चीन की कंपनियाँ अब भारत आएँगी, पैसा लगाएँगी, मुनाफा कमाकर चली जाएँगी और इसके लिए भारत सरकार से मंजूरी भी नहीं लेनी पड़ेगी? यानी उनके लिए सरकार ने रेड कार्पेट बिछा दिया है! कम से कम भारत ने अपने पड़ोसी देशों से एफ़डीआई यानी विदेशी निवेश पर जो ढील दी है, उसका संदेश तो यही जाता है। भारत की जमीन से लगती सीमा वाले इन देशों से जुड़े निवेशकों को अब 10% तक गैर-नियंत्रण वाली हिस्सेदारी के साथ निवेश करने की अनुमति ऑटोमैटिक रूट से मिलेगी। यानी इनको सरकार से पहले मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ेगी। विशेषज्ञ इस एफ़डीआई निवेश को लेकर चेता रहे हैं। उन्होंने क्या चेतावनी दी है, यह जानने से पहले फ़ैसले के बारे में जान लें।
सीमा से लगने वाले पड़ोसी देशों की एफ़डीआई के लिए यह फैसला मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने लिया है। जिन देशों के साथ भारत की जमीन पर सीमा लगती है, उनमें चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान शामिल हैं। इनमें से सबसे ज्यादा निवेश चीन से आता है।

पुराने नियम क्या थे?

2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान गलवान घाटी में भारत-चीन के बीच हिंसक झड़प हुई थी। उसके बाद अप्रैल 2020 में प्रेस नोट जारी किया गया था। इस नियम के तहत इन पड़ोसी देशों से आने वाले किसी भी निवेश के लिए सरकार से पहले मंजूरी ज़रूरी थी। इसका मक़सद था कि महामारी के समय कमजोर भारतीय कंपनियों को सस्ते में खरीदने या कब्जा करने से रोका जाए।

नए नियम क्या कहते हैं?

अब अगर किसी निवेशक के पास इन पड़ोसी देशों की बेनिफिशियल ओनरशिप यानी असली मालिकाना हक 10% तक है और वह नियंत्रण वाली नहीं है तो निवेश ऑटोमैटिक रूट से हो सकता है। हालाँकि सेक्टर की सीमा और अन्य शर्तें लागू रहेंगी। 'बेनिफिशियल ओनरशिप' की परिभाषा मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के नियमों से ली गई है। हालाँकि, निवेश लेने वाली भारतीय कंपनी को डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड यानी डीपीआईआईटी को डिटेल्स रिपोर्ट करनी होंगी।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलीसिलिकॉन और इंगोट-वेफर मैन्युफैक्चरिंग जैसे कुछ खास सेक्टर में पड़ोसी देशों से निवेश की मंजूरी अब 60 दिनों में मिलेगी। इससे कंपनियां जल्दी जॉइंट वेंचर बना सकेंगी, नई टेक्नोलॉजी ला सकेंगी और ग्लोबल सप्लाई चेन में शामिल हो सकेंगी। लेकिन इन सेक्टरों में भी भारतीय कंपनी का बहुमत भारतीय नागरिकों या उनके नियंत्रण वाली कंपनियों के पास ही रहेगा।

क्यों बदले नियम?

सरकार का कहना है कि पुराने सख्त नियमों से ग्लोबल फंड्स से निवेश रुक जाता था, क्योंकि इनमें कभी-कभी पड़ोसी देशों के निवेशक छोटी-छोटी हिस्सेदारी रखते हैं। नियम आसान करने से विदेशी निवेश बढ़ेगा, टेक्नोलॉजी आएगी, मैन्युफैक्चरिंग मजबूत होगी। यह 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य से जुड़ा है।

आलोचना क्यों?

कुछ विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। स्ट्रैटेजिक एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर कहा कि यह 2020 के बाद लगाए गए प्रतिबंधों को पीछे लेने जैसा है। यह कदम मुख्य रूप से चीन के लिए है और भारत-चीन आर्थिक संबंधों को नॉर्मल करने की दिशा में है। हाल के महीनों में वीजा आसान करना, 5 साल बाद डायरेक्ट फ्लाइट्स शुरू करना और कुछ बॉर्डर ट्रेड रूट खोलना भी इसी का हिस्सा है।

चेलानी ने चेतावनी दी कि पावर ग्रिड, इलेक्ट्रिक व्हीकल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे संवेदनशील सेक्टर में ज्यादा चीनी निवेश से बीजिंग को भारत पर 'किल स्विच' या आर्थिक दबाव बनाने का मौका मिल सकता है। इससे सप्लाई चेन और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता बढ़ेगी।

उन्होंने कहा, "अजीब बात है। 2020 के दखल के बाद भारत ने चीन से 'अलग होना' चाहा। इसके बजाय अब वह खुद को चीनी सप्लाई चेन पर और भी ज़्यादा निर्भर हुआ है, जिससे भारत के साथ चीन का बाइलेटरल ट्रेड सरप्लस बढ़ता जा रहा है- जो पहले ही भारत के पूरे सालाना डिफेंस बजट से ज़्यादा हो चुका है।"

चीन से व्यापार संबंध

2020 के बाद निवेश पर रोक के बावजूद भारत-चीन व्यापार तेजी से बढ़ा है। चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 127.7 अरब डॉलर रहा। लेकिन भारत का घाटा बहुत बड़ा है– आयात 113.45 अरब डॉलर, निर्यात सिर्फ 14.25 अरब डॉलर। यानी घाटा 99.2 अरब डॉलर का।

चीन का एफ़डीआई में हिस्सा

चीन से भारत में सीधा निवेश कम है। अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक चीन 23वें नंबर पर है, कुल एफ़डीआई का सिर्फ 0.32% या करीब 2.51 अरब डॉलर।
बहरहाल, यह फ़ैसला भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का प्रयास है, लेकिन सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं को लेकर बहस जारी है। सरकार का फोकस मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी पर है।