वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी $3.92 ट्रिलियन रही। अर्थव्यवस्था के मामले में भारत चौथे से फिसलकर छठे नंबर पर आ गया। हालांकि दावा किया गया है कि एनपीए में 28% की गिरावट और बैंक फ्रॉड मामलों में कमी आने से अर्थव्यवस्था को लेकर उम्मीदें बनी हुई हैं।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
मोदी सरकार ने संसद को सूचित किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में चौथे स्थान से गिरकर छठे स्थान पर आ गई है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 3.92 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गया है। यह जानकारी वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने मंगलवार को राज्यसभा में दी है।
चौधरी ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अप्रैल 2026 के विश्व आर्थिक आउटलुक का हवाला देते हुए बताया कि 2025-2026 में भारत की जीडीपी 3.92 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गई। आईएमएफ की रेटिंग अमेरिकी डॉलर के हिसाब से की गई है। हालांकि बीच में खबर आई थी कि यूके और जापान को पिछाड़कर भारत चौथे स्थान पर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।
- भारत अब 2025-2026 के लिए रैंकिंग में छठे स्थान पर है क्योंकि आईएमएफ के अप्रैल 2026 के पूर्वानुमानों में जापान और ब्रिटेन को भारत से आगे रखा गया है।
पीएम मोदी का 5 ट्रिलियन डॉलर का सपना टूटा
भारत सरकार ने 2024-25 तक देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन 2025-26 में भी जीडीपी का $3.92 ट्रिलियन पर रहना यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था अपनी लक्षित समय-सीमा से पीछे चल रही है। हालांकि पीएम मोदी का अक्सर बयान आता था कि उनका लक्ष्य भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है।
भारत का गिरता रुपया
सरकार ने रैंकिंग में गिरावट का कारण अमेरिकी डॉलर के मुकाबले विनिमय दर (Exchange Rate) में उतार-चढ़ाव को बताया है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत की अर्थव्यवस्था में डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी एक बड़ा ढांचागत जोखिम बनी हुई है। हालांकि कभी मोदी ने कहा था कि भारतीय रुपये का गिरना सरकार की इज्जत घटने जैसा है।जीडीपी का कुल आकार (Nominal Size) भले ही $3.92 ट्रिलियन हो, लेकिन 1.4 अरब से अधिक की आबादी के कारण प्रति व्यक्ति जीडीपी (Per Capita GDP) के मामले में भारत अब भी मध्यम-निम्न आय वाले देशों की श्रेणी में आता है, जिसे केवल वैश्विक रैंकिंग से नहीं छिपाया जा सकता।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लगातार गिरने की खास वजह
- निजी निवेश की सुस्ती: सरकार सार्वजनिक धन (Public Capex) से बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रही है, लेकिन निजी क्षेत्र (Private Sector) द्वारा नया पूंजीगत निवेश करने में हिचकिचाहट बरकरार है।
- विदेशी पूंजी का पलायन (FPI Outflow): जनवरी से अगस्त 2026 के बीच foreign portfolio investors (FPIs) द्वारा ₹29.8 लाख करोड़ की भारी-भरकम बिक्री यह दर्शाती है कि विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार में विश्वास डगमगाया हुआ है। वैश्विक अनिश्चितताओं या उच्च अमेरिकी ब्याज दरों के बीच विदेशी पूंजी का बाहर जाना बाजार और रुपये पर दबाव बना रहा है।
- रोजगार सृजन में सुस्ती: विनिर्माण (Manufacturing) को बढ़ावा देने के दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर रोजगार के आंकड़े और श्रम भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate) में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है, जिससे "Jobless Growth" (रोजगार-विहीन वृद्धि) का खतरा बना हुआ है।
सबसे बड़ी चुनौती बेरोजगारीः सबसे बड़ी चूक रोजगार और विनिर्माण के मोर्चे पर दिखाई देती है। भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इतनी बड़ी युवा आबादी के लिए पर्याप्त उत्पादक और अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियां पैदा करना अभी भी चुनौती है। विश्व बैंक ने भी कम श्रम-बल भागीदारी, खासकर महिलाओं की कम भागीदारी, और कृषि में रोजगार की बहुत बड़ी हिस्सेदारी को संरचनात्मक समस्या बताया है तथा मैन्युफैक्चरिंग, एग्रो-प्रोसेसिंग, पर्यटन, स्वास्थ्य और अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। जून 2026 में विश्व बैंक को भारत के निजी क्षेत्र-आधारित रोजगार और संरचनात्मक सुधारों के लिए अलग से $1.5 अरब का कार्यक्रम मंजूर करना पड़ा- यह संकेत है कि सिर्फ सरकारी कैपेक्स से वह रोजगार क्रांति नहीं आई जिसकी जरूरत है।
मोदी सरकार के बड़े दावों- जैसे भारत को दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से ऊपर ले जाना और ‘विकसित भारत 2047’ बनाना, की कसौटी केवल GDP की कुल राशि या वैश्विक रैंक नहीं हो सकती। सरकार के पक्ष में यह तथ्य है कि भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है और FY2025-26 में वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान 7.4% रहा है। लेकिन दूसरी तरफ विश्व बैंक और IMF दोनों संकेत देते हैं कि आगे की छलांग के लिए निजी निवेश, रोजगार, महिला श्रम भागीदारी, विनिर्माण, निर्यात और उत्पादकता में गहरे सुधार चाहिए। इसलिए राजनीतिक सवाल यह नहीं कि “भारत छठे स्थान पर क्यों आ गया”, बल्कि यह है कि तेज GDP वृद्धि को कितनी जल्दी व्यापक रोजगार, ऊंची प्रति व्यक्ति आय और मजबूत विनिर्माण क्षमता में बदला जा सकता है।
संसद में प्रस्तुत यह रिपोर्ट दो परस्पर विरोधी तस्वीरों को सामने रखती है। एक तरफ वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्र में मजबूती (कम NPA और कम फ्रॉड) दिखती है, जो एक स्वागत योग्य कदम है। वहीं दूसरी तरफ, मैक्रो-इकोनॉमिक मोर्चे पर चुनौतियां स्पष्ट हैं- वैश्विक रैंकिंग में गिरावट, $5 ट्रिलियन लक्ष्य से दूरी, FPIs द्वारा बड़े पैमाने पर बिकवाली, और निजी निवेश व रोजगार में मंदी।
केवल सार्वजनिक खर्च के बल पर लंबी अवधि की उच्च आर्थिक वृद्धि हासिल करना मुश्किल है; इसके लिए निजी निवेश को आकर्षित करने और घरेलू खपत (Domestic Consumption) को मजबूत करने के ठोस उपाय करने होंगे।