हर बजट से पहले सरकार विकास, रोजगार, गरीब कल्याण और निवेश की बड़ी घोषणाओं का वादा करती है। लेकिन इस बार बजट ऐसे समय में आ रहा है, जब भारत की अर्थव्यवस्था के भीतर कई संरचनात्मक दबाव एक साथ उभर आए हैं। ये दबाव किसी एक तिमाही या एक साल की नीतियों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि पिछले कई वर्षों में बने आर्थिक असंतुलनों का नतीजा हैं।
सरकार का बढ़ता कर्ज़, रुपये की कमजोरी, बॉन्ड बाजार में उथल–पुथल, बैंकों की घटती जमा राशि, और घरेलू बचत का शेयर बाजार की ओर तेज़ी से जाना- ये सभी संकेत इस ओर इशारा करते हैं कि समस्या अस्थायी नहीं, बल्कि गहरी और प्रणालीगत यानी स्ट्रक्चरल है।
1. सरकार का कर्ज़: विकास का सहारा या भविष्य का बोझ?
वित्त वर्ष 2026 में सरकार लगभग ₹30 लाख करोड़ का नया कर्ज़ उठाने जा रही है, जो पिछले वर्ष से करीब 10% अधिक है। यह कर्ज़ केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले बॉन्ड्स के ज़रिये लिया जाएगा।
कर्ज़ अपने आप में बुरा नहीं होता। विकसित देशों में भी सरकारें कर्ज़ लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करती हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब-
- कर्ज़ लगातार बढ़ता जाए
- ब्याज दरें ऊँची हों
- और कर्ज़ का बड़ा हिस्सा सिर्फ पुराने कर्ज़ का ब्याज चुकाने में चला जाए
भारत आज इसी स्थिति की ओर बढ़ता दिख रहा है। सरकारी खर्च का लगभग 25% हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में जा रहा है। जैसे-जैसे ब्याज दरें बढ़ेंगी, यह अनुपात और बढ़ेगा।
इसका सीधा असर यह होता है कि स्कूल, अस्पताल, रिसर्च, ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन जैसे उत्पादक खर्चों के लिए सरकार के पास सीमित संसाधन बचते हैं।
2. बॉन्ड यील्ड में उछाल: सरकार और बाजार दोनों के लिए खतरा
जब सरकार ज्यादा कर्ज़ लेती है तो उसे निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ऊँचा ब्याज देना पड़ता है। यही कारण है कि 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 6.72% तक पहुँच गई है, जो हाल के महीनों में लगभग 0.25% की तेज़ बढ़त है।
सिर्फ दीर्घकालिक नहीं, बल्कि अल्पकालिक उधारी दरें भी तेज़ी से बढ़ी हैं। इसका मतलब यह है कि—
- सरकार के लिए उधार महँगा हो रहा है
- कंपनियों के लिए कर्ज़ लेना मुश्किल होता जा रहा है
- और पूरी अर्थव्यवस्था में पूंजी की लागत बढ़ रही है
3. RBI की दोहरी चुनौती: रुपया बनाम बॉन्ड बाजार
भारतीय रिज़र्व बैंक यानी आरबीआई इस समय दो विपरीत दबावों के बीच फँसा हुआ है।
(a) गिरता हुआ रुपयाडॉलर के मुकाबले रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। रुपये को संभालने के लिए RBI विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार घटता है और घरेलू बैंकिंग सिस्टम से नकदी बाहर निकल जाती है। यानी रुपये को बचाने की कीमत सिस्टम में नकदी की कमी के रूप में चुकानी पड़ती है।
(b) बॉन्ड बाजार को संभालने की मजबूरीदूसरी ओर, अगर RBI बैंकों में ज्यादा नकदी डाले ताकि वे सरकारी बॉन्ड खरीद सकें और यील्ड न बढ़े तो रुपये को संभालने के लिए उसके पास कम संसाधन बचते हैं और महँगाई पर नियंत्रण कमजोर पड़ सकता है। यही आरबीआई की नीतिगत दुविधा है।
4. बैंकों की नई परेशानी: मार्क-टू-मार्केट नियम
रायटर्स की रिपोर्ट में ICICI Securities के मुख्य अर्थशास्त्री और छह बड़े बैंक ट्रेज़री अधिकारियों से बातचीत के आधार पर एक अहम बिंदु सामने आया है।
