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चालीस साल की सबसे भयानक मंदी आयेगी - अर्थशास्त्री

अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में इस साल बीते 40 की सबसे भयानक मंदी आएगी। अर्थव्यवस्था कम से कम 5 प्रतिशत सिकुड़ेगी, यानी इसका कामकाज मौजूदा कामकाज से 5 प्रतिशत कम होगा।
इस मुद्दे पर सभी अर्थशास्त्री लगभग एकमत हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था भयानक संकट के दौर से गुजर रही है। आने वाले समय में यह संकट और गहरा होगा और मंदी छा जाएगी।
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अंतरराष्ट्रीय एजंसियों की चिंता

स्टैंडर्ड एंड पू्अर ग्लोबल रेटिंग्स ने कहा है कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था में 5 प्रतिशत की कमी आएगी और यह गिरावट सितंबर महीने में अपने चरम पर होगी।
स्विस बैंक यूबीएस का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कम से कम 5.8 प्रतिशत की दर से कम कारोबार करेगी। इसकी वजह अनुमान से भी कम आर्थिक गतिविधियाँ और अंतरराष्ट्रीय मंदी है।

लॉकडाउन के कारण!

इसकी मौजूदा वजह लॉकडाउन मानी जाती है। हालाँकि सरकार ने कई तरह की छूटें दी हैं, पर बीते लगभग ढ़ाई महीने की पूर्ण बंदी की वजह से पहले से सुस्त चल रही अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है।
प्रबंध सलाहकार कंपनी गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि लॉकडाउन की वजह से सकल घरेलू उत्पाद सिर्फ जून महीने में 45 प्रतिशत सिकुड़ जाएगी।

स्थायी नुक़सान

एस एंड पी का कहना है कि अर्थव्यवस्था को तात्कालिक नहीं, स्थायी नुक़सान होगा। इसने एक रिपोर्ट में कहा है, अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटना 3 जोखिमों पर निर्भर करेगा।
  • पहला, जिस रफ़्तार से कोरोना वायरस संक्रमण पर काबू पाया जा सकेगा। संक्रमण फैलने की रफ़्तार जितनी तेज़ी से कम होगी, आर्थिक सुधार उतनी तेज़ होगी। 
  • दूसरी बात, श्रम बाज़ार में जिस रफ़्तार से चीजें ठीक होंगी, यानी मज़दूर वापस होंगे, उसी तेज़ी से अर्थव्यवस्था में भी सुधार होगा।
  • तीसरे, सभी सेक्टर कितनी तेज़ी से अपनी स्थिति ठीक कर लेंगें और कामकाज में हुए नुक़सान की भरपाई कर लेंगे।

विकास दर?

मार्च की तिमाही के लिए विकास का 3.1 प्रतिशत है। इसकी तुलना में दिसंबर की तिमाही में वृद्धि दर 4.7 प्रतिशत थी।
केअर रेटिंग्स का भी यही मानना है। इसके मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने लाइवमिंट से कहा, 'कई कंपनियों ने अपने कई कामकाज को मिला कर एक साथ कर लिया है ताकि वे किसी तरह साल के अंत तक लक्ष्य हासिल कर लें। इससे अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।'
स्विटज़रलैंड के बैंक यूबीएस ने कहा, 'भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटना इस पर निर्भर करता है कि इससे जुड़े दूसरे नुक़सान, मसलन, बेरोज़गारी, आय में कम, कॉरपोरेट घरानों का क़र्ज़ न चुकाना, बैंक का क़र्ज़ डूबना वगैरह पर काबू पाने के लिए क्या किया जाता है।'

माँग-खपत नहीं

एचडीएफ़सी बैंक ने भी कहा है कि घर पर ही रहने और लॉकडाउन के दूसरे निर्देशों की वजह से उपभोक्ता माँग में कमी आएगी, ग़ैरआवश्यक वस्तुओं पर अधिक बुरा असर पड़ेगा।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि सरकार इस डूबती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्या करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार अमेरिका या  ब्रिटेन की तरह आर्थिक पैकेज नहीं ला सकती।
मोदी सरकार ने जो 20 लाख करोड़ रुपए का विशेष आर्थिक पैकेज का एलान किया, उसमें माँग निकालने या खपत बढ़ाने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। उसमें क़र्ज़ और क़र्ज़ के लिए गारंटी देने पर ज़ोर दिया गया है। पर कोई कंपनी माँग और खपत निकलने बिना क़र्ज़ नहीं लेगी, यह साफ़ है। 
इसी तरह जो बड़े आर्थिक सुधार किए गए हैं, उनके नतीजे बाद में भले ही दिखें, फ़िलहाल उससे कोई राहत नहीं मिलने को है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था एक अंधेरी सुरंग में फँसी दिखती है, जहाँ से उसे बाहर निकालने की कोई सार्थक कोशिश नहीं की जा रही है। 

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