अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कॉपर आयात पर 50% टैरिफ़ लगाने की घोषणा ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योगों में चिंता की लहर पैदा कर दी है। इस टैरिफ़ के 1 अगस्त 2025 से लागू होने की संभावना है। इस टैरिफ़ के लागू होने से भारत की महत्वाकांक्षी सेमीकंडक्टर मिशन और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण योजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। हाई क्वालिटी वाले कॉपर के लिए आयात पर निर्भर भारत की सप्लाई चेन में इस टैरिफ़ के कारण बाधा आ सकती है और लागत भी काफ़ी ज़्यादा बढ़ सकती है।

अमेरिका ने कॉपर आयात पर 50% टैरिफ़ की घोषणा 8 जुलाई को की थी। इसका मक़सद अमेरिकी घरेलू कॉपर उत्पादन को बढ़ावा देना है। यह क़दम ट्रंप प्रशासन की 'रेसिप्रोकल' व्यापार नीति का हिस्सा है, जिसके तहत पहले से ही स्टील और एल्यूमीनियम पर 50% टैरिफ़ लागू किए जा चुके हैं। इस घोषणा के बाद वैश्विक कॉपर की क़ीमतों में 10% से अधिक का उछाल देखा गया।
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कॉपर कितना ज़रूरी?

कॉपर एक अहम कच्चा माल है, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योगों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। यह प्रिंटेड सर्किट बोर्ड यानी पीसीबी, कैपेसिटर, रेसिस्टर, कनेक्टर, रिले और सेमीकंडक्टर पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले तारों में मुख्य भूमिका निभाता है। भारत में हाई क्वालिटी वाले कॉपर और ख़ास मिश्र धातुओं की सप्लाई मुख्य रूप से आयात पर निर्भर है। ख़ास तौर पर चीन, चिली, इंडोनेशिया और पेरू जैसे देशों से यह आयात होता है।

भारत पर असर

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योग इस टैरिफ़ से कई तरह से प्रभावित हो सकते हैं:

लागत में वृद्धि: कॉपर की क़ीमतों में अब तक 12% से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है। प्रिंटेड सर्किट बोर्ड में क़रीब 20% कॉपर होता है। इसकी लागत में वृद्धि से इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन महंगा हो सकता है। इससे भारत के महत्वाकांक्षी सेमीकंडक्टर मिशन से जुड़ी परियोजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं।

सप्लाई चेन में बाधा: भारत में हिंदुस्तान कॉपर, स्टर्लाइट और हिंडाल्को जैसे घरेलू सप्लायर सेमीकंडक्टर-ग्रेड कॉपर का बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं करते। 

हाई क्वालिटी वाले कॉपर और खास मिश्र धातुओं के लिए भारत मुख्य रूप से चीन जैसे देशों पर निर्भर है। टैरिफ़ के कारण वैश्विक सप्लाई चेन में बाधा आने से भारत को ज़रूरी कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

निर्यात पर असर: भारत ने 2024-25 में 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के कॉपर और कॉपर उत्पादों का निर्यात किया। इसमें से 360 मिलियन डॉलर यानी 17% अमेरिका को निर्यात हुआ। हालाँकि उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कॉपर की कमी है और अमेरिका को इसका निर्यात केवल 10,000 टन के आसपास है। फिर भी टैरिफ़ के कारण अमेरिकी मांग में कमी से भारत के कॉपर निर्यात उद्योग पर दबाव पड़ सकता है।

उद्योग की चिंताएँ

ईटी की रिपोर्ट के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के महासचिव राजू गोयल ने कहा है कि भारत में हाई क्वालिटी वाली कॉपर सामग्री या ख़ास मिश्र धातुओं का निर्माण नहीं होता। उन्होंने कहा, 'ये सामग्रियाँ कुछ विशेष वैश्विक निर्माताओं और ख़ासकर चीन से आयात की जाती हैं। टैरिफ़, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर या ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स प्रमाणन जैसी बाधाएँ इस नाजुक सप्लाई चेन को बाधित कर सकती हैं।' रिपोर्ट के अनुसार इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक चंडक ने कहा कि टैरिफ़ के कारण वैश्विक सप्लाई में कमी और क़ीमतों में वृद्धि से भारत के उत्पादन लागत में उछाल आ सकता है। उन्होंने सरकार से घरेलू कॉपर उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने का आग्रह किया है।
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सरकार की प्रतिक्रिया

कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने 9 जुलाई को कहा था कि भारत सरकार अमेरिकी टैरिफ़ के असर पर चर्चा करेगी। उन्होंने एक विजन दस्तावेज का ज़िक्र किया, जिसमें 2047 तक कॉपर की मांग में छह गुना वृद्धि का अनुमान लगाया गया है और 2030 तक 5 मिलियन टन प्रति वर्ष स्मेल्टिंग और रिफाइनिंग क्षमता जोड़ने की योजना है। खान मंत्रालय ने आगामी भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के माध्यम से राहत की संभावनाओं का आकलन करने के लिए परामर्श शुरू किया है। 

उद्योग विशेषज्ञों ने कई सुझाव दिए हैं:
  • घरेलू उत्पादन को बढ़ावा: भारत को हाई क्वालिटी वाले कॉपर और ख़ास मिश्र धातुओं के उत्पादन में निवेश करना चाहिए। इससे आयात पर निर्भरता कम होगी।
  • मुक्त व्यापार समझौते: भारत को चिली और इंडोनेशिया जैसे उन देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को मजबूत करना चाहिए जो कॉपर की आपूर्ति करते हैं।
  • रणनीतिक भंडार: कॉपर जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के रणनीतिक भंडार बनाने की ज़रूरत है ताकि सप्लाई चेन में बाधा से बचा जा सके।

सेमीकंडक्टर मिशन पर असर

भारत के सेमीकंडक्टर मिशन का लक्ष्य 2030 तक 14 नैनोमीटर से ऊपर के नोड्स पर फैब्रिकेशन हासिल करना है। लेकिन इस टैरिफ़ से इस मिशन पर असर हो सकता है। मैकिन्से की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2023 में 34.3 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2032 तक 100 बिलियन डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है। 

टैरिफ़ के कारण कॉपर की क़ीमतों में बढ़ोतरी और आपूर्ति की कमी से भारत की चिप विनिर्माण योजनाएँ धीमी हो सकती हैं, जिससे इस क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

अमेरिका का कॉपर टैरिफ़ भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योगों के लिए एक चुनौती पेश करता है। हालाँकि, भारत के कॉपर निर्यात पर इसका सीधा प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन अप्रत्यक्ष प्रभाव जैसे लागत में बढ़ोतरी और सप्लाई चेन में बाधा, उद्योग के लिए चिंता का विषय हैं।