दिल्ली में सपने अक्सर बजट की किसी लाइन से उतरते हैं। इस बार वह लाइन दस हज़ार करोड़ रुपये की थी। सरकार ने एक और ‘फंड ऑफ फंड्स’ शुरू किया है— डीप‑टेक को आगे बढ़ाने के नाम पर।
कहानी नई नहीं है। 2016 में भी यही प्रयोग हुआ था। सरकार ने सोचा था — दिल्ली एक रुपया लगाएगी, बाज़ार पाँच जोड़ देगा। चिंगारी सरकार की, आग बाज़ार की।
दस साल बाद लौ तो जली, पर दिशा अब भी धुँधली है।
काग़ज़ पर सब चमकता है। 140 फंड। 1300 स्टार्टअप। 25 हज़ार करोड़। 22 यूनिकॉर्न। आँकड़े ऐसे जैसे किसी मेले की रोशनी — दूर से चमकदार, पास से धुँधले।
भारत आज खुद को तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम कहता है। दो लाख से ज़्यादा स्टार्टअप्स। सस्ता डेटा, डिजिटल ढाँचा, बड़ा बाज़ार — हवा अनुकूल थी। जब 2025 में वैश्विक पूँजी सूखने लगी, सरकारी एंकर कैपिटल ने नाव को डूबने नहीं दिया।
पर असली कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ प्रेस रिलीज़ खत्म होती है।
हज़ारों स्टार्टअप्स को इस फंड का एक रुपया भी नहीं मिला। कुल स्टार्टअप्स में से मुश्किल से 1–2 प्रतिशत को ही लाभ। काग़ज़ पर प्रतिबद्धताएँ तेज़, ज़मीन पर निवेश धीमा। मंज़ूरी चक्र ऐसे जैसे किसी दफ़्तर की पुरानी फ़ाइल — चलती है, पर धीरे।
औसत निवेश — 18 करोड़ रुपये। डीप‑टेक के लिए यह शुरुआती साँस भरने जितना भी नहीं। असली उड़ान के लिए 10–20 मिलियन डॉलर चाहिए। पतली परत में फैला पैसा अक्सर प्रतीक बन जाता है, शक्ति नहीं।
और सबसे बड़ा सवाल — कितने टिके? कितने स्टार्टअप पाँच साल बाद भी साँस लेते हैं? कितने सिर्फ मूल्यांकन की धूप में चमके और फिर ओझल हो गए?
वेंचर कैपिटल में बड़ा जोखिम
वेंचर कैपिटल सिर्फ पैसा नहीं, जोखिम की संस्कृति है। और सरकारी पैसा, चाहे निजी हाथों से क्यों न जाए, जोखिम को हल्का कर देता है।
निवेश समितियों में अनुपालन की हवा घुस जाती है। सुरक्षित दाँव समझदारी लगने लगते हैं। प्लेटफार्म चमकते हैं, प्रयोगशालाएँ अँधेरे में छूट जाती हैं।
जब सरकार सबसे भरोसेमंद निवेशक बन जाए, जोखिम का तराजू अपने आप झुक जाता है।
इसका असर साफ़ दिखता है। सॉफ़्टवेयर, फिनटेक, उपभोक्ता ऐप्स — ये सब फले‑फूले पर हार्डवेयर, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, क्लाइमेट साइंस — ये पूँजी के रेगिस्तान में खड़े हैं। ये धंधे धीमे हैं, कठिन हैं, और चमकदार नहीं। इनको धैर्य चाहिए — और धैर्य न बाज़ार में मिलता है, न मंत्रालयों में।नया फंड कहता है कि वह डीप‑टेक पर ध्यान देगा। स्वागत योग्य है। पर ढाँचा वही रहा तो नतीजे भी वही रहेंगे — आधी उड़ान, आधी आकांक्षा।
वैश्विक व्यवस्था बदल रही है
भारत यह फंड किसी शांत दुनिया में नहीं ला रहा। वैश्विक तकनीकी व्यवस्था टूट रही है। एआई आर्थिक नक्शे बदल रही है। सप्लाई चेन फिर से खिंच रही हैं। देश तय कर रहे हैं — वे भविष्य बनाएँगे या सिर्फ खरीदेंगे।
भारत की जनसांख्यिकीय बढ़त हमेशा बढ़त नहीं रहेगी। उच्च‑मूल्य उद्योग नहीं बने तो यही युवा बोझ बन जाएगा।
देश के सामने दो रास्ते हैं — एक अरब उपभोक्ताओं का बाज़ार बनना या नई तकनीकों का निर्माता।
यहीं असली सवाल उठता है: अगर अर्थव्यवस्था दोगुनी हो गई, तो वेंचर फंड का आकार वही क्यों है? अगर तकनीकी संप्रभुता लक्ष्य है, तो पेंशन फंड अब भी हिचकते क्यों हैं? अगर टिकाऊपन महत्वपूर्ण है, तो दीर्घकालिक डेटा नीति का केंद्र क्यों नहीं?
ये लेखा‑जोखा नहीं, सभ्यता के सवाल हैं।
एक बदली हुई नीति अलग दिखेगी। कम दिल्ली, बाक़ी देश ज़्यादा। कम काग़ज़, ज़्यादा स्वायत्तता। कम मूल्यांकन, ज़्यादा क्षमता। कम घोषणा, ज़्यादा प्रयोग।
और सबसे ज़रूरी — असफलता को नवाचार का हिस्सा मानना। दूसरी कोशिश को सम्मान देना। दिवालियापन को कलंक नहीं, प्रक्रिया समझना।
सरकार की भूमिका परिणाम तय करना नहीं, परिस्थितियाँ बनाना है। पिछले दशक का फंड‑ऑफ़‑फंड्स न विफलता था, न क्रांति।
उसने पूँजी बढ़ाई, दायरा फैलाया, और कठिन समय में सहारा दिया। पर उसने यह भी दिखाया कि वैज्ञानिक जोखिम को जगाने में सरकारी एंकर कैपिटल की सीमाएँ हैं।
नया दस हज़ार करोड़ रुपये उदारता की परीक्षा नहीं — कल्पना की परीक्षा है।
भारत तय करेगा — वेंचर कैपिटल सब्सिडी बनेगा या रणनीतिक औज़ार। बाज़ार की चमक बढ़ेगी या प्रयोगशालाओं की रोशनी। हम उपभोक्ता बनेंगे या निर्माता।
निवेश की दुनिया में कुछ कंपनियाँ युग तय करती हैं। नीति की दुनिया में कुछ क्षमताएँ।
भारत का दाँव सिर्फ वित्तीय नहीं है।
यह इस बात पर है कि राज्य प्रतिभा प्रसव की दाई बनेगा — या उसका हिसाब‑किताब रखने वाला मुनीम।