भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में कृषि क्षेत्र को लेकर क्या-क्या समझौते हुए? क्या भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाज़ार खोला? किसानों पर असर और सरकार के दावों की पड़ताल।
पीयूष गोयल और डोनाल्ड ट्रंप
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में कृषि क्षेत्र को खोलकर आख़िर अमेरिका को क्या दिया है और भारतीय किसानों से क्या छीना है? क्या यह भारत के पक्ष में है या फिर अमेरिका के? एक के बाद एक अमेरिकी अधिकारी कृषि को लेकर अमेरिका की जीत क्यों बता रहे हैं और भारतीय किसान ग़ुस्से में क्यों हैं? पढ़िए, आख़िर भारत ने कृषि के क्षेत्र में असल में क्या दिया है और क्या पाया है?
भारत-अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते का फ्रेमवर्क जारी हुआ है। शुक्रवार को दोनों देशों ने संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें कृषि क्षेत्र में भारत ने क्या दिया है, इसकी जानकारी मिली है। यह समझौता फरवरी 2026 में हुआ है और इसमें भारत ने अमेरिका से कुछ कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करने या ख़त्म करने का फ़ैसला किया है, लेकिन संवेदनशील चीजों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है।
भारत ने क्या नहीं दिया?
भारत ने अमेरिका से सोयाबीन, मक्का, ईंधन के लिए इथेनॉल, कपास, डेयरी उत्पाद और पोल्ट्री उत्पादों के आयात के लिए बाजार नहीं खोला है। द इंडियन एक्सप्रेस ने यह जानकारी दी है। ये सभी संवेदनशील हैं और भारतीय किसानों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि जीएम यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें, मांस, पोल्ट्री, डेयरी, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, बाजरा आदि पर कोई छूट नहीं दी गई है। भारत ने इन पर पूरी सुरक्षा बरकरार रखी है।
भारत ने क्या दिया है?
भारत ने अमेरिका के कुछ अन्य कृषि उत्पादों पर टैरिफ खत्म करने या कम करने का फैसला किया है। इनमें डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स यानी डीडीजीएस भी शामिल है। यह मक्का या अनाज से इथेनॉल बनाने के बाद बचा हुआ प्रोटीन युक्त चारा है। बिल्कुल वैसा ही जैसे सरसों, सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचा हुई प्रोटीन युक्त चारा। इसका इस्तेमाल मवेशियों, पोल्ट्री या मछलियों के चारे के रूप में होता है। सोयाबीन ऑयल, पशु चारे के लिए रेड सोरघम यानी ज्वार, बादाम, अखरोट, पिस्ता जैसे ट्री नट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, वाइन और स्पिरिट्स यानी शराब पर भी टैरिफ़ ख़त्म किया गया है। कुछ अन्य उत्पाद भी इनमें शामिल हैं जिनके बारे में अभी साफ़ नहीं किया गया है।
कुछ रिपोर्टों में जानकारों के हवाले से कहा गया है कि ये उत्पाद भारतीय किसानों के लिए ज्यादा खतरा नहीं पैदा करते क्योंकि भारत इनमें बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं करता या इनकी जरूरत आयात से पूरी होती है।
डीडीजीएस से क्या फायदा और नुकसान?
डीजीजीएस पोल्ट्री, डेयरी फार्म और मछली पालन में इस्तेमाल होने वाला सस्ता प्रोटीन स्रोत है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार CLFMA के चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने इसका स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका से आने वाला डीजीजीएस सस्ता और बेहतर क्वालिटी का है क्योंकि उसमें एक तरह का जहरीला फंगस एफ्लाटॉक्सिन बहुत कम होता है। भारत में बने डीजीजीएस में यह 100-200 ppb तक होता है, जो ब्रॉयलर चिकन और डेयरी के लिए ठीक नहीं, लेकिन अमेरिकी में यह 20 ppb से कम होता है जिसे मानक स्तर का माना जाता है।
यानी इससे पोल्ट्री, डेयरी और मछली पालन उद्योग को फायदा होगा। सस्ता और अच्छा चारा मिलेगा, जिससे उत्पादन बढ़ सकता है और लागत कम होगी।
नुक़सान कहाँ होगा?
लेकिन सोयाबीन किसानों और प्रोसेसर्स को नुकसान हो सकता है। भारत में सोयाबीन डीओसी यानी डिऑयल्ड केक महंगा है। डीओसी सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचे खली को कहा जाता है। यह 43-44 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि डीजीजीएस सस्ता है और यह 24-30 रुपये प्रति किलोग्राम है। अगर डीजीजीएस ज्यादा आएगा तो डीओसी की मांग और कीमत कम हो सकती है। सोयाबीन ऑयल पर भी कम ड्यूटी से आयात बढ़ सकता है। सोयाबीन मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में उगता है।
रेड सोरघम का मामला
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोरघम उत्पादक और निर्यातक है। भारत में पशु चारे के लिए इसका आयात सस्ता चारा देगा, जिससे पशुपालन को फायदा होगा।
ड्राई फ्रूट्स और फल
भारत अखरोट, बादाम, पिस्ता आदि पर पहले से उच्च ड्यूटी लगाता था। मिसाल के तौर पर अखरोट पर 100% ड्यूटी थी। अब इन्हें कम या जीरो करने से अमेरिकी ड्राई फ्रूट्स सस्ते आएंगे। भारत अमेरिकी ट्री नट्स का सबसे बड़ा बाजार है। 2025 में 1.5 बिलियन डॉलर का भारत में निर्यात हुआ। इससे उपभोक्ताओं को फायदा होगा, लेकिन भारतीय उत्पादकों पर ज़्यादा असर नहीं क्योंकि हम इनमें बड़े उत्पादक नहीं हैं।
नॉन-टैरिफ बैरियर्स
समझौते में भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए लंबे समय से चले आ रहे नॉन-टैरिफ बैरियर्स को दूर करने पर सहमति जताई है। लेकिन गोयल ने कहा है कि इसमें जीएम फसलें या संवेदनशील उत्पाद नहीं आएंगे।
तो क्या यह समझौता संतुलित है? भारत ने गेहूं, चावल, दालें, डेयरी आदि जैसे संवेदनशील कृषि क्षेत्र को बचाया है, लेकिन पशुपालन और कुछ आयात वाली चीजों में अमेरिका को थोड़ा बाजार दिया है। इससे पोल्ट्री-डेयरी उद्योग को सस्ता चारा मिलेगा, लेकिन सोयाबीन किसानों को सतर्क रहना होगा। सरकार का दावा है कि किसानों के हित सुरक्षित हैं और यह समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद है। लेकिन किसानों की चिंताएँ भी कम नहीं हैं। आगे पूरा व्यापार समझौता होने पर और डिटेल्स आएंगी तो स्थिति ज़्यादा साफ़ होगी।