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बेरोज़गारी के आँकड़े ड्राफ़्ट नहीं फ़ाइनल रिपोर्ट के थे, मोहनन ने कहा

बेरोज़गारी को लेकर हाल ही में आए आँकड़ों को लेकर केंद्र सरकार का यह कहना कि वह ड्राफ़्ट रिपोर्ट थी, पूरी तरह ग़लत है। अगर एक बार केंद्रीय सांख्यिकी आयोग रिपोर्ट को मंजूरी दे देता है तो यह फ़ाइनल होती है। यह कहना है केंद्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व प्रमुख पीसी मोहनन का।
मोहनन ने कहा कि आयोग के रिपोर्ट को मंजूरी देने के बाद यह कहना सही नहीं है कि अब केंद्र सरकार इसे मंजूरी देगी। उन्होंने कहा कि सरकार के मंजूरी देने की बात कहने से इसकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़ा होता है। 
मोहनन ने पिछले महीने की 28 जनवरी को अचानक अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। उन्होंने एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि सरकार नौकरियों को लेकर एनएसएसओ (नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनइजेशन) की रिपोर्ट जारी नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि एनएसएसओ की रिपोर्ट 5 दिसंबर को आई और आयोग ने इसे मंजूरी दे दी थी, लेकिन इसके बाद भी इसे जारी नहीं किया जा रहा था और इसी कारण से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि आयोग की लगातार उपेक्षा की जा रही थी। 

मोहनन ने यह भी साफ़ किया कि उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से इस्तीफ़ा नहीं दिया था। उन्होंने कहा कि आयोग कोई बहुत बेहतर काम नहीं कर रहा था। उनके मुताबिक़, सरकार को मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए और व्यवस्था में सुधार करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरे साथ इस्तीफ़ा देने वाली मीनाक्षी ने भी यही कहा है। 

बता दें कि हाल ही में अंग्रेजी अख़बार बिजनेस स्टैंडर्ड ने बेरोज़गारी को लेकर एक रिपोर्ट छापी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबसे ज़्यादा हो गई है। रिपोर्ट के सामने आने के बाद ख़ासा हंगामा हो गया था और नीति आयोग ने सफ़ाई देते हुए कहा था कि यह ड्राफ़्ट रिपोर्ट है। 

रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में बेरोज़गारी दर 6.1 फ़ीसदी रही और यह 1972-73 के बाद सबसे ज़्यादा है। इससे पहले वित्तीय वर्ष 2011-12 में बेरोज़गारी दर 2.2 फ़ीसदी रही थी। एनएसएसओ के आँकड़े 5 साल में एक बार आते हैं। संगठन देश भर में सर्वेक्षण कर रोज़गार, शिक्षा, ग़रीबी, स्वास्थ्य और कृषि की स्थिति पर रिपोर्ट देता है। 

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