हमारे यहाँ भले ही हर दूसरे दिन अर्थव्यवस्था में ‘ग्रीन शूट्स’ यानी खुशहाली की हरी पत्तियाँ किसी न किसी को दिखाई देती रहती हैं, लेकिन पश्चिमी देशों में माना जा रहा है कि जब मुद्रास्फीति बढ़नी शुरू होगी तभी यह माना जाएगा कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है।
सरकारी परिभाषा के हिसाब से भी हम उस जगह पहुँच गए हैं, जिसे आधिकारिक रूप से मंदी कहा जाता है। लेकिन इस पूरे दौर में ऐसा एक भी मौका नहीं आया जब मुद्रास्फीति यानी महंगाई से मुक्ति मिली हो।
अगर हम खाद्य मुद्रास्फीति को देखें तो हालात और भी बुरे हैं। थोक महंगाई जब नौ महीने के अपने सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँची है तो भी वह अभी 1.55 प्रतिशत पर ही है। जबकि खाद्य मुद्रास्फीति पिछले एक महीने में तेजी से घटी और उसके बावजूद वह 4.27 प्रतिशत पर है।