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 कश्मीर से गिरफ़्तार कर क्यों भेजा गया आगरा-वाराणसी ?

दावे भले ही जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य होने के किए जाते रहे हों, लेकिन स्थिति कहीं ज़्यादा ख़राब है। अनुच्छेद 370 में फेरबदल के बाद ऐसे हज़ारों लोग हैं जो अपनों से संपर्क तक नहीं साध पा रहे हैं। जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है उनके परिवार वालों की स्थिति कहीं ज़्यादा ख़राब है। पहले बिना कारण गिरफ़्तार किया गया। न तो यह बताया गया कि कब तक रखा जाएगा और न ही यह कि कहाँ रखा गया है। अब ऐसी रिपोर्टें हैं कि इन्हें गिरफ़्तार कर जम्मू-कश्मीर से बाहर लखनऊ, वाराणसी और आगरा भेजा गया है।

जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है उनमें प्रमुख व्यापारी नेता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, चुने हुए राजनेता, शिक्षक और यहाँ तक कि 14 साल तक के छात्र भी शामिल हैं। ये गिरफ़्तारियाँ अनुच्छेद 370 में फेरबदल से ठीक पहले और बाद में भी हुईं। हालाँकि ऐसे गिरफ़्तार लोगों की ठीक संख्या बताना मुश्किल है, लेकिन रिपोर्टें हैं कि ऐसे क़रीब 2000 हज़ार लोग हैं।

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'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने कई ऐसे परिवारों के लोगों से बातचीत के आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित की है जिनके रिश्तेदारों को गिरफ़्तार कर लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, आसिफ़ा मुबीन के पति मुबीन शाह कश्मीर के काफ़ी धनी व्यापारी हैं। रात के समय जब मुबीन बाहर बालकनी में निकले तो सुरक्षा बलों ने नीचे से तेज़ आवाज़ लगाई आपको गिरफ़्तार किया जाता है। उनकी पत्नी के अनुसार, जब मुबीन ने गिरफ़्तारी वारंट दिखाने को कहा तो सुरक्षा बलों ने कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं है, यह अलग तरह का है, हमें इसके आदेश मिले हैं।

शाह की पत्नी ने कहा कि वह यह देखकर आश्चर्यचकित थी कि शाह सिर्फ़ व्यापारी हैं फिर भी उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। वह कहती हैं कि शाह कार्पेट बिजनेस में हैं, बिजली संयंत्र लगाने के लिए विदेशी निवेश लाने में लगे थे, वही विदेशी निवेश जिस पर प्रधानमंत्री मोदी जोर देते हैं, फिर भी ऐसा क्यों हुआ।

शाह के बड़े भाई नियाज़ किसी तरह पता लगा पाए कि शाह को श्रीनगर जेल में रखा गया है। वे उनसे मिलने गए। अगले दिन जब नियाज़ कुछ कपड़े देने गए तो जेल के गार्ड ने उनसे कहा कि शाह को सेना के जहाज़ से आगरा ले जाया गया है।

बात नहीं कर पा रहे अपनों से

यह उस समय की बात है जब बड़े स्तर पर लोगों की गिरफ़्तारी करने की शुरुआत की गई थी। यह कई दिनों तक जारी रहा। सुरक्षा बल के जवान ख़ास लोगों को ढूँढते हुए घाटी में घर-घर गए। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता रजा मुज़फ़्फर भट्ट के परिजनों का कहना है कि उनको गिरफ़्तार करने क़रीब 20 जवान गए थे। भट्ट के परिवार वालों का कहना है कि इससे पहले उन्हें कभी भी गिरफ़्तार नहीं किया गया था। जब उनकी पत्नी फौजिया कौसर ने पुलिस कर्मियों से पूछा कि यह क्यों हो रहा है तो पुलिस कर्मियों ने कहा कि उन्हें भी पता नहीं है, सिर्फ़ उन्हें ऐसा करने का आदेश है। 

मीडिया रिपोर्टें हैं कि जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है वे न तो अपने परिजनों से बातचीत कर पा रहे हैं और न ही अपने वकीलों से। उन्हें कहाँ रखा गया है, यह भी पता नहीं है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट में प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से कहा गया है कि अधिकतर लोगों को रात में गिरफ़्तार किया गया था।

सरकार की तरफ़ से कुछ ऐसा नहीं कहा गया है कि इन्हें किन आरोपों में गिरफ़्तार किया गया है और कब तक उन्हें हिरासत में रखा जाएगा। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि गिरफ़्तार किए गए इन लोगों को वायु सेना के विमानों से गुप्त तरीक़े से लखनऊ, वाराणसी और आगरा के जेलों में ले जाया गया है। 

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ऐसे कैसे बढ़ेगा व्यापार?

जम्मू-कश्मीर में व्यवसायियों के गिरफ़्तार किए जाने पर व्यापारी वर्ग के लोग सवाल उठा रहे हैं। फ़र्नीचर से जुड़ी अमेरिकी कंपनी इथन एलेन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी फ़ारूक़ कथवारी कहते हैं कि ऐसे में यहाँ कौन व्यापार में पैसे लगाना चाहेगा? उनका कहना है कि जिस तरह से सुरक्षा बलों ने मामले को संभालने की कोशिश की है उससे लोगों की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है। इससे उनमें ग़ुस्सा है। 

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर हर स्तर के मंत्री और बीजेपी के नेता यही कहते रहे हैं कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में निवेश को बढ़ावा मिलेगा और व्यापार ख़ूब फलेगा-फूलेगा। 

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'कब्रिस्तान की तरह शांति'

इस गिरफ़्तारी से पहले फ़ोन और इंटरनेट लाइन को काट दिया गया था और हज़ारों की संख्या में सशस्त्र जवानों को तैनात किया गया था। लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा करने से क्या विरोध-प्रदर्शन रुक जाएगा? क्या इसके लिए इस हद तक जाना ज़रूरी है कि अपने लोग  अपनों से ही संपर्क नहीं कर पाएँ वह भी वैसी स्थिति में जहाँ हर रोज़ लोगों की जान जाने की आशंका बनी रहती है? और क्या लोगों के अधिकार कुछ नहीं हैं? आलोचक कहते रहे हैं कि पब्लिक सेफ़्टी लॉ यानी सार्वजनिक सुरक्षा क़ानून के तहत भी इस तरह की गिरफ़्तारी करना अवैध है। लेकिन इससे उपजी स्थिति से भयानक तसवीर उभरती है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से बातचीत में मानवाधिकार से जुड़ी वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि कश्मीर में कब्रिस्तान की तरह शांति है।

यह तसवीर इसलिए भी सही जान नहीं पड़ती है क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर नेताओं और आम लोगों की गिरफ़्तारी हाल के दशकों में तो नहीं हुई थी। यह उस देश की स्थिति है जो ख़ुद को दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है। क्या कह देने भर से बड़ा लोकतंत्र बना रहेगा या ऐसा होता दिखना भी चाहिए?
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