सोलह मई को ठीक छह महीने हुए जब सरकार ने ‘सबको बीमा, सबकी रक्षा’ जैसे आकर्षक नाम से बीमा व्यवसाय को शत प्रतिशत विदेशी पूंजी के लिए खोलने का बिल पेश किया था। और इसी 16 मई को पहली बड़ी ख़बर आई कि भारतीय बीमा कंपनी भारती अक्सा ब्रिटिश कंपनी प्रूडेन्शियल के हवाले हो गई। मिल्कियत के साथ मैनेजमेंट भी उसके हाथ आ गया है। इस बदलाव की नींव पिछले साल के बजट से पड़ी थी और संसद के दोनों सदनों में भाजपा तथा एनडीए की जो स्थिति है उसमें इस बिल को पास कराने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं हुई। और पिछली बार भारतीय मजदूर संघ समेत की मज़दूर यूनियनों और राजनैतिक दलों की तरफ से विरोध का जो स्वर सुनाई दिया था इस बार कहीं से भी चूं की आवाज भी नहीं आई।
इसे सर्वसम्मति का मामला नहीं मानना चाहिए लेकिन मोटे अर्थों में सभी दलों में इस पर सहमति है भी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय से बार बार बीमा निजीकरण का सवाल उठता रहा है और इसमें निवेश की सीमा 26 फ़ीसदी, 49 फीसदी और 75 फीसदी तक बढ़ाने के साथ प्रबंधन और मुनाफा बाहर ले जाने की इजाजत देने के सवाल भी उठते रहे हैं। हां अभी तक एक ही मामले में सहमति नहीं बनी है कि बीमा प्रीमियम के पैसे विदेश जाने की अनुमति नहीं है।
उदारीकरण पर राजनैतिक दल एकमत?
उदारीकरण की आर्थिक नीतियों पर हमारे राजनैतिक दलों में एक सर्वसम्मति सी बन गई थी और है भी। पर बीमा के सवाल पर एक झिझक सी रही है। इसका कारण यह है कि राष्ट्रीयकरण के पहले देश में जो निजी बीमा कंपनियां थीं उनके काम को लेकर काफी शिकायतें थीं और उनका दायरा भी बहुत सीमित था। जब से सारी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। उसके बाद से बीमा का दायरा बढ़ा, क्लेम निपटान का रेट सुधारा, लोगों की शिकायतें कम हुईं और सबसे बढ़कर यह बात हुई कि प्रीमियम का पैसा सरकार के हाथ आया जिससे विकास की अनेक योजनाओं के लिए रेडी कैपिटल मिला। कई बार सरकारी निर्देश से बीमा कंपनियों की पूंजी का नाश भी हुआ, लेकिन ऐसे अवसर कम आये। यूटीआई घोटाले में जरूर बीमा निगम की पूंजी के सहारे संकट निपटाया गया। और आज भी क्लेम निपटाने के मामले में हमारी पांचों सरकारी कंपनियां ही पहले पाँच पायदानों पर हैं। निजी और विदेशी कंपनियों का नंबर इनके बाद ही आता है। कहना न होगा कि विदेशी कंपनियों की मजबूत लीगल टोलियां और चंट वकील गरीब ग्राहकों का क्लेम रोकने में सफल हो जाते हैं।
कंपनियों की पौ बारह!