अब बैंकों को अपने बॉन्ड पोर्टफोलियो को मार्क-टू-मार्केट (MTM) आधार पर दिखाना होता है। इसका अर्थ है कि अगर ब्याज दर बढ़ती है तो पुराने बॉन्ड की कीमत गिरती है और बैंक को कागज़ी नुकसान दिखाना पड़ता है। इस डर से बैंक नए सरकारी बॉन्ड खरीदने से हिचक रहे हैं और कर्ज़ देने में भी सतर्क हो गए हैं।
5. बैंक डिपॉज़िट संकट: अर्थव्यवस्था की जड़ में चोट
RBI के दिसंबर 2025 बुलेटिन के अनुसार—
- FY25 में बैंक जमा 9% घट गए
- जीवन बीमा निवेश 17% कम हुआ
- छोटी बचत योजनाएँ 24% घटीं
यह कोई मामूली आँकड़ा नहीं है। बैंक डिपॉज़िट किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। इन्हीं जमाओं से उद्योगों को कर्ज़, MSMEs को पूंजी और उपभोक्ताओं को लोन मिलता है।
6. पैसा गया कहाँ? शेयर बाजार की ओर बहती घरेलू बचत
अगर बैंक जमा घटे हैं, तो सवाल उठता है—पैसा गया कहाँ? उत्तर साफ़ है—
- म्यूचुअल फंड निवेश 95% बढ़ा
- डायरेक्ट शेयर बाजार निवेश 135% बढ़ा
यानी भारत की घरेलू बचत अब सुरक्षित बैंक डिपॉज़िट से निकलकर जोखिम भरे बाजारों की ओर जा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं—
- बैंक FD पर टैक्स पूरी तरह लागू
- शेयर और म्यूचुअल फंड पर अपेक्षाकृत कम टैक्स
- और पिछले कुछ वर्षों का तेज़ शेयर बाजार रिटर्न
लेकिन यह ट्रेंड लंबी अवधि में खतरनाक असंतुलन पैदा कर सकता है।
7. RBI की चेतावनी: अनसुनी आवाज़
2024 में तत्कालीन RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने कई बार चेतावनी दी थी— “लोन तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन डिपॉज़िट उतनी तेजी से नहीं।” उन्होंने इसे एक संरचनात्मक चिंता कहा था, न कि अस्थायी समस्या। आज वही चेतावनी सच होती दिख रही है।
8. शेयर बाजार पर असर: क्यों महँगा हो रहा है पैसा?
जब बॉन्ड पर अच्छा ब्याज मिलने लगता है, बैंक बॉन्ड को सुरक्षित मानते हैं, और नकदी की कमी होती है तो कंपनियों को सस्ता कर्ज़ मिलना मुश्किल हो जाता है।
RBI भले ही भविष्य में ब्याज दर घटाने के संकेत दे, लेकिन जब तक सरकार का उधार भारी रहेगा, और बॉन्ड यील्ड ऊँची रहेगी बैंकों के लिए सरकारी बॉन्ड ही ज़्यादा आकर्षक बने रहेंगे।
9. विदेशी निवेशक क्यों बेच रहे हैं?
अमेरिका का 10 साल का सरकारी बॉन्ड करीब 4.5% ब्याज देता है और दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। भारत का बॉन्ड 6.72% देता है, लेकिन अगर रुपया एक साल में 6–7% गिर गया तो सारा अतिरिक्त रिटर्न खत्म हो जाता है। ऐसे में विदेशी निवेशक क्यों जोखिम लें? यही वजह है कि FIIs लगातार बिकवाली कर रहे हैं और रुपये पर दबाव और बढ़ रहा है।
10. बजट के सामने असली चुनौती
बजट से पहले सरकार पर कई दबाव होंगे—
- LTCG टैक्स कम करने की माँग
- शेयर बाजार को सहारा देने की कोशिश
- और विकास दर को ऊँचा दिखाने की मजबूरी
लेकिन असली सवाल यह है कि अगर घरेलू बचत बैंकिंग सिस्टम से बाहर जाती रही, अगर कर्ज़ का बोझ बढ़ता रहा, और अगर रुपया कमजोर होता गया तो विकास की नींव कैसे मज़बूत होगी?
दिखावे से आगे देखने का समय
भारत की अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक स्थिरता के बीच चुनाव करना होगा।
बजट अगर सिर्फ घोषणाओं और बाजार को खुश करने तक सीमित रहा, तो संकट और गहराएगा। लेकिन अगर सरकार घरेलू बचत को संतुलित तरीके से प्रोत्साहित करे, कर्ज़ पर निर्भरता घटाए, और RBI की चेतावनियों को गंभीरता से ले तो यह संकट एक सुधार के अवसर में बदला जा सकता है।
यह बजट सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि नीतिगत साहस का इम्तिहान है।