प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री यूपीए सरकार में जिस कमजोर आर्थिक हालत का ताना 13 साल से मारते आ रहे हैं, उसमें मोदी सरकार में भी सुधार तो हुआ नहीं, उल्टे हालत 'नाजुक' हो गई है। यानी हालात बदतर हो गए हैं। यह बात पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं। उन्होंने मॉर्गन स्टेनले की रिपोर्ट के हवाले से यह लिखा है। यह रिपोर्ट मॉर्गन स्टेनली की 'फ्रेजाइल फाइव' और भारत की ख़राब अर्थव्यवस्था पर है। मॉर्गन स्टेनली ने 2013 में भारत को, ब्राज़ील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ़्रीका और तुर्की के साथ, 'फ्रेजाइल फाइव' यानी 'कमज़ोर पाँच' देशों के तौर पर बताया था। यह वह समय था जब अमेरिका के फेडरल रिज़र्व की 'टेपर टैंट्रम' नीति के बाद भारतीय रुपए में भारी गिरावट आई थी। ये रुपये की गिरावट मौजूदा समय में तो रिकॉर्ड 97 रुपये प्रति डॉलर के क़रीब तक पहुँच गई है।

'फ्रेजाइल फाइव' से भी ख़राब हालत?

पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग लिखते हैं कि मोदी सरकार की नीतियों का कम से कम 7 साल समर्थक रहे मॉर्गन स्टेनली ने पिछले साल से 'फ्रेजाइल फाइव' की सूची को में ऊपर नहीं किया है। उन्होंने डेक्कन हेराल्ड अख़बार में लिखे एक लेख में कहा है कि भारत ‘फ्रेजाइल फाइव’ यानी कमजोर पांच देशों की लिस्ट से अब ‘वल्नरेबल वन’ यानी 'असुरक्षित' या 'नाजुक हालत में पहुँच गया है। गर्ग ने लिखा है, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री 13 साल से ‘फ्रेजाइल फाइव’ का लेबल यूपीए सरकार पर लगाकर उसकी आलोचना करते रहे हैं। लेकिन अब खुद मोदी सरकार की स्थिति क्या है?"
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सुरजीत भल्ला का आकलन

सुभाष चंद्र गर्ग ने लिखा कि पहले भारत सहित पांच देशों को ‘फ्रेजाइल फाइव’ कहा गया था। मोदी सरकार के समर्थक माने जाने वाले अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने अब इसे घटाकर ‘फ्रेजाइल टू’ यानी कमजोर दो देशों की श्रेणी में रख दिया है जिसमें भारत और शायद तुर्की शामिल हैं।

उन्होंने लिखा है कि मोदी सरकार की नीतियों का कम से कम 7 साल समर्थक रहे मॉर्गन स्टेनली ने पिछले साल से 'फ्रैजाइल फाइव' की सूची को अपडेट नहीं किया है और इसके बजाय अब उसे पूरा एशिया ही 'असुरक्षित' नज़र आ रहा है। तो सवाल है कि जब मॉर्गन स्टेनली को पूरा एशिया 'असुरक्षित' या नाजुक हालत में लगता है तो सुभाष चंद्र गर्ग भारत को 'असुरक्षित' या नाजुक हालत में क्यों बता रहे हैं?

इस सवाल का जवाब भी गर्ग ने अपने लेख में दिया है। वह लिखते हैं, "तो एशिया कमज़ोर है या सिर्फ़ भारत? भारत इतना असुरक्षित क्यों है? क्या भारत को ‘नाजुक’ होने का वह संदिग्ध तमगा हासिल होगा?" 

