल मंदी में दाखिल हो चुकी है, यानी उस तरह की मंदी जिससे सभी उद्योग बुनियादी रूप से प्रभावित होते हैं। ऐसी मंदी से बाहर निकलना बेहद मुश्किल होगा और इसमें बहुत समय लगेगा।
भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमणियन स्वामी ने ब्लूमबर्गक्विंट को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, 'यदि अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो मोदी के पास सिर्फ़ 6 महीने का वक़्त है, उसके बाद लोग उनसे सवाल पूछना शुरू कर देंगे।' पर्यवेक्षकों का कहना है कि अभी भी कई चीजें भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में हैं, मसलन, यहाँ बहुत बड़ा बाज़ार है, यहाँ कुशल श्रमिकों की भरमार है, श्रम सस्ता भी है, राजनीतिक अस्थिरता है, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था है और सरकार आर्थिक सुधार की बातें कर रही है।
विदेशी निवेशकों ने हाथ खींचने के बावजूद इस साल भारतीय शेयर बाज़ार में जो निवेश किया, वह अभी चीन में हुए विदेशी शेयर निवेश से ज़्यादा है।  

नोटबंदी, जीएसटी का असर?

आलोचकों का कहना है कि सरकार अर्थव्यवस्था ठीक से नहीं चला पा रही है। साल 2016 में किया गया नोटबंदी का फ़ैसला अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही बुरा साबित हुआ, जिससे 86 प्रतिशत करेंसी नोट बेकार कर दिए गए। इसके बाद 2017 का जीएसटी लागू करने का फ़ैसला बहुत ही उलझन वाला और बग़ैर किसी तैयारी के जल्दबाजी में किया गया फ़ैसला था। 
पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाने वाली सरकार के लिए आर्थिक सुधार मजबूती से लागू करना मुश्किल होगा। कश्मीर पर लिया गया फ़ैसला उसे आने वाले समय में उलझाए रख सकता है और इस वजह से उसका ध्यान अर्थव्यवस्था की ओर नहीं जाएगा। सत्तारूढ़ दल ने जो नैरेटिव खड़ा कर दिया है, उसमें आम लोगों का ध्यान भी आर्थिक बदहाल की ओर नहीं जा रहा है, सरकार की चुप्पी और कुछ नहीं करने की नीति के पीछे यह भी एक कारण है।
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