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अपने ही आर्थिक संस्थानों को क्यों निशाने पर ले रही है मोदी सरकार?

नरेंद्र मोदी सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि की दर तय करने के लिए आँकड़ों से छेड़छाड़ करने के मुद्दे पर जिस तरह एनएसएसओ को निशाने पर लिया, उससे कई सवाल खड़े होते हैं। यह पूछा जा रहा है कि क्या सरकार दूसरे तमाम संस्थानों की तरह इसे भी ध्वस्त करना चाहती है। यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या सरकार एनएसएसओ को अप्रासंगिक कर देना चाहती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि सरकार के रवैए से पूरी अर्थव्यवस्था का किस तरह और कितना नुक़सान हुआ है।
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विवाद की शुरुआत राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑफ़िस यानी एनएसएसओ के इस बयान से हुई कि सरकार ने जीडीपी की गणना करने के लिए आँकड़े जुटाने के लिए जो सर्वेक्षण किया, उनमें से 39 प्रतिशत कंपनियाँ फ़र्जी और बेनामी हैं, जिनका कोई वजूद ही नहीं है, वे सिर्फ़ काग़ज़ पर ही हैं। इस वजह से जीडीपी का आकलन ग़लत है।

सरकार ने क्या कहा?

वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी कर इससे इनकार किया है कि ग़लत आँकड़ों के इस्तेमाल कर जीडीपी का आकलन किया गया है। सरकार ने कहा है कि जिन कंपनियों के बारे में कहा गया है कि वे कवरेज एरिया से बाहर हैं, वे भी काम तो कर ही रही हैं। 
सरकार ने कहा है कि जो बेनामी कंपनियाँ हैं, वे वजूद में हैं। यानी उनका योगदान अर्थव्यवस्था में है। पर अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि बेनामी यानी शेल कंपनियाँ सिर्फ़ काग़ज़ पर होती हैं, वे कोई काम नहीं करती हैं।
यह पहला मामला नहीं है जब नरेंद्र मोदी सरकार और एनएसएसओ आमने-सामने हुए हैं। इसके बेरोज़गारी के मुद्दे पर भी एनएसएओ ने सरकार के आँकड़ों को ग़लत बताया था, जिससे सरकार काफ़ी नाराज़ हुई थी।

बेरोज़गारी पर बवाल

जनवरी 2019 में अंग्रेजी अख़बार बिजनेस स्टैंडर्ड ने बेरोज़गारी को लेकर एनएसएसओ की एक रिपोर्ट छापी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि 2017-18 में बेरोज़गारी दर सबसे ज़्यादा 6.1 प्रतिशत थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबसे ज़्यादा हो गई है। रिपोर्ट के सामने आने के बाद ख़ासा हंगामा हो गया था। सरकार को घिरते देख नीति आयोग ने सफ़ाई देते हुए कहा था कि यह फ़ाइनल आँकड़े नहीं, ड्राफ़्ट रिपोर्ट है।  

एनएससी प्रमुख ने दिया था इस्तीफ़ा

इसी तरह नेशनल स्टटिस्टिक्स कमीशन के दो सदस्य पी. सी. मोहनन और जे. वी. मीनाक्षी ने सरकार के रवैए से दुखी हो कर इस्तीफ़ा दे दिया था। उन्होंने कहा था कि नोटबंदी के बाद बेरोज़गारी संबंधित उनकी रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की गई थी। यह पाया गया था कि साल 2017-18 के दौरान बेरोज़गारी में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गई थी और इसी कारण से आँकड़ा जारी नहीं किया जा रहा था। 
  • हम आपको बताते हैं कि एनएसएसओ की रिपोर्ट में मोटे तौर पर क्या आँकड़े हैं जिससे मोदी सरकार परेशान थी?

एनएसएसओ की अप्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में बेरोज़गारी दर 6.1 फ़ीसदी रही। यह 1972-73 के बाद सबसे ज़्यादा है। इससे पहले के वित्तीव वर्ष 2011-12 में बेरोज़गारी दर सिर्फ़ 2.2 फ़ीसदी रही थी।
वर्ष 1977-78 से अब तक के आँकड़ों पर नज़र डालें तो 2017-18 से पहले बेरोज़गारी की दर 2.6 से ज़्यादा नहीं हुई थी। 1987-88 में यह सबसे ज़्यादा 2.6 फ़ीसदी तक पहुँची थी। 2007 और 2011-12 के बीच तो यह दर दो फ़ीसदी के आसपास थी।

लेबर ब्यूरो से मतभेद

22 फ़रवरी को इंडियन एक्सप्रेस ने ख़बर छापी थी कि बेरोज़गारी पर नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस (एनएसएसओ) के आँकड़ों को छुपाने के बाद केंद्र सरकार श्रम ब्यूरो के सर्वे के आँकड़ों को इस्तेमाल करने की योजना बना रही है। अख़बार के मुताबिक़, एक्सपर्ट कमेटी ने श्रम कार्यालय से कहा कि इस रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ियाँ हैं, वह इन्हें दुरुस्त कर ले। एक्सपर्ट कमेटी की ओर से रखे गए विचार को केंद्रीय श्रम मंत्री की ओर से स्वीकृति नहीं मिली है। लेकिन फिर आचार संहिता लागू हो गई और औपचारिक तौर पर यह फ़ैसला लिया गया है कि चुनाव के दौरान इस रिपोर्ट को सार्वजनिक न किया जाए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये तमाम संस्थाएँ सरकारी हैं। उनका मक़सद सर्वेक्षण करना, आँकड़े एकत्रित करना, अध्ययन करना और विश्लेषण करना है ताकि सरकार की एजेंसियाँ उसके मुताबिक योजनाएँ बना सके।

जहाँ तक एनएससओ की बात है, वह वित्त मंत्रालय का ही हिस्सा है। मज़े की बात यह भी है कि वित्त मंत्रालय ने ही एनएसएसओ को निशाने पर लिया है। यानी वित्त मंत्रालय अपने ही संस्थान को कमज़ोर कर रहा है। क्या यह सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है। यह हम नहीं कहते, पर लोगों को इस पर शक तो ज़रूर है।
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