और अपने यहां बीमा के नाम पर उदारीकरण वाले दौर में जो ‘घोटाले’ हुए हैं वह भी कई बार राजनेताओं और उनसे भी बढ़कर ट्रेड यूनियन नेताओं को इसके खिलाफ पोजीशन लेने के लिए मजबूर करते हैं। बीते काफी समय से फसल बीमा और हेल्थ बीमा की चर्चा राजनीतिक हलके में ज्यादा रही है, अंडरराइटिंग क्या बला है या बड़े सौदे कैसे होते हैं यह तो ठीक से पता भी नहीं है। लेकिन जो फसल बीमा और स्वास्थ्य बीमा योजनाएं चली हैं उनका अनुभव यह रहा है कि जितनी रकम बीमा के प्रीमियम के रूप में दी जाती है उसका दस फीसदी भी भुगतान क्लेम के रूप में नहीं हुआ है। और इस प्रीमियम की वसूली भी सिर्फ एक ग्राहक-सरकार से लेनी हो तो कंपनियों की पौ बारह हो जाती है। उल्लेखनीय है कि ऐसे सारे कार्यक्रमों में निजी बीमा कंपनियों को ही ज्यादा अवसर दिया गया है। और कई बार लगता है कि यह भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय है जो उदारीकरण और बीमा निजीकरण के साथ आया है।
जब बीमा कंपनी और मंत्री/सचिव में डील हो गई हो तो किसान हो या मरीज उस बेचारे की क्या औकात रह जाती है क्लेम लेने की। और जनता के कर का पैसा होने से शोर मचाने वाले भी सामने नहीं आते।
अपने यहां क्लेम का मामला तब सामने आता है जब ग्राहक सीधे कंपनी को प्रीमियम देते हैं और उनको सेवा मिलने में या पॉलिसी मैच्योर होने पर पैसे वापस पाने में मुश्किल आती है। अपने यहां सबसे ज़्यादा झमेला किसी और योजना में पॉलिसी देने का वायदा करके एजेंट कंपनी की सुविधा के अनुसार दूसरी योजना में पैसे डाल देने का है। ऐसा अक्सर बाजार में निवेश के म्यूचुअल फंड के खेल में किया जाता है। और वहां जब पूंजी डूबती है तो ग्राहक का सिर कुचला जाता है। ऐसी शिकायतें आम हैं लेकिन उनका निपटारा ढंग से नहीं होता और शिकायतों का क्रम बढ़ता जा रहा है। सरकारों को बीमा व्यवसाय को विदेशी निवेश के लिए खोलने की जल्दबाजी तो रही है लेकिन ग्राहकों की शिकायत निपटाने का होश नहीं रहता। और कंपनियां किन वायदों के साथ आती हैं और उनका काम किस दिशा में जाता है यह चेक करना तो सरकार अपनी जबाबदेही मानती ही नहीं, बीमा प्रोडक्ट की वेराइटी बढ़ाना और ग्राहकों के सामने नए विकल्प आना हुआ भी है या नहीं कोई नहीं देखता। देश की बीमा कंपनियों वाले दौर से आगे कितनी प्रगति हुई है, सौ फीसदी मिल्कियत सौंपने से पहले इस पर विचार हुआ हो, ऐसा नहीं लगता।
लेकिन जिस चीज की असली चर्चा होनी चाहिए वह इन कंपनियों से मिलने वाले बीमा के दायरे का है। वह विदेशी नाम या बड़े ब्रांड का बीमा तो करेंगे लेकिन देसी और छोटे उद्यमियों के उत्पाद बीमा के दायरे से बाहर हो जाते हैं, इसे अभी सबसे अच्छी तरह बीमारी के इलाज के सिलसिले से समझा जा सकता है। नामी गिरामी प्राइवेट अस्पतालों और बीमा कंपनियों का गठजोड़ हम सबके अनुभव के दायरे की चीज है। कल को मकान, दुकान, फर्नीचर, बरतन-बासन और हर चीज के बीमा में यह भेद दिखेगा और लगेगा कि विदेशी बीमा कंपनियां कुछ खास संगी साथियों की मदद करने आई है- आम लोगों से उनका कोई मतलब नहीं है। पर इससे भी ज्यादा घातक बात निवेश वाली कंपनियों का चुनाव है जो बहुत स्पष्ट ढंग से पक्षपात बढ़ाती हैं। पैसा हमारा आपका और निवेश का फ़ैसला इन कंपनियों के हाथ में जाने से कुछ कंपनियों की आश्चर्यजनक तेज वृद्धि का रहस्य समझा जा सकता है। सो वे तो शत प्रतिशत विदेशी मिल्कियत के लिए बेचैन रही होंगी ही, हमारी सरकारें क्यों निरंतर उनका मिशन आगे बढ़ाने में लगी रही हैं, यह समझना खास मुश्किल नहीं होना चाहिए।