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इसके लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की ख़राब हालत, जीडीपी, महंगाई, गिरते रुपये और घटते विदेशी निवेश की स्थिति को सामने रखा है।

आर्थिक हालत बिगड़ रही है

गर्ग ने कहा, “एक भी आर्थिक बुनियादी संकेतक यानी मैक्रो इकोनॉमिक इंडिकेटर स्वस्थ नहीं दिख रहा है।” उन्होंने कई बड़े आँकड़ों और संकेतों का हवाला देते हुए कहा कि भारत के हर आर्थिक संकेतक खराब स्थिति को दिखाते हैं-
  • जीडीपी वृद्धि: सरकारी आंकड़ों में 7.6% दिखाई जा रही है, लेकिन यह भ्रामक है। बढ़ती महंगाई और रुपये में गिरावट के कारण 2026-27 में यह वृद्धि 5-5.5 फीसदी रहने का अनुमान है। आईएमएफ के वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के अनुसार डॉलर के संदर्भ में वास्तविक वृद्धि सिर्फ 4.2% है और अगले साल यह और गिरकर 2-4% तक रह सकती है।
  • महंगाई: पेट्रोल-डीजल के दाम पहले ही 7.5 रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं। थोक महंगाई 8% के ऊपर पहुंच गई है। और ज़्यादा आशंका है कि इसमें बढ़ोतरी होने वाली ही है।
  • रुपया: एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा है। जल्दी 100 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है।
  • विदेशी निवेश: विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI लगभग शून्य या नकारात्मक हो गया है। भारतीय उद्योगपति अब विदेश में निवेश कर रहे हैं। सोलर, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, AI जैसी नई उभरती टेक्नोलॉजी में भारत पिछड़ रहा है।
  • निर्यात: 2013-14 से माल निर्यात लगभग ठप है। चीन के साथ व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर सालाना पार कर गया है।
  • सरकारी वित्त: जीएसटी वृद्धि बहुत कम है। राजकोषीय घाटा 3 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा बढ़ सकता है।
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निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार

भारत 2024 में वैश्विक FDI रैंकिंग में 15वें स्थान पर आ गया। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफ़पीआई भारत से निकल रहे हैं। 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार होने के बावजूद रुपए को बचाना मुश्किल हो रहा है।

भारत की सबसे नाजुक हालत क्यों?

गर्ग लिखते हैं कि भारत के विश्व FDI रैंकिंग में और नीचे गिरने की आशंका है। पूरी दुनिया में विदेशी निवेश घट रहा है, लेकिन भारत का प्रदर्शन खासतौर पर बहुत कमजोर है। देश के अंदर निजी कंपनियों का निवेश लगातार घट रहा है। सरकार का पूंजीगत खर्च 2024 तक निवेश बढ़ा रहा था, अब रुक गया है। उत्पादकता बढ़ाने वाला निवेश लगभग नहीं हो रहा है। भारत का निवेश इंजन अब धीमा पड़ गया है। भारत का माल निर्यात 2013-14 से लगभग रुका हुआ है, जबकि आयात बहुत बढ़ गया है। चीन के साथ व्यापार घाटा हर साल 100 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया है। अमेरिका के साथ बढ़ते विवाद भारत के सरप्लस निर्यात को कम कर सकते हैं। ईरान पर अमेरिका-इसराइल युद्ध के कारण पश्चिम एशिया में निर्यात भी जोखिम में है।
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भारत का निर्यात इंजन पूरी तरह अटक गया है। सरकार और रिजर्व बैंक के पास 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार होने के बावजूद रुपए को बचाने के लिए यह पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। भारत की बाहरी कमजोरियाँ अब साफ दिख रही हैं।

तुर्की से भारत की तुलना

सुभाष चंद्र गर्ग ने लिखा कि तुर्की की स्थिति खराब होने की वजह वहां के राष्ट्रपति एर्दोगन की गलत नीतियां हैं। भारत को तुर्की के साथ तुलना करना उचित नहीं। वहीं, वियतनाम जैसे अधिकतर पूर्वी एशियाई देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा, 'अगर आज कोई संस्था सबसे कमजोर अर्थव्यवस्था चुनती है तो वह भारत की अर्थव्यवस्था होगी।'

यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सरकार अर्थव्यवस्था को मजबूत बताती रही है। सुभाष चंद्र गर्ग की यह चेतावनी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाती है। उन्होंने साफ कहा कि बुनियादी आर्थिक हालत कमजोर होने से भारत अब ‘नाजुक’ हालत की राह पर चल रहा है।